दलित वोट बैंक खिसका-ब्राह्मण BJP के साथ , BSP कैसे करेगी वापसी?

26 May 2026 4:04 PM IST

यूपी की सियासत में इस समय ब्राह्मणों का मुद्दा छाया हुआ है। 24 मई को बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कहा था कि ब्राह्मण समाज के लिए हम लोगों ने बहुत कुछ किया। उनके इस बयान को 2007 के सर्वजन फार्मूला से जोड़कर देखा जा रहा है।

बीस साल बाद क्या फिर लौटेगा बहुजन से सर्वजन वाला फॉर्मूला? क्या 2007 की तरह ब्राह्मण फिर हाथी पर सवार होगा? क्या दलित वोट बैंक अब भी मायावती के साथ उतनी मजबूती से खड़ा है? क्या 2027 में बसपा लड़ाई में है भी, या सिर्फ समीकरणों के सहारे जीत के सपने देख रही है?

उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। इस बार सबसे ज्यादा चर्चा जिस चाल की हो रही है, वह है मायावती का ब्राह्मण कार्ड। वही ब्राह्मण कार्ड जिसने 2007 में इतिहास रचा था। वही सोशल इंजीनियरिंग मॉडल जिसने “तिलक, तराजू और तलवार” वाली राजनीति को बदलकर “हाथी नहीं गणेश है” तक पहुंचा दिया था। वही फॉर्मूला जिसने दलित और ब्राह्मण को एक मंच पर लाकर बहुजन समाज पार्टी को यूपी की सत्ता के शिखर तक पहुंचाया था।

सवाल यह है कि क्या 2027 का उत्तर प्रदेश, 2007 वाला उत्तर प्रदेश है? क्या आज भी ब्राह्मण वोट सत्ता की दिशा तय करता है? क्या दलित समाज अब भी बसपा को अपना सबसे स्वाभाविक राजनीतिक घर मानता है? और क्या मायावती के पास वह संगठन, वे चेहरे और वह आक्रामकता बची है, जो बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच खुद के लिए जगह बना सके?

2007 को याद करना जरूरी है। बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। पार्टी का वोट शेयर करीब 30.4 प्रतिशत था। उस चुनाव में बसपा ने लगभग 86 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से बड़ी संख्या जीतकर विधानसभा पहुंची। सतीश चंद्र मिश्रा उस सोशल इंजीनियरिंग मॉडल का चेहरा बने। नारा था — “ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा।”

उस समय राजनीतिक हालात अलग थे। बीजेपी कमजोर थी। समाजवादी पार्टी यादव-मुस्लिम पार्टी की छवि में सीमित थी। कांग्रेस हाशिए पर थी और मायावती आक्रामक, निर्णायक तथा सत्ता संभालने वाली नेता के रूप में स्थापित थीं। दलित वोट लगभग पूरी तरह उनके साथ था। जाटव वोट बैंक बसपा की रीढ़ था और गैर-जाटव दलितों में भी पार्टी की पकड़ मजबूत थी।

लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर गिरकर करीब 12.9 प्रतिशत पर पहुंच गया। पार्टी केवल बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट जीत सकी। 2017 विधानसभा चुनाव में बसपा को 19 सीटें मिली थीं और उसका वोट शेयर करीब 22 प्रतिशत था। यानी 2017 से 2022 के बीच पार्टी लगभग आधी राजनीतिक ताकत खो बैठी।

सबसे बड़ा झटका संगठनात्मक स्तर पर लगा। बसपा का कैडर, जो कभी बूथ स्तर तक सक्रिय माना जाता था, धीरे-धीरे निष्क्रिय होता गया। पार्टी के बड़े चेहरे या तो बीजेपी और सपा में चले गए या फिर राजनीति से किनारा कर लिया। कई जिलों में बसपा के पास ऐसा स्थानीय नेतृत्व नहीं बचा, जो लड़ाई को जमीन पर मजबूती से खड़ा कर सके।

