जन्मदर बढ़ाने के लिए सिर्फ पैसा नहीं, भरोसेमंद नीतियां चाहिए
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जन्मदर बढ़ाने के लिए सिर्फ पैसा नहीं, भरोसेमंद नीतियां चाहिए

जेएनयू प्रोफेसर संघमित्रा आचार्य ने कहा कि पैसे का लालच देकर वोट ले सकते हैं लेकिन बच्चा नहीं। प्रजन्न दर बढ़ाने के लिए किफायती घर, नौकरी, चाइल्डकेयर और पैरेंटल सपोर्ट उपलब्ध कराने होंगे।


India's Birth Rate : "सरकारें महिलाओं के प्रजनन व्यवहार को वोटिंग व्यवहार समझने की भूल कर रही हैं। 30 या 40 हजार रुपये का नकद लालच किसी का वोट तो बदल सकता है, लेकिन यह किसी जोड़े को तीसरा या चौथा बच्चा पैदा करने के लिए कभी राजी नहीं कर सकता।" यह बेबाक कहना है जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ की प्रोफेसर संघमित्रा आचार्य का।


भारत के कई राज्यों में प्रजनन दर (फर्टिलिटी रेट) तेजी से नीचे गिर रही है। इससे घबराकर राज्य सरकारें मुफ्त आईवीएफ (IVF) इलाज और ज्यादा बच्चे पैदा करने पर नकद इनाम जैसी घोषणाएं कर रही हैं। 'द फेडरल' को दिए एक विशेष इंटरव्यू में प्रोफेसर आचार्य ने समझाया कि आखिर क्यों ये शॉर्टकट योजनाएं पूरी तरह बेअसर साबित होंगी और इस गिरावट को रोकने के लिए असल में किन बुनियादी बदलावों की जरूरत है।


मुफ्त IVF और कैश हैंडआउट्स क्यों हैं नाकाम?
दक्षिण के राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश में तीसरे बच्चे पर नकद राशि और तमिलनाडु, कर्नाटक व गोवा में मुफ्त आईवीएफ जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। प्रोफेसर आचार्य इन्हें महज प्रतीकात्मक (सिंबॉलिक) मानती हैं:

सीमित दायरा: बांझपन (Infertility) से जूझ रहे जोड़े कुल प्रजनन आयु आबादी का बहुत छोटा हिस्सा हैं। इसलिए केवल आईवीएफ पर सब्सिडी देने से देश के जनसांख्यिकीय (Demographic) ढांचे में कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला।

बदलता लाइफस्टाइल: आधुनिक समय में छोटा परिवार रखना एक सोच-समझकर लिया गया फैसला है। आज युवा देर से शादियां कर रहे हैं और कई अकेले रहने का विकल्प चुन रहे हैं। शहरीकरण, करियर का दबाव और समाज में जेंडर असमानता इसके मुख्य कारण हैं।

वैश्विक उदाहरण: जापान ने अपनी जीडीपी (GDP) का एक बड़ा हिस्सा फर्टिलिटी बढ़ाने में झोंक दिया, लेकिन वह इस गिरावट को नहीं रोक पाया। इसकी वजह वहां काम के लंबे घंटे, शहरी आवास की कमी और पुरुष-महिला के बीच काम का पुराना ढर्रा है। इसके विपरीत, फ्रांस और नॉर्डिक देशों (स्वीडन, नॉर्वे) को थोड़ी सफलता इसलिए मिली क्योंकि उन्होंने मजबूत चाइल्डकेयर सिस्टम और माता-पिता दोनों को समान पैरेंटल लीव दी।

असंगठित क्षेत्र की अनदेखी और मैटरनिटी लीव का सच
प्रोफेसर आचार्य ने 1940 के दशक में डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा श्रमिक महिलाओं के हक में किए गए शुरुआती प्रयासों का जिक्र करते हुए आज की स्थिति पर चिंता जताई:

