चुनावी जीत या आर्थिक पतन? सुरजीत भल्ला ने खोले भारतीय अर्थव्यवस्था के राज
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य सुरजीत भल्ला ने विदेशी निवेश में कमी और सरकारी नीतियों पर उठाए गंभीर सवाल, देश के लिए बड़े रिफॉर्म का समय।

Indian Economy: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक के बाद एक चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत को लगातार मजबूत कर रही है। लेकिन क्या चुनावी मशीनरी के इस बेहतरीन प्रदर्शन के पीछे देश का आर्थिक मोर्चा कमज़ोर पड़ रहा है? यह सवाल किसी विपक्षी दल ने नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (PMEAC) के पूर्व सदस्य और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने उठाया है।
'द फेडरल देश' के विशेष कार्यक्रम 'श्रीनि से संवाद' में एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन के साथ बातचीत में इस इंटरव्यू के मुख्य अंशों और भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने खड़े संकटों पर विस्तार से चर्चा की गई।
1. "नज़र इकॉनमी से हट चुकी है"
एस. श्रीनिवासन ने सुरजीत भल्ला के लेख और इंटरव्यू का विश्लेषण करते हुए कहा कि भाजपा चुनाव जीतने की एक बेहतरीन मशीन बन चुकी है। एक चुनाव ख़त्म होते ही अगले चुनाव की तैयारी शुरू हो जाती है। लेकिन इसका नुकसान यह हुआ है कि सरकार की पैनी नज़र अब अर्थव्यवस्था से हट गई है (आई इज़ ऑफ द बॉल)। देश की जीडीपी भले ही आंकड़ों में 6.6% की दर से बढ़ती दिख रही हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत और विदेशी निवेशकों का रुख कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। पश्चिम एशिया के संकट, अमेरिका-ईरान तनाव और एनर्जी क्राइसिस (तेल आयात) के कारण देश की आर्थिक स्थिति पर काले बादल मंडरा रहे हैं।
2. विदेशी निवेशकों के मन में डर का कारण: BIT और टैक्स पॉलिसी
इंटरव्यू में सुरजीत भल्ला ने उन मुख्य कारणों को रेखांकित किया है, जिसकी वजह से विदेशी निवेशक (Foreign Investors) भारत आने से कतरा रहे हैं:
द्विपक्षीय निवेश संधि (Bilateral Investment Treaty - BIT): 2015 में सरकार द्वारा अपनाई गई नीति के तहत यदि कोई विदेशी पार्टनर भारतीय पार्टनर से विवाद के बाद बाहर निकलना चाहता है, तो वह तुरंत ऐसा नहीं कर सकता। उसे कम से कम 3 से 5 साल तक न्यायिक प्रक्रिया और मध्यस्थता (Arbitration) का इंतज़ार करना पड़ता है। भल्ला साहब ने इसका उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी शादी में अनबन हो जाए और अलग होने के लिए 5 साल रुकने को कहा जाए, तो स्थिति कितनी कठिन होगी। विदेशी निवेशक एक 'इमीडिएट एग्जिट' (तुरंत बाहर निकलने का रास्ता) चाहते हैं, जो भारत में नहीं मिल रहा।
रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स (Retrospective Tax) का ख़ौफ़: हालांकि 2012 के विवादित रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स (प्रणब मुखर्जी के समय का, जिससे वोडाफोन और केर्न एनर्जी प्रभावित हुए थे) को सरकार ने 2021 में कानूनन ख़त्म कर दिया है, लेकिन सुरजीत भल्ला का कहना है कि इसके प्रावधान आज भी 'स्टैच्यू बुक' (कानून की किताबों) में किसी कोने में मौजूद हैं। निवेशकों को डर है कि सरकार जब चाहेगी, इसे दोबारा लागू कर सकती है।
3. भारत का पैसा जा रहा है बाहर: डराने वाले आंकड़े
एस. श्रीनिवासन ने जनवरी 2026 के आंकड़ों का हवाला देते हुए एक बेहद चिंताजनक ट्रेंड की बात की। इस दौरान भारत में 5.67 बिलियन डॉलर का फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) आया, जबकि भारत से बाहर 4.92 बिलियन डॉलर गया। इसके अलावा, भारतीय उद्यमियों ने लगभग 2 बिलियन डॉलर का निवेश विदेशों में किया।
इसका सीधा मतलब यह है कि नेट फ्लो (Net Flow) के मामले में पैसा भारत से बाहर जा रहा है। भारत के अपने उद्यमी, जिनके पास निवेश करने की क्षमता है, वे खुद अपने देश में पैसा लगाने के बजाय बाहर जा रहे हैं।
4. तीसरी-चौथी जनरेशन के उद्यमी नहीं लेना चाहते रिस्क
इंटरव्यू में भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) की बात का संदर्भ देते हुए बताया गया कि भारत के बड़े बिज़नेस घरानों की तीसरी और चौथी पीढ़ी (नेपो किड्स) अब नया बिज़नेस शुरू करने या मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने का रिस्क नहीं लेना चाहती। वे कंपनियों का विस्तार करने और रोज़गार पैदा करने के बजाय शेयर बाज़ार या अन्य माध्यमों से केवल निवेश करके पैसा कमाना पसंद कर रहे हैं। इसके साथ ही, देश के भीतर केंद्रीय एजेंसियों (जैसे ED और CBI) के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण भी उद्योगपतियों में एक डर का माहौल है, जिससे वे नया जोखिम लेने से बच रहे हैं।
5. 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) का फायदा उठाने में चूका भारत
कुछ साल पहले तक सरकार यह दावा कर रही थी कि चीन से हटने वाली कंपनियां भारत का रुख करेंगी। लेकिन सुरजीत भल्ला के मुताबिक, भारत इस गलतफहमी में रह गया कि विशाल बाज़ार होने के कारण निवेशक कहीं और जा ही नहीं सकते। हकीकत यह है कि भारत की तुलना में वियतनाम, बांग्लादेश और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपनी बेहतर नीतियों के कारण इस अवसर का कहीं ज़्यादा फायदा उठाया है।
6. 1991 जैसे बड़े रिफॉर्म की ज़रूरत
सुरजीत भल्ला का मानना है कि वर्तमान में देश के सामने कई संकट (कृषि क्षेत्र में एल नीनो/ला नीना का प्रभाव, तेल संकट और निवेश की कमी) एक साथ आ गए हैं। लेकिन किसी भी देश के लिए संकट ही सबसे बड़ा अवसर होता है। जैसे 1991 के वित्तीय संकट के समय भारत ने अपनी औद्योगिक नीति बदली, एमआरटीपी (MRTP) एक्ट को हटाया और अर्थव्यवस्था को खोला, ठीक वैसा ही साहसिक कदम और बड़ा आर्थिक सुधार अब मोदी सरकार को उठाना चाहिए।
देश के शीर्ष नेतृत्व और वित्त मंत्री भले ही यह दावा कर रहे हों कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सब कुछ ठीक-ठाक है, लेकिन सरकार द्वारा ही आईएमएफ (IMF) भेजे गए और सरकार के बेहद करीबी रहे अर्थशास्त्री की यह चेतावनी आंखें खोलने वाली है। देखना होगा कि सरकार इन नीतियों में सुधार करती है या इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ करना जारी रखती है।

