तेल संकट से क्या भारत की अर्थव्यवस्था हिलने वाली है? देखें Video
अमेरिका और ईरान के बीच भले ही सीजफायर लागू हो, लेकिन जमीनी हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। एक तरफ युद्धविराम की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ सैन्य हमले और जवाबी कार्रवाई जारी हैं।

क्या होर्मुज स्ट्रेट अब दुनिया की सबसे खतरनाक जंग का मैदान बनने जा रहा है? अगर अमेरिका समझौता चाहता है तो फिर ईरान पर हमले क्यों बढ़ा रहा है? क्या अमेरिका शांति वार्ता के नाम पर ईरान की सैन्य ताकत खत्म करना चाहता है? अगर तेल सप्लाई लंबे समय तक बाधित रही तो भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा संकट आएगा? क्या भारत इस आने वाले ऊर्जा संकट के लिए तैयार है? इन सवालों के बीच अमेरिका ने बंदर अब्बास पर हमला किया ह अमेरिका ने बंदर अब्बास पर निशाना क्यों साधा।
अमेरिका का दावा है कि ईरान की तरफ से चार ड्रोन लॉन्च किए गए थे और पांचवां ड्रोन लॉन्च होने वाला था लिहाजा ड्रोन कंट्रोल सेंटर को निशाना बनाया गया। अमेरिका कह रहा है कि यह रक्षात्मक कार्रवाई थी। लेकिन मुद्दा यह है कि अगर बात रक्षा की थी हमला ईरान के सबसे संवेदनशील सैन्य क्षेत्र में क्यों हुआ? क्योंकि मई महीने में यह तीसरा हमला है। 7 मई को होर्मुज प्रांत और खाड़ी में जहाजों पर हमला, 25 मई को IRGC की माइन बिछाने वाली नावों और SAM साइट पर हमला। 27 मई को ड्रोन कंट्रोल सेंटर तबाह। इसका मतलब यह हुआ कि यानी साफ है अमेरिका सिर्फ जवाब नहीं दे रहा बल्कि लगातार दबाव बना रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट इतना अहम क्यों है। यह सिर्फ समुद्र में रास्ता भर नहीं है, यह दुनिया की ऊर्जा नस है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के मुताबिक दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है। हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल यानी 20 मिलियन बैरल प्रति दिन इस रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत, कतर इन सभी देशों की ऊर्जा सप्लाई इसी रास्ते पर निर्भर है। सबसे अहम बात भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक होर्मुज पर टिकी हुई है।
ईरान जानता है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत क्या है और वो है होर्मुज। ईरान के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना नहीं है। सबसे आधुनिक एयरफोर्स भी नहीं है। लेकिन उसके पास भूगोल है। होर्मुज स्ट्रेट इतना संकरा है कि वहां बड़ी नौसैनिक ताकत भी सीमित हो जाती है। स्पीड बोट्स, ड्रोन, समुद्री माइंस के जरिए ईरान दुनिया की सबसे बड़ी नौसेनाओं को भी चुनौती देने की क्षमता रखता है। ईरान का संदेश साफ है अगर हम पर दबाव बढ़ा तो दुनिया की तेल सप्लाई भी सुरक्षित नहीं रहेगी।
अब सीधे भारत की बात करते हैं भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। भारत हर दिन करीब 50 लाख बैरल तेल आयात करता है। अगर तेल की कीमत सिर्फ 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है तो भारत का आयात बिल अरबों डॉलर बढ़ जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक और कई आर्थिक एजेंसियों के अनुसार कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत की जीडीपी ग्रोथ पर 0.2 से 0.3 प्रतिशत तक असर पड़ सकता है। अगर होर्मुज लंबे समय तक प्रभावित रहा और कच्चा तेल 120 डॉलर या 150 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया तो क्या होगा? पेट्रोल महंगा, डीजल महंगा, हवाई यात्रा महंगी, ट्रांसपोर्ट महंगा खाद्य पदार्थ महंगे यानी महंगाई का विस्फोट और इसका सबसे बड़ा असर किस पर पड़ेगा आम आदमी पर।
भारत के लिए सिर्फ तेल नहीं, सुरक्षा का भी संकट है। यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं है। खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ UAE और सऊदी अरब में ही लाखों भारतीय कामगार हैं। अगर क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनी तो भारतीय नागरिकों की सुरक्षा बड़ा मुद्दा बन जाएगी। भारत को बड़े पैमाने पर नागरिकों को निकालने के लिए अभियान चलाना पड़ सकता है। कुवैत युद्ध, यमन संकट सूडान संकट के समय भारत को अपने नागरिकों को निकालने के लिए बड़े ऑपरेशन चलाने पड़े थे। लेकिन इस बार मामला और बड़ा हो सकता है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में भारतीयों की संख्या बहुत ज्यादा है। अगर खाड़ी में युद्ध भड़का तो क्या भारत सबसे बड़ा निकासी अभियान चलाने के लिए तैयार है?
