चुनाव के दौरान सरकार की ओर से लगातार किए जा रहे 'फास्टेस्ट ग्रोइंग इकॉनमी' के दावों के बीच, भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अब गंभीर चिंताएं उभर रही हैं। एक तरफ रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर के बेहद करीब पहुंच गया है, तो दूसरी तरफ बढ़ती महंगाई और सप्लाई शॉक (Supply Shock) ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। 'द फेडरल देश' के साथ बातचीत में जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने सरकार को आईना दिखाते हुए कहा कि देश की मौजूदा आर्थिक बदहाली महज पश्चिम एशिया के युद्ध का परिणाम नहीं, बल्कि बरसों से चली आ रही 'गलत डेटा' और 'डिनायल मोड' (इनकार करने की नीति) का नतीजा है।
1. "सप्लाई शॉक ने खोल दी पोल"
प्रोफेसर अरुण कुमार ने स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने भारत के लिए 'सप्लाई शॉक' पैदा किया है। चूँकि भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों (क्रूड ऑयल और गैस) का 85-90% हिस्सा वहीं से आयात करता है, इसलिए जहाजों की आवाजाही रुकने से सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित हुई है।
उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "हमारी सरकार इतने महीनों तक 'डिनायल मोड' में रही। वे कहते रहे कि हमें कोई परेशानी नहीं होगी। अब जब गैस और पेट्रोल की कमी से खेती, ट्रांसपोर्ट और घरेलू बजट पर सीधा असर पड़ रहा है, तब सरकार को होश आ रहा है। यह क्राइसिस अचानक नहीं आया, इसे डेटा छिपाकर पहले दबाया गया था।"
2. 100 के करीब रुपया: 'लेवल ठीक होने दो' की थ्योरी घातक
रुपये की गिरावट पर सरकार के कुछ समर्थकों का यह तर्क कि 'रुपया अपना लेवल ढूंढ रहा है, 99 हो या 101, क्या फर्क पड़ता है', प्रोफेसर अरुण कुमार ने इसे बेहद खतरनाक और गलत नीति बताया।
क्यों गिर रहा है रुपया? प्रो. कुमार के अनुसार, भारत से 'पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट' और 'फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट' (FDI) लगातार बाहर जा रहा है। अमेरिका में तकनीक सेक्टर (AI, चैट जीपीटी) में शानदार रिटर्न के कारण विदेशी निवेशक वहां पैसा लगा रहे हैं।
स्पेकुलेशन का ख़तरा: रुपया गिरने से स्पेकुलेशन (सट्टेबाजी) बढ़ जाता है। एनआरआई (NRI) अपना पैसा निकाल रहे हैं, एक्सपोर्टर डॉलर रोक रहे हैं और इंपोर्टर घबराकर जल्दी पेमेंट कर रहे हैं। उन्होंने चेताया कि यदि रुपया गिरता रहा, तो यह 1997-98 के थाईलैंड क्राइसिस जैसा 'कॉन्टेजियन' (संक्रमण) बन सकता है, जिससे लाखों लोग गरीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं।
3.
'मेक इन इंडिया' और पीएलआई (PLI) स्कीम क्यों फेल हो रही हैं?सरकार की 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' और पीएलआई स्कीमों के दावों को खारिज करते हुए प्रो. कुमार ने कहा कि समस्या डिमांड (मांग) की है।
असंगठित क्षेत्र की बर्बादी: देश का 94% लेबर फोर्स असंगठित क्षेत्र में है। जब सरकार इन्हें संगठित करने के नाम पर कुचली या डिजिटल नीतियों के बोझ तले दबाती है, तो 7 करोड़ माइक्रो यूनिट्स बर्बाद हो जाती हैं। इससे लोगों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) खत्म हो जाती है, जिससे बाजार में डिमांड पैदा ही नहीं हो पा रही।
अमीरों का निवेश न करना: टेस्ला जैसी कंपनियों के भारत में न आने का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में 'लग्जरी मार्केट' का आकार बहुत छोटा है। जब भारत के अपने अरबपति और बड़े घराने निवेश करने के बजाय ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) के डर से पैसा देश से बाहर भेज रहे हैं, तो विदेशी निवेशक क्यों जोखिम लेंगे?
4. असली खतरा: 'ब्लैक इकॉनमी' (काला धन)
प्रोफेसर अरुण कुमार ने जोर देकर कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा विदेशी युद्ध नहीं, बल्कि देश की 'ब्लैक इकॉनमी' है।
"जब तक काले धन का कारोबार, जिसमें खुद रसूखदार राजनेता और भ्रष्ट व्यापारी शामिल हैं, बंद नहीं होगा, तब तक अर्थव्यवस्था ठीक नहीं हो सकती। बिलियंस ऑफ डॉलर्स यहाँ से बाहर जा रहे हैं। सरकार को अगर फॉरेक्स (Forex) चाहिए, तो उसे काला धन रोकना होगा, जिससे डायरेक्ट टैक्स-टू-जीडीपी रेशियो 6.5% से बढ़कर 16-17% तक पहुँच सके।"
समाधान क्या है?
प्रोफेसर अरुण कुमार ने सरकार को सलाह दी कि अब जुमलों का समय खत्म हो चुका है। सरकार को:
डिमांड जनरेट करें: असंगठित क्षेत्र को राहत दें, ताकि लोगों के हाथ में पैसा आए।
शिक्षा और स्वास्थ्य: शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाएं ताकि श्रम उत्पादकता बढ़े।
आरएंडडी (R&D): चीन की तरह जीडीपी का बड़ा हिस्सा रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च करें, तभी भारत मैन्युफैक्चरिंग हब बन पाएगा।
अंत में उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने अब भी हकीकत को स्वीकार नहीं किया और 'डेटा मैनेजमेंट' के सहारे चलती रही, तो देश एक गंभीर आर्थिक मंदी की ओर बढ़ रहा है।