ओमान तट विवाद: जहाजों पर अमेरिकी हमलों के पीछे क्या है खेल?

12 Jun 2026 6:03 PM IST

भारतीय जहाजों पर अमेरिकी मिसाइल हमलों को लेकर दिल्ली में जेसन मीक्स तलब। विशेषज्ञों ने कहा- ईरान से रुपये में तेल व्यापार रोकने के लिए दबाव बना रहा है अमेरिका।

US Navy Killed Three Indian Sailors: ओमान के तट (Gulf of Oman) पर व्यापारिक जहाजों पर हो रहे लगातार हमलों को लेकर भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बार फिर दिल्ली में तैनात अमेरिकी कार्यकारी राजदूत जेसन मीक्स को तलब कर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है। हाल ही में एक और कमर्शियल जहाज को निशाना बनाया गया, जिसमें 20 भारतीय क्रू सदस्य सवार थे। पिछले चार दिनों में यह तीसरा ऐसा हमला है, जिसने भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं।


'द फेडरल देश' की वरिष्ठ पत्रकार नीलू व्यास के साथ इस विषय पर हुई विशेष चर्चा में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ कमाल पाशा और वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर ने इस पूरे भू-राजनीतिक संकट के पीछे की मुख्य वजहों को उजागर किया है।

क्या है ओमान तट का पूरा विवाद?
ओमान के तट और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर हमले की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिका द्वारा इन वाणिज्यिक जहाजों पर किए जा रहे हमलों में अब तक 5 भारतीय नाविकों की जान जा चुकी है, जिनमें से 3 नाविकों की मौत हाल ही में हुए हमलों में हुई है।

चर्चा के दौरान यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि ये जहाज कोई सैन्य या युद्धपोत नहीं हैं, बल्कि निहत्थे मर्चेंट शिप्स हैं, जिन पर काम करने वाले सभी नागरिक सिविलियन सेलर्स हैं। इसके बावजूद अमेरिका द्वारा इन पर 'हेलफायर' जैसी घातक मिसाइलों से हमला किया जाना बेहद गंभीर और अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन है।

अमेरिका क्यों कर रहा है मर्चेंट शिप्स पर हमले?
विशेषज्ञ कमल पाशा के अनुसार, इन हमलों के पीछे अमेरिका की एक सोची-समझी रणनीतिक और आर्थिक मंशा है:

ईरान-अमेरिका के बीच संभावित डील: ईरान और अमेरिका के बीच जल्द ही प्रतिबंधों में ढील को लेकर एक समझौता होने की संभावना है, जिसके बाद ईरान का तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में आने लगेगा।

रुपये में व्यापार से चिढ़ा अमेरिका: प्रतिबंध हटने के बाद भारत, ईरान से सस्ते दामों पर तेल आयात करना शुरू कर सकता है। चूंकि भारत और ईरान के बीच यह व्यापार भारतीय रुपये (INR) में हो सकता है, जिससे भारत अपने डॉलर (Foreign Exchange) बचा सकेगा।

ब्रिक्स (BRICS) एजेंडे पर दबाव: अमेरिका को डर है कि इस कदम से ब्रिक्स देशों का 'डी-डॉलरॉइजेशन' (डॉलर पर निर्भरता कम करने) का एजेंडा मजबूत होगा। इसलिए, वह इन रूटों पर चल रहे टैंकर्स को निशाना बनाकर भारत को यह चेतावनी दे रहा है कि वह ईरान के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाने से दूर रहे।

भारत के सॉफ्ट स्टैंड और मुआवजे पर उठे सवाल
वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर ने भारत सरकार के अब तक के ढुलमुल रवैए पर सवाल उठाते हुए कहा कि सोशल मीडिया (विशेषकर इंस्टाग्राम और ट्विटर) पर जनता के भारी दबाव के बाद ही विदेश मंत्रालय ने दोबारा अमेरिकी राजनयिक को तलब किया है।

मुआवजे में भारी विसंगति: वर्तमान में मारे गए भारतीय नाविकों के परिवारों को महज $80,000 (लगभग ₹66 लाख) का मुआवजा मिल रहा है, जबकि अमेरिकी नाविकों का ग्रुप इंश्योरेंस ही $500 मिलियन का होता है और उनके परिवारों को जीवनभर आधी सैलरी मिलती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत सरकार को अमेरिका से भारतीय नागरिकों के लिए भी 'अमेरिकन रेट्स' पर मुआवजे की मांग करनी चाहिए।

कड़े कदम उठाने की जरूरत: केवल लो-लेवल डिप्लोमैट्स को बुलाकर विरोध पत्र (Protest Note) सौंपना काफी नहीं है। भारत के लगभग 3 लाख नाविक इस समुद्री क्षेत्र में काम करते हैं। यदि अमेरिका लगातार इन निहत्थे जहाजों पर हमले कर रहा है, तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर को सीधे अमेरिकी विदेश मंत्री (मार्को रुबियो) से बात कर सख्त लहजे में चेतावनी देनी चाहिए और इस मामले को संयुक्त राष्ट्र (United Nations) में उठाना चाहिए।