
नागरिकता साबित करने की ज़िम्मेदारी लोगों पर नहीं डाली जा सकती: फैज़ान मुस्तफ़ा
कानून विशेषज्ञ प्रोफेसर फैजान मुस्तफा ने कहा कि भारत में पैदा हुए हर व्यक्ति को नागरिक माना जाए। पासपोर्ट को मिले कानूनी मान्यता।
AI with Sanket: संविधान विशेषज्ञ प्रोफेसर फैजान मुस्तफा ने नागरिकता साबित करने के मौजूदा नियमों और सरकारी बयानों पर गहरी चिंता जताई है। 'एआई विद संकेत' (AI With Sanket) कार्यक्रम में बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में, जहां करोड़ों लोगों के पास पूरे दस्तावेज नहीं हैं, वहां नागरिकता साबित करने का बोझ आम नागरिकों पर नहीं डाला जाना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि भारत में पैदा होने वाले हर व्यक्ति को तब तक भारतीय नागरिक माना जाना चाहिए, जब तक सरकार या कोई चुनौती देने वाला इसके खिलाफ सबूत पेश न कर दे।
यह बहस केंद्र सरकार के उस स्पष्टीकरण के बाद तेज हुई है, जिसमें कहा गया था कि पासपोर्ट कानूनी रूप से केवल एक यात्रा दस्तावेज (Travel Document) है, नागरिकता का प्रमाण नहीं। इस संदर्भ में प्रोफेसर मुस्तफा ने 'द फेडरल' से कानूनी स्थिति, पासपोर्ट एक्ट और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर विस्तार से बात की।
'पासपोर्ट एक्ट' खुद नागरिकता की गवाही देता है
विदेश मंत्रालय के इस तर्क पर कि पासपोर्ट सिर्फ यात्रा के लिए है, प्रोफेसर मुस्तफा ने कहा कि तकनीकी रूप से यह बात सही हो सकती है, लेकिन इसके व्यावहारिक और कानूनी पहलू बहुत बड़े हैं:
पासपोर्ट कानून की धारा 6(2)(a): पासपोर्ट एक्ट के तहत कोई भी गैर-भारतीय नागरिक पासपोर्ट के लिए आवेदन नहीं कर सकता। आवेदन करते समय व्यक्ति को खुद के भारतीय नागरिक होने का हलफनामा देना होता है। अगर यह घोषणा झूठी पाई जाती है, तो इसमें एक से पांच साल तक की जेल का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: सुप्रीम कोर्ट ने भी 'बिहार स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' मामले में साफ कहा था कि नागरिकता साबित करने के लिए पासपोर्ट एक बहुत बड़ा और मुख्य दस्तावेज है, जबकि अन्य दस्तावेज इस श्रेणी में नहीं आते।
अधिकारियों का विरोधाभास: सरकार खुद भारतीय नागरिकों को ही पासपोर्ट जारी करती है और किसी के विदेशी नागरिकता लेते ही उसे रद्द कर देती है। ऐसे में यह कहना कि खुद सरकार द्वारा जारी पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है, पूरी तरह तर्कहीन है।
नागरिकता का अनुमान क्यों है जरूरी?
प्रोफेसर मुस्तफा ने देश की जमीनी हकीकत को देखते हुए एक नए कानूनी दृष्टिकोण 'प्रिजम्प्शन ऑफ सिटीजनशिप' (नागरिकता का अनुमान) की वकालत की:
"कानून कई जगहों पर अनुमान के आधार पर काम करता है। मेरा प्रस्ताव सीधा है कि भारत में पैदा हुए हर व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना जाए। अगर किसी को उसकी नागरिकता पर शक है, तो साबित करने की जिम्मेदारी चुनौती देने वाले या सरकार की होनी चाहिए, न कि उस गरीब और अनपढ़ नागरिक की जिसके पास रहने का ठिकाना तक नहीं है।"
उन्होंने अंदेशा जताया कि अगर पूरे देश में नागरिकता की जांच का कोई अभियान चलाया गया, तो देश के लगभग 25 से 35 करोड़ लोग अपने या अपने माता-पिता के दस्तावेज जुटाने में नाकाम रहेंगे और भारी मुसीबत में फंस जाएंगे।
असम एनआरसी (NRC) से देश को क्या सीख मिली?
असम के उदाहरण पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वहां चार दशकों से नागरिकता को लेकर बहस चल रही है, इसलिए लोग दस्तावेजों को लेकर जागरूक थे। इसके बावजूद:
दस्तावेजों की कमी और खर्च: करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी 19 लाख लोग इस सूची से बाहर रह गए। इनमें सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को हुआ, जो शादी के बाद अपने मायके के दस्तावेज और संबंध साबित नहीं कर पाईं।
नतीजा सिफर: एनआरसी प्रक्रिया के सात साल बाद भी सूची में शामिल लोगों को नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं मिले हैं और जो बाहर छूटे हैं, उन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल से नोटिस तक नहीं मिल पाए हैं।
'स्टॉपेल का सिद्धांत' और प्रोफेसर मुस्तफा के दो बुनियादी सुझाव
प्रोफेसर मुस्तफा ने सरकार के सामने इस दुविधा को सुलझाने के लिए दो मुख्य कानूनी सिद्धांत रखे:
पहला सिद्धांत: भारत की धरती पर जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से नागरिक माना जाए, जब तक कि सरकार उसके विदेशी होने का पुख्ता सबूत न दे दे।
दूसरा सिद्धांत : जब सरकार ने खुद पुलिस वेरिफिकेशन (जांच) करने के बाद किसी व्यक्ति को पासपोर्ट या वोटर आईडी कार्ड जारी कर दिया है, तो सरकार बाद में अपनी ही बात से मुकर नहीं सकती। इन दोनों दस्तावेजों को नागरिकता का अंतिम और अकाट्य प्रमाण माना जाना चाहिए, क्योंकि वोटर लिस्ट में नाम केवल भारतीय नागरिकों का ही दर्ज होता है।
उन्होंने अंत में कहा कि कानून लोगों की जिंदगी को आसान बनाने के लिए होते हैं, उन्हें मुश्किलों में डालने के लिए नहीं। अगर बिना किसी तैयारी के ऐसे नियम थोपे गए, तो देश की एक बहुत बड़ी आबादी बिना किसी गलती के अपने ही देश में बेगानी हो जाएगी।
(ऊपर दिया गया कंटेंट एक फाइन-ट्यून्ड AI मॉडल का इस्तेमाल करके वीडियो से ट्रांसक्राइब किया गया है। एक्यूरेसी, क्वालिटी और एडिटोरियल इंटीग्रिटी पक्का करने के लिए, हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, जबकि हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम पब्लिकेशन से पहले कंटेंट को ध्यान से रिव्यू, एडिट और बेहतर बनाती है। द फेडरल में, हम भरोसेमंद और इनसाइटफुल जर्नलिज़्म देने के लिए AI की एफिशिएंसी को ह्यूमन एडिटर्स की एक्सपर्टीज़ के साथ मिलाते हैं।)
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