सियासत: सपा में टूट का राजभर वाला दावा कितना सच क्या दोहराएगा इतिहास
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सियासत: सपा में टूट का राजभर वाला दावा कितना सच क्या दोहराएगा इतिहास

द फेडरल देश के कार्यक्रम सियासत में देखिए कि क्या ओपी राजभर के दावों के बाद समाजवादी पार्टी में 2016 जैसा कोई बड़ा राजनीतिक भूचाल आने वाला है।


Siyasat: द फेडरल देश के विशेष कार्यक्रम 'सियासत' में इस बार बात समाजवादी पार्टी (सपा) की। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि क्या वाकई सपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है? क्या कोई बड़ा चेहरा नेतृत्व से नाराज चल रहा है? या फिर लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी के भीतर नए शक्ति केंद्र उभर रहे हैं?


ये सवाल इसलिए अहम हैं क्योंकि अभी तक न तो किसी सांसद ने खुलकर बगावत का ऐलान किया है और न ही किसी बड़े नेता ने पार्टी छोड़ने के संकेत दिए हैं। लेकिन सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के दावे ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में सस्पेंस का नया अध्याय जरूर खोल दिया है। यही वजह है कि अब हर नजर समाजवादी पार्टी के भीतर चल रही गतिविधियों पर टिक गई है। लेकिन सवाल है कि क्या समाजवादी पार्टी में टूट की बात पहली बार हो रही है? बिल्कुल नहीं।


इतिहास के पन्नों से: जब 2016 में टूट के मुहाने पर थी 'साइकिल'
अगर उत्तर प्रदेश की राजनीति के पिछले एक दशक पर नजर डालें, तो समाजवादी पार्टी पहले भी एक बड़े राजनीतिक भूचाल का सामना कर चुकी है।

साल था 2016: पार्टी के भीतर सत्ता, संगठन और उत्तराधिकार की लड़ाई खुलकर सामने आ चुकी थी।

त्रिकोणीय संघर्ष: एक तरफ थे मुलायम सिंह यादव, दूसरी तरफ थे उनके भाई शिवपाल यादव और तीसरी तरफ थे तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव।

जो संघर्ष बंद कमरों में शुरू हुआ था, वह देखते ही देखते सार्वजनिक जंग में बदल गया। पार्टी कार्यालय से लेकर मंचों तक आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। नेताओं को निकाला गया, फिर वापस लिया गया, बैठकें हुईं, शक्ति प्रदर्शन हुए और आखिरकार मामला चुनाव आयोग तक पहुंच गया।

उसे समय भी यही कहा जा रहा था कि समाजवादी पार्टी टूट के मुहाने पर खड़ी है। हालांकि, अखिलेश यादव ने सूझबूझ दिखाते हुए संगठन और विधायकों का बड़ा हिस्सा अपने साथ बनाए रखा और चुनाव आयोग से 'साइकिल' चुनाव चिन्ह भी हासिल कर लिया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई; कुछ साल बाद शिवपाल यादव ने अपनी अलग पार्टी बना ली और समाजवादी परिवार का वह संघर्ष हमेशा के लिए राजनीतिक इतिहास का हिस्सा बन गया।

2016 बनाम आज: तब लड़ाई 'परिवार' में थी, अब 'नेताओं' का दावा
अब 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर सपा में टूट की चर्चाएं गर्म हैं। लेकिन इस बार के दावों में एक बड़ा अंतर है:

"उस समय लड़ाई परिवार के भीतर थी और इस बार दावा किया जा रहा है कि असंतोष सांसदों और नेताओं के बीच है।"

यही वजह है कि ओम प्रकाश राजभर के बयान को राजनीतिक हलकों में हल्के में नहीं लिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह पुराना इतिहास रहा है कि यहाँ अफवाहें अक्सर वहीं से जन्म लेती हैं, जहां कहीं न कहीं कोई राजनीतिक हलचल या असंतोष जरूर सुलग रहा होता है।

सच या सिर्फ विपक्षी राजनीति को अस्थिर करने का प्रयास?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार भी पर्दे के पीछे वैसा ही कोई आंतरिक असंतोष चल रहा है, जैसा 2016 में था? या फिर यह सब सिर्फ और सिर्फ 2027 के चुनाव से पहले विपक्षी राजनीति को कमजोर और अस्थिर दिखाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है?

राजभर के दावों में कितना दम है और अखिलेश यादव इस नए राजनीतिक दबाव से अपनी 'साइकिल' को कैसे सुरक्षित रखते हैं, इसी पर टिकी हैं 'सियासत' के गलियारों की तमाम निगाहें।


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