सिर्फ सरकारी/कॉर्पोरेट तक सीमित: आज देश में 6 महीने की पेड मैटरनिटी लीव (सवैतनिक मातृत्व अवकाश) और पेटरनिटी लीव के नियम तो हैं, लेकिन इसका फायदा सिर्फ संगठित या औपचारिक क्षेत्र (Formal Sector) को ही मिल रहा है।

असंगठित क्षेत्र बेसहारा: भारत में रोजगार का सबसे बड़ा हिस्सा असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) से आता है। यहां छुट्टियां पूरी तरह मालिक की मर्जी पर टिकी हैं। जब तक सरकार निजी और असंगठित क्षेत्र को साथ लेकर काम के अनुकूल माहौल नहीं बनाएगी, तब तक कामकाजी महिलाएं बच्चा पैदा करने का जोखिम नहीं लेंगी क्योंकि उन्हें करियर छूटने का डर रहता है।

दक्षिण बनाम उत्तर भारत: क्यों आई भारी गिरावट?
आंध्र प्रदेश और अन्य दक्षिणी राज्यों ने दशकों तक 'हम दो, हमारे दो' या 'हम दो, हमारा एक' के नारों को पूरी मुस्तैदी से लागू किया। अब वहां आबादी घट रही है, जिससे उन्हें परिसीमन (Delimitation) के बाद लोकसभा सीटें खोने का डर सता रहा है। उत्तर और दक्षिण के इस अंतर पर प्रोफेसर ने मुख्य बिंदु रखे:

महिला और पुरुष साक्षरता: दक्षिण भारत में केवल महिला ही नहीं, बल्कि पुरुष साक्षरता दर भी बहुत बेहतर है। पढ़ाई के कारण वहां शादी की उम्र बढ़ी है, जिससे बच्चा पैदा करने का समय (रिप्रोडक्टिव विंडो) छोटा हो गया है।

महंगी शिक्षा और घर: दक्षिण के शहरों में मकानों की भारी कमी और अत्यधिक किराया है। इसके साथ ही, सरकारी स्कूलों के मुकाबले प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की महंगी फीस के चलते माता-पिता खुद ही एक से ज्यादा बच्चा पैदा करने से बचते हैं।

समाधान: 'थ्री-जनरेशन' (तीन पीढ़ियों) के संयुक्त परिवार की वापसी
प्रोफेसर आचार्य के अनुसार, बच्चों के पालन-पोषण के लिए केवल पैसे नहीं, बल्कि एक सुरक्षित बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है।

बुनियादी सुरक्षा: माता-पिता को कैश नहीं, बल्कि बच्चे की सस्ती और अच्छी पढ़ाई, रहने के लिए किफायती घर और रोजगार की पक्की गारंटी चाहिए।

अकेलापन दूर करना: आधुनिक शहरीकरण ने संयुक्त परिवारों को तोड़कर न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) बना दिया है। ऐसे में कामकाजी जोड़ों के पास बच्चों की देखभाल के लिए कोई नहीं होता।

बुजुर्गों को साथ लाना: हमें अपनी आवास प्रणालियों और सोच को दोबारा ऐसा ढालना होगा, जहां दादा-दादी या नाना-नानी (बुजुर्गों) को ओल्ड-एज होम भेजने के बजाय वापस परिवार का हिस्सा बनाया जाए। तीन पीढ़ियों का एक साथ रहना चाइल्डकेयर के मानसिक और शारीरिक बोझ को आधा कर देता है, जिससे जोड़े नए परिवार के बारे में सकारात्मक सोच सकते हैं।

(ऊपर दिया गया कंटेंट एक फाइन-ट्यून्ड AI मॉडल का इस्तेमाल करके वीडियो से ट्रांसक्राइब किया गया है। एक्यूरेसी, क्वालिटी और एडिटोरियल इंटीग्रिटी पक्का करने के लिए, हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, जबकि हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम पब्लिकेशन से पहले कंटेंट को ध्यान से रिव्यू, एडिट और बेहतर बनाती है। द फेडरल में, हम भरोसेमंद और इनसाइटफुल जर्नलिज़्म देने के लिए AI की एफिशिएंसी को ह्यूमन एडिटर्स की एक्सपर्टीज़ के साथ मिलाते हैं।)


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