विपक्ष मुक्त भारत का खेल: क्षेत्रीय दलों में टूट और 362 का गणित
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विपक्ष मुक्त भारत का खेल: क्षेत्रीय दलों में टूट और 362 का गणित

'श्रीनि से संवाद' में बड़ा विश्लेषण: परिसीमन बिल और दो-तिहाई बहुमत के लिए टीएमसी व शिवसेना में क्यों मची है भगदड़, क्या है अभिषेक बनर्जी को लेकर नाराजगी का सच।


Shrini Se Samwad: 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा था कि भारतीय राजनीति एक बार फिर गठबंधन और एक मजबूत विपक्ष के पारंपरिक दौर में लौट आई है। लेकिन हाल के दिनों में जिस तेजी से देश का राजनीतिक परिदृश्य बदला है, उसने हर राजनीतिक विश्लेषक और आम नागरिक को सोचने पर मजबूर कर दिया है। पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र, बिहार और तमिलनाडु तक, क्षेत्रीय दलों के भीतर मची अभूतपूर्व भगदड़ ने देश में एक नए सियासी ड्रामे और गंभीर अंतर्विरोधों को जन्म दे दिया है।


'द फेडरल देश' के बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम "श्रीनि से संवाद" में 'द फेडरल' के ग्रुप एडिटर एस. श्रीनिवासन ने देश की इस मौजूदा राजनीतिक उठापटक, पर्दे के पीछे चल रहे 'नंबर गेम', क्षेत्रीय दलों की कमजोरी और इसके दूरगामी परिणामों का एक ऐसा विस्तृत और चौंकाने वाला विश्लेषण किया है, जिसे समझना देश की लोकतांत्रिक दिशा को समझने के लिए बेहद जरूरी है।



1. 'कांग्रेस मुक्त' से आगे: अब 'विपक्ष मुक्त भारत' का नया अध्याय?
'श्रीनि से संवाद' कार्यक्रम में यह बात बेहद साफ और तार्किक तरीके से उभर कर आई कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की रणनीति अब अपने पुराने राजनीतिक नारों से बहुत आगे निकल चुकी है। साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई थी, तब पार्टी का मुख्य नारा और लक्ष्य 'कांग्रेस मुक्त भारत' का था। लेकिन अब, जबकि देश के कई प्रमुख राज्यों में कांग्रेस की स्थिति वैसी नहीं रही, केंद्र की सत्ताधारी पार्टी की रणनीति 'विपक्ष मुक्त भारत' की ओर बढ़ती दिख रही है।

देश के बड़े, स्थापित और मजबूत क्षेत्रीय दलों को भीतर से तोड़ना इस नई रणनीति का सबसे बड़ा और मारक हथियार बन गया है। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) को दो-दो बार तोड़ना, तमिलनाडु में एआईएडीएमके के भीतर की निरंतर कलह, बिहार में क्षेत्रीय समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ना और अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर का हालिया घटनाक्रम इसी ओर इशारा करते हैं। सत्ता पक्ष की रणनीति अब साफ दिख रही है—विपक्ष को इस हद तक बिखेर दिया जाए कि वह राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा होने लायक ही न बचे।

2. क्या है '362 का खेल'? सारा विवाद दो-तिहाई बहुमत पर
इस अभूतपूर्व सियासी तोड़-फोड़ के पीछे कोई साधारण या केवल चुनावी कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे संसद का एक बहुत बड़ा 'लेजिस्लेटिव नंबर गेम' (विधायी अंकों का खेल) है। कार्यक्रम में एडिटर एस. श्रीनिवासन ने खुलासा किया कि असल विवाद 'दो-तिहाई बहुमत' यानी लोकसभा में 362 सीटों का जादुई आंकड़ा जुटाने का है।

विधेयक पर करारी हार: अप्रैल महीने में सरकार संसद में परिसीमन (डीलिमिटेशन) और महिला आरक्षण संशोधन विधेयक लेकर आई थी। लेकिन लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न होने के कारण यह ऐतिहासिक बिल गिर गया। पिछले 12 सालों के कार्यकाल में यह पहला मौका था जब मोदी सरकार को संसद के पटल पर इतनी बड़ी विधायी हार का सामना करना पड़ा और अपने पैर पीछे खींचने पड़े।

मॉनसून सत्र की तैयारी: सरकार इस विधायी हार को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना चुकी है और आगामी मॉनसून सत्र में इस परिसीमन विधेयक को हर हाल में पास कराना चाहती है। फिलहाल एनडीए (NDA) के पास करीब 320 सीटें हैं। 362 के जादुई आंकड़े तक पहुँचने के लिए जो लगभग 72 सीटों की कमी है, उसे पूरा करने के लिए विपक्षी खेमे में यह बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक की जा रही है।