ऐसे में सवाल उठता है कि मायावती फिर ब्राह्मण कार्ड क्यों खेल रही हैं? इसकी सबसे बड़ी वजह है राजनीतिक जमीन की तलाश। आज यूपी की राजनीति दो बड़े खेमों — बीजेपी और सपा — में बंटी हुई है। कांग्रेस का दायरा सीमित है और बसपा लगातार सिकुड़ रही है। मायावती को लगता है कि अगर उन्हें वापसी करनी है, तो कोई बड़ा सामाजिक समीकरण खड़ा करना होगा। सिर्फ दलित वोट के भरोसे सत्ता तक पहुंचना अब संभव नहीं दिखता। यहीं से फिर ब्राह्मण-दलित फॉर्मूले की चर्चा शुरू होती है।

लेकिन क्या ब्राह्मण समाज आज बसपा के साथ आने की स्थिति में है? 2007 में ब्राह्मणों का एक हिस्सा समाजवादी पार्टी से दूरी बनाकर बसपा की तरफ आया था, क्योंकि उन्हें कानून-व्यवस्था और राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहिए था। उस दौर में बीजेपी सत्ता की मुख्य दावेदार नहीं थी। लेकिन 2014 के बाद बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोट बैंक पर जबरदस्त पकड़ बना ली।

2014 लोकसभा चुनाव, 2017 विधानसभा चुनाव, 2019 लोकसभा चुनाव और 2022 विधानसभा चुनाव। हर चुनाव में ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ खड़ा दिखाई दिया। CSDS और अन्य पोस्ट-पोल सर्वे बताते हैं कि 2022 में भी लगभग 80 प्रतिशत ब्राह्मण वोट बीजेपी गठबंधन को मिला। जबकि बसपा ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे और “प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन” भी किए, लेकिन उसे जमीन पर समर्थन नहीं मिला।

आज ब्राह्मण वोटर किन आधारों पर वोट करता है? पहला, सत्ता के करीब कौन है। दूसरा, हिंदुत्व की राजनीति में कौन मजबूत है। तीसरा, स्थिर सरकार कौन दे सकता है। इन तीनों पैमानों पर फिलहाल बीजेपी मजबूत दिखाई देती है।

तो क्या मायावती सिर्फ सांकेतिक राजनीति कर रही हैं या उनके पास कोई गहरी रणनीति है?मायावती अच्छी तरह समझती हैं कि अगर बसपा को राजनीतिक रूप से जिंदा रखना है, तो उसे सिर्फ “दलित पार्टी” की छवि से बाहर आना होगा। यही वजह है कि वे “सर्वजन” लाइन की तरफ लौटती दिखाई दे रही हैं। ब्राह्मण सम्मेलन उसी रणनीति का हिस्सा हैं।

दूसरी चुनौती दलित वोट बैंक की है। बसपा की सबसे बड़ी ताकत दलित वोट था, खासकर जाटव समुदाय। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में बीजेपी ने गैर-जाटव दलितों में बड़ी सेंध लगाई है। पासी, वाल्मीकि, कोरी, धोबी जैसे कई समुदाय बीजेपी की तरफ गए। वजह सिर्फ हिंदुत्व नहीं थी। केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं — मुफ्त राशन, उज्ज्वला, आवास और शौचालय जैसी योजनाओं — का भी बड़ा असर रहा। यानी बीजेपी ने सिर्फ सवर्ण राजनीति नहीं की, बल्कि सामाजिक विस्तार भी किया। और यही मायावती की सबसे बड़ी मुश्किल है।

अगर दलित वोट बैंक बिखर रहा हो और ब्राह्मण वोट पहले से बीजेपी के साथ हो, तो नया सोशल इंजीनियरिंग मॉडल खड़ा कैसे होगा?2007 में मायावती के पास सत्ता की संभावना थी। लोग उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर देख रहे थे। लेकिन आज 2027 की चर्चा में क्या बसपा सत्ता की मुख्य दावेदार दिखती है? शायद नहीं। राजनीति में वोटर सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि जीतने की संभावना भी तलाशता है, खासकर सवर्ण वोटर। यही कारण है कि ब्राह्मण समाज का बड़ा हिस्सा उस पार्टी के साथ जाता है, जो सत्ता में हो या सत्ता के करीब हो।

दूसरी तरफ, अखिलेश यादव ने 2024 में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की नई राजनीति शुरू की है। समाजवादी पार्टी अब सिर्फ यादव-मुस्लिम पार्टी की छवि से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में सपा को इसका फायदा भी मिला। कई दलित इलाकों में सपा ने बेहतर प्रदर्शन किया। यानी मायावती सिर्फ बीजेपी से नहीं, बल्कि सपा से भी लड़ रही हैं।

