सपा-कांग्रेस में फिर लठबंधन, सीट शेयरिंग पर घमासान तय! देखें Video

22 May 2026 4:21 PM IST  ( Updated:2026-05-22 10:52:51  )

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है कि यूपी चुनाव में कांग्रेस के साथ सीट समझौते का आधार जीत का फॉर्मूला होगा।

अगर साथ लड़ने वालों को हर चुनाव के बाद अपनी उपयोगिता साबित करनी पड़े तो फिर गठबंधन कैसे चलेगा? कांग्रेस का चुपचाप मायावती के दरवाजे तक जाना अखिलेश को इतना क्यों चुभा? क्या उत्तर प्रदेश में बिहार मॉडल उतर रहा है, जहां साथ खड़े लोग मंच साझा करते हैं लेकिन भरोसा नहीं? क्या इंडिया गठबंधन में सीटों का बंटवारा होगा या राजनीतिक कद नापे जाएंगे? विपक्ष का इरादा बीजेपी से लड़ने का है या आपस में एक-दूसरे की औकात तय करने का? क्या जीत वाला फॉर्मूला दरअसल जीतने का नहीं, साथियों को उनकी जगह दिखाने का फॉर्मूला है?

जब अखिलेश यादव कहते हैं कि जीतने की क्षमता के आधार पर सीटों का बंटवारा होगा तो तो उनका इशारा किस तरफ है? सीधा कांग्रेस की तरफ। क्योंकि यूपी की राजनीति में कांग्रेस आज वह ताकत नहीं रही जो कभी हुआ करती थी। अखिलेश यादव की बात के पीछे दम भी है। यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में बीजेपी का वोट शेयर करीब 41% और सीटें 255 थीं। सपा को करीब 32 फीसद मत मिले और सीटें 111 मिलीं। कांग्रेस का वोट शेयर सिर्फ 2.3 फीसद, सीटें 2 मिलीं, बीएसपी के खाते में करीब 13 फीसद वोट और सीट महज एक।

अब सवाल ये है कि 2 प्रतिशत वोट वाली पार्टी अगर 25-30 प्रतिशत सीट मांगे तो तो क्या सपा उसे आसानी से दे देगी? यही वजह है कि अखिलेश यादव अब सम्मानजनक साझेदारी नहीं आंकड़े पर आधारित साझेदारी की बात कर रहे हैं। लेकिन यहीं गठबंधन की सबसे बड़ी बीमारी शुरू होती है क्योंकि कांग्रेस सिर्फ आंकड़ों से राजनीति नहीं करती। वो राष्ट्रीय पहचान का तर्क देती है और यहीं टकराव पैदा होता है।

क्या 2017 की हार से भी सपा-कांग्रेस ने कुछ नहीं सीखा? 2017 में राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने हाथ मिलाया। नारा दिया गया यूपी को ये साथ पसंद है। दावा किया गया कि सपा-कांग्रेस का युवा नेतृत्व बीजेपी को रोक देगा।लेकिन नतीजा क्या निकला? विधानसभा चुनाव 2017 में बीजेपी गठबंधन को 325 सीटें, सपा को 47 और कांग्रेस के खाते में सात सीट यानी दोनों दल मिलाकर 60 के आंकड़े को भी नहीं पार कर सके।

ऐसे में सवाल उठता है कि सपा और कांग्रेस में वोट ट्रांसफर नहीं हुआ। इन दोनों दलों में वोट एक दूसरे की तरफ गए लेकिन उम्मीद के हिसाब से नहीं। ऐसे में जमीन पर क्या कार्यकर्ता एक साथ नहीं आए। तो इस सवाल का जवाब आंकड़ों में छिपा है और वो जवाब है बिल्कुल नहीं। सपा का कैडर कांग्रेस को बोझ मानता था। कांग्रेस का कैडर सपा को गुंडाराज वाली छवि से जोड़ता था। ऊपरी स्तर पर नेता साथ थे लेकिन निचले स्तर पर कार्यकर्ता अलग-थलग थे।

