क्रूड ऑयल सस्ता फिर भी पेट्रोल-डीजल महंगा, आखिर राहत कब?
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क्रूड ऑयल सस्ता फिर भी पेट्रोल-डीजल महंगा, आखिर राहत कब?

क्रूड ऑयल सस्ता होने के बावजूद पेट्रोल-डीजल महंगे हैं। जनता सवाल पूछ रही है कि संकट का बोझ उठाया तो राहत का लाभ कब मिलेगा?


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतों में कमी आ चुकी है। लेकिन देश में पेट्रोल की कीमत 100 रुपए के पार और डीजल की कीमत 100 के करीब है। मार्च- अप्रैल में पश्चिम एशिया में चरम तनाव की वजह से क्रूड के दामों में बेतहाशा इजाफा हो रहा था तो क्या ऑयल कंपनियों की वित्तीय सेहत पर असर नहीं पड़ रहा था। या कंपनियों की वित्तीय सेहत से अधिक चिंता केंद्र सरकार के लिए पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव थे। क्या सरकार की प्राथमिकता में ऑल कंपनियों की बैलेंस शीट से अधिक वोटों की फसल पर थी। लेकिन चार मई को चुनावी नतीजों के बाद सरकार को ऑयल कंपनियों की चिंता नजर आई। 15 मई से 25 मई यानी 11 दिनों में पेट्रोल की कीमतों में 7.40 रुपए डीजल की कीमत में 7.52 रुपए का इजाफा हुआ। लेकिन अब जब क्रूड के दाम 70 के करीब है तो लोग सवाल पूछ रहे है, फरियाद कर रहे हैं पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों से कब राहत मिलेगी।

ईरान जंग का क्रूड ऑयल पर असर

ईरान और अमेरिका के बीच टकराव ने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को हिला दिया। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई। भारत में भी यही कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय हालात की वजह से पेट्रोल और डीजल महंगे हो रहे हैं। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। जिस क्रूड ऑयल की कीमतें युद्ध के दौरान तेजी से बढ़ी थीं, वे अब फिर लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास लौट आई हैं। यानी काफी हद तक वही स्तर, जहां संकट शुरू होने से पहले थीं। ऐसे में अगर महंगाई का कारण क्रूड था, तो राहत का कारण भी वही क्रूड क्यों नहीं बन पा रहा? यह पूरा गणित समझना जरूरी है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसका मतलब साफ है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में जो भी होगा उसका असर भारत पर होगा।

क्रूड ऑयल और पेट्रोल-डीजल की कीमत

क्रूड ऑयल जब महंगा होता है तो आयात महंगा हो जाता है। जब आयात महंगा होता है तो रिफाइनरियों की लागत बढ़ती है और लागत बढ़ने की वजह से पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं। यह दलील अपनी जगह पर सही लगती है। लेकिन इस दलील का दूसरा पक्ष भी है। अगर यही गणित बढ़ोतरी के समय लागू होता है तो गिरावट के समय क्यों नहीं? आखिर पेट्रोल की कीमतों का निर्धारण कैसे होता है। सामान्य सोच यह है कि अगर कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल हो गया तो पेट्रोल अपने आप सस्ता हो जाना चाहिए। लेकिन असलियत थोड़ी अलग है। एक लीटर पेट्रोल की कीमत में सिर्फ कच्चे तेल की लागत ही शामिल नहीं होती। उसमें रिफाइनिंग का खर्च, फ्रेट, मार्केटिंग, डीलर कमीशन, केंद्र का टैक्स, राज्य का वैट और ऑयल कंपनियों का मार्जिन। यानी क्रूड केवल एक हिस्सा है।

क्रूड सस्ता तो पेट्रोल महंगा क्यों

अब आते हैं उस सवाल पर जिस पर सबसे ज्यादा राजनीति होती है। ईरान-अमेरिका तनाव अपने चरम पर था। क्रूड ऑयल के दाम ऊपर जा रहे थे। लेकिन कीमतें तत्काल नहीं बढ़ीं। फिर पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुडुचेरी विधानसभा चुनाव खत्म हुए। और उसके बाद कुछ ही समय में एक दफा नहीं तीन बार कीमतें बढ़ा दी गईं। ऐसे में विपक्ष और आम जन दोनों के मन में सवाल कि क्या सरकार विधानसभा चुनाव खत्म होने का इंतजार कर रही थी।

क्या तेल कंपनियां पूरी तरह आजाद हैं या सिर्फ कहने के लिए। क्या वास्तव में तेल कंपनियों पर सरकार दबाव नहीं बनाती। अब इसमें पेंच है। मसलन अगर तेल कंपनियां पूरी तरह आजाद है तो विधानसभा चुनाव के समय ही कीमत क्यों नहीं बढ़ाई गई। यानी कि शंका जाहिर करने का पूरा स्कोप है।

क्या ऑयल कंपनियां सचमुच नुकसान में थीं? सरकार और कंपनियां कहती हैं कि कई बार उन्हें अंडर रिकवरी झेलनी पड़ती है यानी कि कई बार लागत बढ़ जाती है लेकिन तुरंत कीमतें नहीं बढ़ाई जातीं। ऐसे में घाटे का सामना करना पड़ता है। यह तर्क पूरी तरह गलत भी नहीं है। लेकिन इसके उलट जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें कम होती हैं तब कंपनियां बेहतर मार्जिन कमाती हैं। यह भी सच्चाई है। कई बार रिफाइनिंग मार्जिन भी काफी ऊंचा रहता है। यानी अच्छे समय में कंपनियां मजबूत मुनाफा कमाती हैं। तो फिर सवाल बनता है कि अगर घाटे का बोझ साझा है तो मुनाफे का फायदा साझा क्यों नहीं?