3. 'थ्री-वे स्ट्रेटेजी': एक ही पार्टी को तीन अलग-अलग तरीकों से तोड़ने का गणित
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जो कुछ भी हुआ, उसे 'श्रीनि से संवाद' में बेहद सरल भाषा में समझाया गया। यह कोई अचानक हुआ आंतरिक विद्रोह नहीं था, बल्कि इसके पीछे तीन अलग-अलग रणनीतियाँ एक साथ काम कर रही थीं ताकि दल-बदल कानून के फंदे से पूरी तरह बचा जा सके:

राज्यसभा के लिए रणनीति: यहाँ टीएमसी के टूटे हुए सांसदों को सीधे बीजेपी में शामिल कराया जा रहा है क्योंकि वहाँ का गणित और नियम अलग हैं।

लोकसभा के लिए 'एनसीपीए' (NCPA) का खेल: लोकसभा में टीएमसी के 29 में से 20 सांसद टूट कर अलग हो गए। लेकिन उनकी संसद सदस्यता न जाए, इसलिए तकनीकी रूप से उन्हें एक अनजान और गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी 'एनसीपीए' (नेशनल सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया) में विलय (Merger) करा दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि इस एनसीपीए पार्टी को पिछले चुनाव में कुल जमा केवल 800 वोट मिले थे, लेकिन इस खेल के बाद रातों-रात यह देश की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई! यहाँ तक कि इसके असली पदाधिकारियों को भी नहीं पता था कि उनकी पार्टी का इतना बड़ा 'रीब्रांडिंग' हो चुका है और नए अध्यक्ष भी बन गए हैं।

असेंबली (विधायकों) के लिए रणनीति: यहाँ ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में टूटे हुए 64 विधायकों ने खुद को ही 'असली तृणमूल' घोषित कर दिया है ताकि वे राज्य में अपनी राजनीतिक साख बचा सकें।

यह अनोखा और जटिल पैटर्न दिखाता है कि यह कोई स्वतः स्फूर्त गुस्सा नहीं था, बल्कि इसकी पूरी स्क्रिप्ट कहीं और से संचालित की जा रही थी ताकि तकनीकी और कानूनी अड़चनों को दूर किया जा सके।

4. प्रलोभन, डर और 'वॉशिंग मशीन' की राजनीति
कार्यक्रम के दौरान देश की राजनीति के सबसे स्याह और अनैतिक पहलू पर भी खुलकर बात की गई। महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के उदाहरणों का हवाला देते हुए यह बात सामने आई कि इस समय विपक्षी सांसदों और विधायकों को पाला बदलने के लिए 15 करोड़ से लेकर 50 करोड़ रुपये तक के भारी प्रलोभन दिए जा रहे हैं।

लेकिन बात सिर्फ पैसों की नहीं है, यहाँ डर और सुरक्षा का खेल भी उतना ही बड़ा है। जो नेता केंद्रीय जाँच एजेंसियों (ED और CBI) के रडार पर हैं, उनके लिए सत्ता पक्ष का दामन थामना एक राजनीतिक जीवनदान जैसा है। इसे भारतीय राजनीति में 'वॉशिंग मशीन' का नाम दिया गया है, जहाँ विपक्ष में रहते हुए महाभ्रष्ट दिखने वाला नेता सत्ता पक्ष में आते ही बिल्कुल साफ़-सुथरा हो जाता है और उसके सारे मुकदमे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। सांसदों के लिए अपनी मुट्ठी में पैसा और दूसरी मुट्ठी में जाँच एजेंसियों से सुरक्षा होना—इससे बेहतर सौदा और कुछ नहीं हो सकता।

5. अभिषेक बनर्जी पर घमासान और 'पारिवारिक शासन' का सच
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मची इस ऐतिहासिक भगदड़ के पीछे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और पार्टी के आंतरिक अंतर्विरोधों को भी एक बड़ा और महत्वपूर्ण कारण बताया गया है। कार्यक्रम में इस राजनीतिक कोण पर भी विस्तार से चर्चा हुई:

कार्यशैली से नाराजगी: बीजेपी सूत्रों और राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, टीएमसी के कई वरिष्ठ सांसद और विधायक अभिषेक बनर्जी के 'अत्यधिक दखल' और उनके काम करने के कॉरपोरेट तौर-तरीकों से काफी लंबे समय से असंतुष्ट चल रहे थे।