अब सवाल यह भी है कि क्या बसपा के पास कोई बड़ा ब्राह्मण चेहरा है? सतीश चंद्र मिश्रा अभी भी पार्टी में हैं, लेकिन 2007 वाली ऊर्जा और प्रभाव अब दिखाई नहीं देता। नई पीढ़ी के ब्राह्मण नेताओं में बसपा के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं दिखता, जो बड़े पैमाने पर समाज को प्रभावित कर सके। इसके उलट बीजेपी के पास ब्राह्मण नेतृत्व की लंबी सूची है।

योगी सरकार में ब्राह्मण मंत्रियों की मौजूदगी हो, संगठन में उनकी भूमिका हो या राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व। बीजेपी लगातार यह संदेश देती रही है कि ब्राह्मण उसके साथ सुरक्षित हैं। हालांकि समय-समय पर यूपी में ब्राह्मण नाराजगी की चर्चा भी होती रही है। एनकाउंटर राजनीति, ठाकुर वर्चस्व के आरोप और कुछ चर्चित घटनाओं के बाद यह धारणा बनी कि ब्राह्मण समाज का एक वर्ग असहज है। मायावती उसी खाली जगह को भरने की कोशिश कर रही हैं।

लेकिन क्या सिर्फ नाराजगी वोट में बदल जाती है? जरूरी नहीं। क्योंकि आखिरकार चुनाव संगठन, संसाधन और नैरेटिव से जीते जाते हैं। और यहीं बसपा पिछड़ती नजर आती है।बसपा का जमीनी आंदोलन आज लगभग गायब है। मायावती की राजनीति काफी हद तक प्रेस रिलीज और सीमित सार्वजनिक कार्यक्रमों तक सिमटती दिखती है। युवा मतदाता का एक बड़ा वर्ग बसपा से भावनात्मक रूप से जुड़ा नहीं है। सोशल मीडिया और डिजिटल राजनीति में भी बसपा काफी कमजोर मानी जाती है, जबकि बीजेपी बूथ स्तर तक मजबूत है और सपा आक्रामक विपक्ष की भूमिका में है।

फिर भी मायावती को हल्के में लेना राजनीतिक भूल होगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरण पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। दलित वोट आज भी बसपा का कोर बेस है। अगर बसपा 12 से 15 प्रतिशत स्थायी वोट बनाए रखती है, तो कई सीटों पर गेम चेंजर बन सकती है।दूसरी बात, अगर बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर बढ़ती है और सपा को लेकर भी कुछ वर्गों में संदेह बना रहता है, तो बसपा तीसरे विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर सकती है। लेकिन इसके लिए सिर्फ ब्राह्मण सम्मेलन काफी नहीं होंगे।

2007 में मायावती सिर्फ नेता नहीं, बल्कि राजनीतिक लहर थीं। आज बसपा शांत, सीमित और रक्षात्मक पार्टी दिखाई देती है। अगर 2027 में वापसी करनी है, तो उसे फिर से राजनीतिक आक्रामकता दिखानी होगी।क्या 2027 में ब्राह्मण-दलित फॉर्मूला फिर से इतिहास रच सकता है? संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लेकिन 2007 की राजनीति अब उसी रूप में काम नहीं करेगी। यूपी बदल चुका है। मतदाता बदल चुका है। जातीय समीकरणों के साथ अब राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, वेलफेयर राजनीति और मजबूत नेतृत्व जैसे फैक्टर भी अहम हो चुके हैं।

अगर मायावती सिर्फ पुराने फॉर्मूले की याद में राजनीति करेंगी, तो शायद बसपा और सिकुड़ सकती है। लेकिन अगर वे नए सामाजिक गठबंधन, नए नेतृत्व और नए मुद्दों के साथ खुद को ढालने में कामयाब होती हैं, तो यूपी की राजनीति में फिर से जगह बना सकती हैं। क्योंकि राजनीति में कभी किसी को पूरी तरह खत्म नहीं माना जाता, और उत्तर प्रदेश की राजनीति वैसे भी चौंकाने वाले मोड़ों के लिए जानी जाती है।