भारत के पास विकल्प क्या हैं? पहला विकल्प, तेल के लिए भारत सिर्फ खाड़ी देशों पर निर्भर ना रहे। अमेरिका और अफ्रीकी देशों से भी आयात बढ़ाने की कोशिश। दूसरा विकल्प रणनीतिक तेल भंडार। भारत ने स्ट्रैटिजिक पेट्रोलियम भंडार बनाए हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे संकट के लिए यह पर्याप्त नहीं हैं। तीसरा विकल्प कूटनीतिक संतुलन का है। भारत अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है लेकिन ईरान के साथ भी उसके गहरे संबंध हैं। यानी भारत खुलकर किसी एक पक्ष में नहीं जा सकता।
क्या अमेरिका और ईरान सच में युद्ध चाहते हैं? दिलचस्प बात ये है कि दोनों देश खुला युद्ध नहीं चाहते। अमेरिका जानता है कि नया मध्य-पूर्व युद्ध बेहद महंगा होगा। अफगानिस्तान और इराक के बाद अमेरिकी जनता लंबे युद्धों से थक चुकी है। दूसरी तरफ ईरान भी जानता है कि पूर्ण युद्ध उसकी अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता है। तो फिर यह सब क्यों? क्योंकि दोनों देश नियंत्रित तनाव के सिद्धांत पर काम कर रहे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि दबाव बना रहे लेकिन इतना नहीं कि पूरा युद्ध शुरू हो जाए। यही सबसे खतरनाक स्थिति होती है। क्योंकि यहां छोटी गलती भी बड़े युद्ध का रास्ता खोल देती है।
क्या समझौते की जमीन तैयार हो रही है? दिलचस्प बात ये है कि इसी तनाव के बीच एक और बड़ी खबर सामने आई है। ईरान ने दावा किया है कि अमेरिका के साथ संभावित समझौते का शुरुआती ड्राफ्ट तैयार हो गया है। रॉयटर्स के मुताबिक इस ड्राफ्ट में कहा गया है कि अमेरिका ईरान के आसपास से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करेगा। नौसैनिक घेराबंदी हटाएगा। इसके बदले ईरान 30 दिनों के भीतर होर्मुज में जहाजों की आवाजाही सामान्य करेगा। लेकिन यहां भी एक ट्विस्ट है। रिपोर्ट कहती है कि यह व्यवस्था अमेरिकी सैन्य जहाजों पर लागू नहीं होगी।
अमेरिका ईरान पर दबाव बनाए रखना चाहता है। ईरान अपनी रणनीतिक ताकत दिखाना चाहता है। और बीच में फंसी है पूरी दुनिया। भारत के लिए यह सिर्फ विदेश नीति का मुद्दा नहीं है। यह आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है।अगर हालात संभल गए तो राहत मिल सकती है। लेकिन अगर तनाव और बढ़ा तो उसका असर दिल्ली से मुंबई और पेट्रोल पंप से रसोई तक महसूस होगा।