पारिवारिक शासन पर सवाल: पार्टी के भीतर एक पुराना और बड़ा धड़ा इस बात से भी नाराज बताया जा रहा है कि टीएमसी में फैसले लेने की कमान अब पूरी तरह से 'पारिवारिक शासन' के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है। नेताओं का मानना है कि अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के कारण जमीन से जुड़े पुराने, अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं की लगातार अनदेखी की जा रही थी।

दो साल बाद अचानक बगावत क्यों? हालाँकि, इस 'ऑर्गेनिक नाराजगी' के दावों पर सवाल उठाते हुए कार्यक्रम में यह भी चर्चा हुई कि अगर यह गुस्सा सिर्फ अभिषेक बनर्जी और उनकी कार्यशैली के खिलाफ था, तो लोकसभा चुनाव बीते हुए पूरे दो साल हो चुके हैं। ऐसे में टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों को ठीक आज ही के दिन अचानक यह बात क्यों याद आई कि वे नेतृत्व से नाराज हैं और उन्हें अलग हो जाना चाहिए?

यह विरोधाभास साफ़ इशारा करता है कि भले ही टीएमसी के भीतर अभिषेक बनर्जी को लेकर अंदरूनी खींचतान चल रही थी और उसे आधार बनाया गया, लेकिन इस समय जो इतनी बड़ी टूट हुई है, वह सिर्फ एक पारिवारिक नाराजगी का नतीजा नहीं है; बल्कि इसके पीछे केंद्र की एक सोची-समझी और बहुत बड़ी राजनीतिक बिसात (स्क्रिप्ट) काम कर रही है ताकि संसद में संख्या बल हासिल किया जा सके।

6. क्या राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट हो पाएगा विपक्ष?
इस चौतरफा हमले और टूट के बीच विपक्षी गठबंधन 'इंडिया ब्लॉक' (INDI Alliance) के लिए भी यह अस्तित्व बचाने की लड़ाई बन चुकी है। इस भारी दबाव का एक दूसरा और सकारात्मक पहलू यह हुआ है कि विपक्षी दलों के आपसी मतभेद अब कम होने लगे हैं।

राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' और 2024 के चुनाव में संविधान को बचाने के उनके अभियान का असर यह हुआ है कि अब ममता बनर्जी जैसी कड़क मिजाज नेता भी राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार दिख रही हैं। तमिलनाडु में डीएमके (DMK) के साथ कुछ स्थानीय मतभेदों (जहाँ डीएमके कांग्रेस के रवैये से कुछ नाराज है) को अगर छोड़ दिया जाए, तो यह बात धीरे-धीरे पूरे विपक्ष में तय हो रही है कि विपक्ष की लड़ाई का केंद्र बिंदु कांग्रेस ही रहेगी और उसी के इर्द-गिर्द मोर्चाबंदी होनी है।

7. आने वाले समय की बड़ी चुनौतियाँ और आर्थिक संकट
बीजेपी का लक्ष्य साफ़ है - चौथी बार (2029) सत्ता में आने के रास्ते को अभी से निष्कंटक बनाना और 'वन नेशन वन इलेक्शन' जैसी बड़ी योजनाओं को कानूनी रूप देना। इसके लिए वे नए संसद भवन की 800 सीटों वाली क्षमता का पूरा इस्तेमाल परिसीमन के जरिए करना चाहते हैं, जिसके लिए वे दो-तिहाई बहुमत चाहते हैं।

मगर सरकार के लिए भी यह रास्ता इतना आसान नहीं है। राजनीति के इस नंबर गेम के समानांतर देश में इस साल मॉनसून की स्थिति काफी खराब है, जिससे कृषि संकट गहरा सकता है। साथ ही, खाड़ी देशों (Gulf) के युद्ध और तनाव के कारण देश की आर्थिक स्थिति और महंगाई की दर पर भारी असर पड़ रहा है। अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लौटने में कम से कम 6 महीने से एक साल का वक्त लग सकता है।

'द फेडरल देश' के इस विशेष विश्लेषण से साफ़ है कि देश इस समय एक बेहद अनैतिक और अभूतपूर्व राजनीतिक दौर से गुजर रहा है। मॉनसून सत्र के करीब आते-आते यह तोड़-फोड़ और तेज हो सकती है। अब देखना यह होगा कि क्या जनता की जेब पर पड़ती महंगाई की मार और खराब मॉनसून के बीच, विपक्ष इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेद पाता है या देश सचमुच 'विपक्ष मुक्त' राजनीति की ओर बढ़ जाएगा।


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