ऊर्जा सुरक्षा या उपभोक्ताओं को राहत

इस पूरे मामले में सरकार कई तर्क पेश करती है। पहला, भारत को ऊर्जा सुरक्षा चाहिए। दूसरा, तेल कंपनियों की बैलेंस शीट मजबूत रहनी चाहिए। तीसरा, अगर भविष्य में बड़ा युद्ध हो जाए, सप्लाई रुक जाए, कीमतें 120 या 150 डॉलर तक पहुंच जाएं तो मजबूत कंपनियां ही झटका सह पाएंगी। ये सभी यह तर्क आर्थिक नजरिए से अहम है। क्योंकि ऊर्जा क्षेत्र में नकदी की उपलब्धता बहुत जरूरी होती है। रिफाइनरियों को खरीद करनी होती है। कच्चे तेल को स्टोर करना होता है। देशी भुगतान करना होता है। कहने का अर्थ यह है कि अगर कंपनियां लगातार कमजोर रहें तो पूरे ऊर्जा तंत्र पर असर पड़ सकता है। लेकिन जनता के सवालों को कैसे नजरंदाज किया जा सकता है। अगर कंपनियों की बैलेंस सीट का मजबूत होना जरूरी है तो क्या उपभोक्ता की वित्तीय सेहत जरूरी नहीं? पेट्रोल हर दफा महंगा होता है। फिर डीजल महंगा होता है, उसकी वजह से ट्रांसपोर्ट, सब्जी, दूध, सीमेंट, स्टील महंगा होता है। यानी कि पेट्रोल और डीजल सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। इसीलिए आम जन सवाल पूछते हैं कि जब संकट में हमने बोझ उठाया तो राहत के समय हमें हिस्सा क्यों नहीं?

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत का बड़ा हिस्सा टैक्स होता है। केंद्र एक्साइज लगाता है। राज्य वैट लगाते हैं। यानी अंतरराष्ट्रीय कीमत घटने के बाद भी अंतिम कीमत पर टैक्स का बड़ा असर रहता है। इसीलिए जानकार कहते हैं किअगर सरकार चाहे तो टैक्स में कमी करके तत्काल राहत दे सकती है। लेकिन सरकार का अपना पक्ष है। सरकारें कहती हैं कि उसी टैक्स से सड़कें, इन्फ्रास्ट्रक्चर बनता है। गरीबों के लिए योजनाएं चलती हैं। राज्यों की आय आती है। यानी कि मसला संतुलन स्थापित करने का है।

डायनेमिक प्राइसिंग पर सवाल

क्या रोजाना कीमत तय होने का मॉडल सही है? 2017 से भारत में डायनेमिक प्राइसिंग लागू है। यानी रोजाना कीमत तय होती है। इसका मकसद था कि वैश्विक बदलाव धीरे-धीरे जनता तक पहुंचे। लेकिन आलोचक कहते हैं कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा तेजी से लेकिन कमी उतनी तेजी से नजर नहीं आती। ऊर्जा सुरक्षा बनाम उपभोक्ता राहत यह बड़ा सवाल है। लेकिन क्या सरकार का पहला दायित्व कंपनियों की बैलेंस शीट होनी चाहिए या उपभोक्ताओं की जेब। है? इसका उत्तर शायद दोनों के बीच है क्योंकि अगर कंपनियां कमजोर होंगी तो ऊर्जा संकट आएगा। अगर जनता कमजोर होगी तो मांग घटेगी और अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।

जानकार कहते हैं कि कीमत तय करने का पारदर्शी फॉर्मूला सार्वजनिक हो। अंतरराष्ट्रीय कीमत घटने पर राहत की समयसीमा तय हो। टैक्स संरचना की समय-समय पर समीक्षा हो। असाधारण मुनाफे के समय उपभोक्ताओं को हिस्सा मिले। संकट के समय कंपनियों के लिए अलग से कोष बनाया जाए।

लोग यह नहीं कह रहे कि अंतरराष्ट्रीय बाजार का असर नहीं होना चाहिए। लोग यह भी नहीं कह रहे कि कंपनियां घाटे में चली जाएं। लोगों का सवाल सिर्फ इतना है कि अगर संकट में हमने महंगाई स्वीकार की. तो राहत के समय उसका लाभ हमें कब मिलेगा? अगर युद्ध के नाम पर कीमतें बढ़ सकती हैं तो शांति के नाम पर कीमतें क्यों नहीं घट सकतीं? अगर कंपनियों की वित्तीय सेहत राष्ट्रीय हित है तो आम नागरिक की आर्थिक सेहत क्या राष्ट्रीय हित नहीं है?आज जब क्रूड ऑयल फिर अपेक्षाकृत नीचे आ चुका है तो सवाल बनता है। क्या अब आम आदमी की बारी है? क्या अब पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा? या फिर राहत का इंतजार अभी और लंबा चलेगा?

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