क्या कांग्रेस अभी भी खुद को बड़ा भाई मानने की बीमारी से बाहर नहीं निकली? यह सवाल सिर्फ यूपी का नहीं है। बिहार को आप देख सकते हैं। तेजस्वी यादव और कांग्रेस के रिश्तों में भी यह तनाव नजर आया। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में आरजेडी के नेताओं ने 144 सीट पर किस्मत आजमाई लेकिन जीत 75 सीट पर मिली। कांग्रेस को 70 सीटों पर लड़ने का मौका मिला, जीत 19 सीट पर हुई।

आरजेडी का तर्क क्या था? अगर कांग्रेस कम सीट लड़ती तो महागठबंधन सत्ता में आ सकता था। आरजेडी नेताओं ने खुले मंचों से कहा कि कांग्रेस ने ज्यादा सीट लेकर नुकसान किया। 2025 के चुनाव में भी कांग्रेस और आरजेडी के साथ दूसरे घटक दलों में सीट समझौते को लेकर भ्रम की स्थिति बरकरार रही। अखिलेश यादव वही मॉडल लागू करना चाहते हैं। कांग्रेस को उतनी ही सीटें मिलेंगी जितनी पर उसके जीतने की संभावना है लेकिन क्या कांग्रेस इसे स्वीकार करेगी। अब सवाल है क्या कांग्रेस इसे स्वीकार करेगी?वो राजनीतिक सम्मान भी चाहती है।

क्या मायावती फैक्टर से डरी कांग्रेस, सपा पर दबाव बना रही है? हाल के दिनों में कई राजनीतिक गलियारों में चर्चा चली कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने बसपा सुप्रीमो मायावती से संपर्क साधने की कोशिश की थी। हालांकि उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया था। अब सवाल यह है कि 2024 के आम चुनाव में सपा के साथ बेहतर प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस ने मायावती की तरफ रुख क्यों किया क्योंकि कांग्रेस जानती है कि अगर दलित वोट पूरी तरह सपा के साथ चला गया तो यूपी में कांग्रेस की स्वतंत्र पहचान और कमजोर हो जाएगी। लेकिन यहां राजनीति और पेचीदा हो जाती है।

2019 में सपा-बसपा गठबंधन ने मिलकर चुनाव लड़ा था। बसपा को 10 सीटें, सपा को 5 सीटें मिली थी। बसपा को तो फायदा मिला। लेकिन उम्मीद के मुताबिक सपा को लाभ नहीं मिला, आगे चलकर मायावती ने सपा पर आरोप लगाते हुए गठबंधन को तोड़ दिया। ऐसे में अखिलेश यादव के मन में एक डर बैठ गया कि सहयोगी दल फायदा उठाकर निकल जाते हैं। इस वजह से अब सपा बहुत सावधानी से सीट शेयरिंग करना चाहती है।

क्या इंडिया गठबंधन गठबंधन का सबसे बड़ा दुश्मन बीजेपी नहीं बल्कि नेताओं का अहंकार है? बंगाल में ममता बनर्जी कांग्रेस को सीमित रखना चाहती हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी कांग्रेस को चुनौती देती है। बिहार में आरजेडी कांग्रेस को कम सीट देना चाहती है। यूपी में सपा विनिंग फॉर्मूला लागू करना चाहती है तो फिर इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका क्या है? राष्ट्रीय चेहरा या सिर्फ प्रतीक और यही सबसे बड़ा संकट है।लक्योंकि कांग्रेस आज भी खुद को स्वाभाविक नेता मानती है। लेकिन क्षेत्रीय दल अब उसे बराबर का सहयोगी भी मानने को तैयार नहीं।

