
बंगाल का नया सुरक्षा कानून, अपराधियों पर वार या विपक्ष पर प्रहार?
पश्चिम बंगाल का नया पब्लिक सेफ्टी एक्ट सख्त प्रावधानों के कारण चर्चा में है। सरकार इसे सुरक्षा का कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे सियासी हथियार बता रहा है।
क्या बंगाल की राजनीति अब उस रास्ते पर चल पड़ी है, जिसकी पहचान उत्तर प्रदेश से होती रही है। क्या कानून सिर्फ दंगाइयों और अपराधियों के लिए है या आगे चलकर राजनीतिक हथियार भी बन सकता है? क्या मुसलमानों के मन में या उनको लेकर उठायी जा रही आशंकाएं सिर्फ बयानबाज़ी है या इसके पीछे कोई बड़ा सियासी संदेश है? क्या यह कानून सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला है या 2026 की राजनीति का नया नैरेटिव
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा कानून आ गया है जिसने सिर्फ विधानसभा ही नहीं पूरे देश में बहस छेड़ दी है। विधानसभा ने पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पास कर दिया है। शुभेंदु अधिकारी सरकार का कहना है कि यह कानून दंगाइयों, संगठित हिंसा फैलाने वालों, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों और असामाजिक तत्वों पर नकेल कसने के लिए है। लेकिन विपक्ष, नागरिक अधिकार समूह सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या राज्य को इतने बड़े अधिकार देना नागरिक आजादी पर असर डाल सकता है?
पहले समझिए कि कानून कितना सख्त है?
बिना मुकदमे 12 महीने तक एहतियाती हिरासत
कई अपराध गैर-जमानती
बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार
सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर संपत्ति जब्त करने का प्रावधान
दंगा, संगठित हिंसा और सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने वाले मामलों में सख्त कार्रवाई
तेज जांच और विशेष कानूनी प्रक्रिया
सरकार का दावा है कि इससे आम आदमी सुरक्षित होगा। लेकिन यहीं से सवाल शुरू होता है जब सरकार के हाथ में इतनी ताकत होगी तब उस ताकत की सीमा कौन तय करेगा? क्या बंगाल में 'योगी मॉडल' की दस्तक है? दो राज्यों के कानूनों को हूबहू एक जैसा कहना सही नहीं होगा। लेकिन राजनीति सिर्फ कानून की भाषा नहीं उसका संदेश भी पढ़ती है। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई, गैंगस्टरों की संपत्ति जब्त करना, बुलडोजर और जीरो टॉलरेंस की नीति ने एक अलग राजनीतिक पहचान बनाई। समर्थकों ने जहां इसे मजबूत शासन कहा वहीं आलोचकों की नजर में चुनिंदा लोगों को निशाना बनाया जाना रहा। अब बंगाल में भी ऐसा कानून आया है, जिसमें लंबी एहतियाती हिरासत, बिना वारंट गिरफ्तारी, गैर-जमानती अपराध और संपत्ति जब्ती जैसे प्रावधान हैं और यही वजह है कि तुलना हो रही है। सवाल यह नहीं कि दोनों कानून एक जैसे हैं या नहीं। मुद्दा यह है कि क्या बंगाल की राजनीति भी अब उसी सख्त प्रशासन वाली छवि बनाना चाहती है?
क्या यह कानून सिर्फ अपराधियों तक रहेगा या राजनीतिक विरोधियों तक भी पहुंच सकता है? यहीं सबसे बड़ी बहस शुरू होती है। लोकतंत्र में सरकार को कानून लागू करने की ताकत मिलती है। लेकिन जब गिरफ्तारी बिना वारंट हो, जमानत आसान न हो और महीनों तक हिरासत में रखा जा सके तो सवाल उठना लाजिमी है। सरकार कहती है कि कानून सिर्फ संगठित हिंसा और असामाजिक गतिविधियों पर लागू होगा। लेकिन विरोधियों का कहना है कि अगर कानून की परिभाषा बहुत व्यापक होगी, तो उसका इस्तेमाल भी व्यापक हो सकता है। यही वजह है कि नागरिक अधिकार समूह पूछ रहे हैं क्या पर्याप्त न्यायिक निगरानी होगी? क्या जवाबदेही तय होगी? और सबसे बड़ी बात क्या यह कानून सिर्फ अपराधियों पर चलेगा या सत्ता के विरोधियों पर भी?
सीएम शुभेंदु अधिकारी ने आखिर मुसलमानों का जिक्र क्यों किया? क्या यह सिर्फ बयान था या बड़ा राजनीतिक संदेश? यहीं से बहस दूसरा मोड़ लेती है। विधानसभा में शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि पिछली सरकारों में तुष्टिकरण की राजनीति हुई और अब उस पर नकेल लगेगी। मुद्दा यह है कि अगर कानून हर नागरिक के लिए बराबर है तो फिर किसी खास समुदाय का जिक्र क्यों? यह सिर्फ राजनीतिक बयान हो सकता है। लेकिन राजनीति में शब्द सिर्फ शब्द नहीं संदेश भी होते हैं और जब किसी समुदाय का नाम कानून की बहस के बीच आता है तो उसके मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या यह कानून अल्पसंख्यकों को निशाना बनाएगा? इसका जवाब आज किसी के पास नहीं है। क्योंकि किसी भी कानून का असली चेहरा उसकी किताब में नहीं उसके इस्तेमाल में दिखाई देता है। अगर सरकार चाहती है कि कोई डर न हो तो उसे यह भरोसा भी देना होगा कि कार्रवाई पहचान देखकर नहीं अपराध देखकर होगी।
क्या यह कानून सुरक्षा से ज्यादा सियासत का संदेश है? भाजपा लंबे समय से बंगाल में कानून-व्यवस्था और राजनीतिक हिंसा को सबसे बड़ा मुद्दा बनाती रही है। अब सरकार सख्त कानून लेकर आई है। यानी जिस मुद्दे पर विपक्ष हमला करता था. अब सरकार उसी मुद्दे पर अपनी ताकत दिखा रही है। राजनीति में इसे नैरेटिव बदलना कहते हैं। यानी विपक्ष का हथियार सत्ता अपने हाथ में ले ले। यही वजह है कि कई जानकार इसे सिर्फ सुरक्षा का कानून नहीं बल्कि चुनाव से पहले दिया गया बड़ा राजनीतिक संदेश भी मान रहे हैं।
ऐसे में क्या बंगाल में योगी मॉडल आ गया? अगर इसका मतलब अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई है तो कुछ समानताएं जरूर दिखाई देती हैं। लेकिन अगर इसका मतलब उत्तर प्रदेश की पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक शैली है तो अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। उतनी ही जल्दबाजी कि इस कानून का इस्तेमाल किसी खास समुदाय या राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ होगा। असल सवाल कानून नहीं उसका इस्तेमाल है। अगर कार्रवाई निष्पक्ष होगी तो यह कानून सरकार की ताकत बनेगा। लेकिन अगर इसका इस्तेमाल चुनिंदा लोगों के खिलाफ होता दिखा तो यही कानून सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद भी बन सकता है।

