अंदरूनी कलह से सुलगा पंजाब-राजस्थान; कांग्रेस हाईकमान की बढ़ी टेंशन

12 Jun 2026 5:57 PM IST

पंजाब के सियासी संकट को सुलझाने के लिए खड़गे ने भेजे 3 ऑब्जर्वर. इधर राजस्थान में ढाई साल पहले ही छिड़ी गहलोत-पायलट जंग; 'डीकें मॉडल' के बाद बढ़ी रार.

Congress Internal Politics: आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी एक बार फिर आंतरिक गुटबाजी और कलह के दोहरे भंवर में फंसती नजर आ रही है. उत्तर भारत के दो बेहद महत्वपूर्ण राज्यों राजस्थान और पंजाब में चुनावी रण अभी दूर है, लेकिन संगठन के भीतर मची रार खुलकर सड़कों और सार्वजनिक मंचों पर आ गई है. नेताओं द्वारा एक-दूसरे को दी जा रही नसीहतों और बयानों ने कांग्रेस हाईकमान की रातों की नींद उड़ा दी है.


एक तरफ राजस्थान में कर्नाटक के 'बिना तमाशे वाले मुख्यमंत्री बदलाव' (डीके शिवकुमार फॉर्मूला) के बाद से बवाल खड़ा हो गया है, तो दूसरी तरफ पंजाब में स्थानीय निकाय चुनावों में करारी शिकस्त और 2027 के विधानसभा चुनाव में सालभर से भी कम समय बचने के बावजूद नेता आपस में ही उलझे हुए हैं.

राजस्थान: 'कुर्सी का मोह' या सुनियोजित चक्रव्यूह? गहलोत के दावे पर पायलट का 'संयम' वाला वार
राजस्थान में अगले विधानसभा चुनाव में अभी ढाई साल का समय बाकी है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की पुरानी अदावत एक बार फिर सतह पर आ गई है. इस नई चिंगारी की असल वजह कर्नाटक की तर्ज पर राजस्थान संगठन में संभावित बदलाव हैं, जहां कयास लग रहे हैं कि चुनाव से पहले सचिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी जा सकती है.

दोनों दिग्गजों के बीच क्या है जुबानी जंग?

अशोक गहलोत का बड़ा दावा: गहलोत ने हाल ही में वर्ष 2022 के हाई-प्रोफाइल राजनीतिक घटनाक्रम पर से पर्दा उठाते हुए दावा किया कि कांग्रेस आलाकमान उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना चाहता था और वे खुद भी इसके लिए तैयार थे. लेकिन कुछ नेताओं द्वारा ऐसी परिस्थितियां बनाई गईं कि वे चाहकर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ पाए. गहलोत ने कहा कि जनता के बीच जानबूझकर उनकी ऐसी छवि बनाई गई कि वे पद के लालची हैं, जिसके लिए उन्होंने बाद में सोनिया गांधी से मिलकर खेद भी जताया था.

सचिन पायलट का पलटवार: इस बयान के बाद सचिन पायलट ने सीधे तौर पर गहलोत का नाम तो नहीं लिया, लेकिन करौली में अपने पिता राजेश पायलट की प्रतिमा अनावरण कार्यक्रम में बेहद तीखा राजनीतिक संदेश दे दिया. पायलट ने दोटूक कहा कि राजनीति में संयम और अनुशासन सबसे जरूरी है. हमारे द्वारा बोले गए शब्दों का बहुत महत्व होता है; जो बात एक बार मुंह से निकल गई, वह वापस नहीं आती. इसलिए नेताओं को हमेशा सोच-समझकर बोलना चाहिए. पायलट का यह इशारा साफ तौर पर अशोक गहलोत की तरफ था.

पंजाब: निकाय चुनाव में झटके के बाद अलर्ट मोड पर खड़गे; नटराजन समेत 3 ऑब्जर्वर रवाना
पंजाब कांग्रेस की स्थिति राजस्थान से भी ज्यादा नाजुक हो चुकी है. हाल ही में स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी को करारा झटका लगा है, जिससे सबक लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लीकार्जुन खड़गे ने राज्य के बिगड़े हालात का आकलन करने के लिए तीन वरिष्ठ ऑब्जर्वर्स (पर्यवेक्षकों) की एक विशेष टीम को पंजाब भेजने का फैसला किया है. खड़गे ने अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजन लाल जाटव को जिम्मेदारी दी है कि वे तुरंत पंजाब का दौरा करें, जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं से फीडबैक लें और अपनी गोपनीय रिपोर्ट सीधे केंद्रीय नेतृत्व को सौंपें.

पंजाब में 'कैप्टन-सिद्धू' वाला पुराना दौर लौटा, रेस में टकरा रहे हैं तीन बड़े गुट
पंजाब कांग्रेस की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह आज भी अलग-अलग धड़ों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं में बंटी हुई है. हाल ही में दिल्ली में राहुल गांधी और खड़गे की मौजूदगी में हुई बैठक में भी पंजाब के नेता आपस में ही भिड़ गए थे. 2022 के विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू और चरनजीत सिंह चन्नी की आपसी लड़ाई ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया था. आज चेहरे बदल चुके हैं, लेकिन जंग वही है:

चरणजीत सिंह चन्नी का गुट: पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी लगातार दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठा रहे हैं और खुद को अगले चेहरे के रूप में पेश कर रहे हैं. उनका प्रताप सिंह बाजवा और मौजूदा अध्यक्ष राजा वडिंग के गुट से सीधा टकराव चल रहा है.

प्रताप सिंह बाजवा का धड़ा: विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाजवा और उनके समर्थक अपनी अलग मजबूत पकड़ का दावा कर रहे हैं. वे मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष के कामकाज और चन्नी की दावेदारी दोनों से असहमत हैं.

अमरिंदर सिंह राजा वडिंग का खेमा: वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष राजा वडिंग के नेतृत्व और हालिया चुनावी हार को लेकर संगठन के भीतर ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं. पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता उनके फैसलों को आसानी से स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं.

पंजाब और राजस्थान के इन हालातों से साफ है कि कांग्रेस की मुख्य चुनौती विरोधी दल नहीं, बल्कि उसकी अपनी आंतरिक कमजोरियां बनती जा रही हैं. अब देखना यह होगा कि दिल्ली में बैठी कांग्रेस लीडरशिप इन दोनों राज्यों के क्षत्रपों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने में कामयाब हो पाती है या नहीं.