अखिलेश यादव आखिर कहना क्या चाहते हैं? ये सिर्फ सीट शेयरिंग का बयान नहीं बल्कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन है। अखिलेश यादव दरअसल कांग्रेस को संदेश दे रहे हैं कि यूपी में अब बड़े भाई हम हैं। 2017 में सपा को कांग्रेस की जरूरत थी। लेकिन 2024 के बाद सपा को लगता है कि समीकरण बदल गए हैं। इसके पीछे कुछ आंकड़े भी हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में सपा को 37, कांग्रेस को 6 सीट पर जीत मिली थी। इस नतीजे ने सपा के आत्मविश्वास को बढ़ा दिया।

सपा का मानना है कि मुस्लिम, यादव, युवा समीकरण उसके पक्ष में है और कांग्रेस सिर्फ ब्रांड गांधी पर राजनीति कर रही है। इसलिए अखिलेश अब बराबरी नहीं नेतृत्व चाहते हैं। लेकिन क्या सपा भी भ्रम में है? क्योंकि सपा भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। 2014 लोकसभा में सपा सिर्फ 5 सीटें जीत पाई थी, 2017 विधानसभा में करारी शिकस्त मिली, 2019 में बसपा गठबंधन प्रयोग फेल रहा। यानी सपा का भी इतिहास उतार-चढ़ाव वाला है और कांग्रेस की राष्ट्रीय मौजूदगी के बगैर बीजेपी के खिलाफ बड़े स्तर पर नैरेटिव बनाना आसान नहीं। दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है लेकिन दोनों एक-दूसरे को बड़ा मानने के लिए तैयार नहीं।

सवाल यह है कि इंडिया गठबंधन की असली समस्या क्या है। इस सवाल का जवाब है नेतृत्व, क्योंकि गठबंधन में हर दल खुद को केंद्र मानता है। राहुल गांधी राष्ट्रीय चेहरा, ममता बनर्जी प्रधानमंत्री विकल्प, अरविंद केजरीवाल खुद को मॉडल बताते हैं, तेजस्वी यादव भविष्य के नेता, अखिलेश यादव उत्तर भारत का ओबीसी चेहरा। ऐसे में इतने सारे कप्तानों के बीच टीम कैसे बनेगी? गठबंधन सिर्फ गणित से नहीं भरोसे से चलता है। अगर कार्यकर्ता दिल से साथ नहीं है तो वोट ट्रांसफर नहीं होता। अगर स्थानीय नेता एक-दूसरे को हराने में लगे हों तो गठबंधन सिर्फ कागज पर नजर आता है। 2017 में यही हुआ। 2020, 2025 में बिहार में यही शिकायत हुई। 2019 में यूपी में सपा-बसपा गठबंधन में यही दरार दिखी।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है? अगर वो कम सीटों पर मान जाती है तो संदेश जाएगा कि वह कमजोर हो चुकी है। अगर ज्यादा सीट मांगती है तो क्षेत्रीय दल नाराज हो जाएंगे। यानी कांग्रेस ऐसी स्थिति में है जहां हर रास्ता राजनीतिक नुकसान की तरफ जाता है।अब आगे क्या हो सकता है। इसके पीछे तीन संभावनाएं हैं। पहली संभावना, सपा कांग्रेस को सीमित सीटें दे और कांग्रेस मजबूरी में मान जाए। दूसरी संभावना, कांग्रेस दबाव बनाए और गठबंधन में तनाव बढ़ जाए। तीसरी संभावना छोटे दलों और बसपा फैक्टर के जरिए नया समीकरण बनाने की कोशिश हो।

एक बात साफ है सीट शेयरिंग INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बनने जा रही है। तो क्या विपक्ष फिर वही गलती दोहराने जा रहा है? क्या 2017 की हार, 2019 के सपा-बसपा गठबंधन का प्रयोग, 2020 की शिकायतें इन सब से कोई सबक नहीं लिया गया? क्या इंडिया गठबंधन बीजेपी को हराने निकला है या एक-दूसरे की ताकत नापने? राजनीति में गठबंधन तब चलता है। जब साथी एक-दूसरे पर भरोसा करें। लेकिन जहां हर दल खुद को कप्तान समझे वहां टीम नहीं बनती टकराव की पैदाइश होती है।