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भारत की अर्थव्यवस्था पर संकट! 100 के पार जाएगा डॉलर? FDI आ नहीं रहा, FPI बाहर जा रहा

रुपये में गिरावट के पीछे कई बड़ी वजहें हैं, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें जो कि पश्चिम एशिया में तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों के कारण महंगा हुआ है क्योंकि भारत अपने खपत का 80 फीसदी तेल आयात करता है, इसलिए इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ गया है.


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क्या भारत की अर्थव्यवस्था चुनौतियों का सामना कर रही है? क्या भारत की अर्थव्यवस्था पर कोई तूफान आने वाला है? इन दिनों सरकार हो या विपक्ष दोनों ही यही बातें कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों से राष्ट्रभक्ति को सर्वोपरि रखते हुए नागरिकों को पेट्रोल डीजल के खपत को घटाने, सोना एक साल तक नहीं खरीदने, विदेश यात्रा नहीं करने से लेकर खाने के तेल का कम इस्तेमाल करने और खेती में खाद का कम से कम इस्तेमाल करने का संकल्प दिला रहे हैं. तो विपक्ष के बड़े नेता राहुल गांधी बार-बार याद दिला रहे हैं कि हिंदूस्तान पर आर्थिक तूफान आ रहा है. एक बात को समझ में आती कि पश्चिम एशिया में तनाव के चलते ये हालात पैदा हुए हैं. पर सबसे ज्यादा इस संकट में भारत ही क्यों नजर आ रहा है? कुछ दिनों पहले तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का जो दंभ भरा जा रहा था उसका क्या हुआ? दुनिया की सबसे तेज गति से विकास कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर जो पीठ थपथपाई जा रही थी उसका क्या हुआ?

अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच युद्ध तो 28 फरवरी को शुरू हुआ. सीजफायर भी हो गया. बीच में 4 राज्यों और 1 केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव था तब भारतीय अर्थव्यवस्था पर आए इस संकट की कोई चर्चा नहीं कर रहा था लेकिन चुनाव खत्म होते ही नागरिकों को सावधान किया जा रहा है. लेकिन आपके लिए ये जानना जरूरी है कि ऐसा नहीं है कि पश्चिम एशिया में तनाव के बाद से ही अर्थव्यवस्था पर ये संकट आया है. बल्कि साल 2026 की शुरूआत से ही भारत की अर्थव्यवस्था पर काले बादल मंडरा रहे थे. 2026 की शुरुआत में एक डॉलर के मुकाबले रुपया 89 रुपये पर था वो करीब 8 फीसदी गिरकर 97 रुपये के करीब जा पहुंचा है और कभी भी 100 रुपये के आंकड़े को छू सकता है. भारत की करेंसी एशिया की सबसे कमजोर करेंसी बन चुकी है.

रुपये की इस गिरावट के पीछे कई बड़ी वजहें हैं, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें जो कि पश्चिम एशिया में तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों के कारण महंगा हुआ है क्योंकि भारत अपने खपत का 80 फीसदी तेल आयात करता है, इसलिए इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ गया है. तो शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI ने भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से बड़ी मात्रा में पैसा निकाल रहे हैं. इससे भारत के भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट पर दबाव बढ़ा है. दुनिया भर में अमेरिकी डॉलर मजबूत बना हुआ है. ऐसे में भारत जैसे उभरते देशों की करेंसी पर ज्यादा दबाव पड़ता है और इसलिए रुपया कमजोर होता जा रहा है. भारत के लिए बड़ा संकट ये भी है

देश में FDI फ्लो में लगातार घट रहा है. जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा जरूरत विदेशी निवेश की है. अगर विदेशी पैसा नहीं आया, तो रुपया लगातार कमजोर होता रहेगा. केवल सरकार के आयात घटाने और खर्च घटाने के अभियान से काम नहीं चलेगा.

जेपी मॉर्गन इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में विदेशी निवेश तेजी से घटा है. 2015 से 2019 के बीच देश में अच्छा पूंजी निवेश आ रहा था, लेकिन अब यह काफी कम हो गया है. विदेशी कंपनियां भारत में कम निवेश कर रही हैं और विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. रिपोर्ट कहती है कि जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो विदेशी निवेशक अपना पैसा वापस अमेरिका ले जाते हैं. इसी वजह से भारत जैसे देशों पर दबाव बढ़ता है.

तो ऐसे में सवाल उठता है ऐसा क्यों हो रहा है? असली सवाल यह है कि आखिर समस्या कहां है? क्या यह केवल अस्थायी कमजोरी है या तस्वीर उससे कहीं बड़ी है? अर्थव्यवस्था के दो अहम हिस्सों को समझना होगा Current Account और Capital Account. नाम भले मुश्किल लगते हों लेकिन इनका मतलब काफी आसान है.

इसे ऐसे समझिए जैसे किसी व्यक्ति के अलग-अलग खाते होते हैं. एक रोजमर्रा के लेनदेन का और दूसरा निवेश से जुड़ा. ठीक उसी तरह किसी देश का भी अपना आर्थिक हिसाब-किताब होता है. Current Account का सीधा संबंध इस बात से होता है कि कोई देश कितना निर्यात कर रहा और विदेशों से कितना आयात कर रहा है. भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है. हम बड़ी मात्रा में तेल खरीदते हैं, सोना खऱीदते हैं, मशीनें खरीदते हैं और कई जरूरी चीजें बाहर से मंगाते हैं. दूसरी तरफ भारत आईटी सेवाओं से लेकर कई उत्पादों का निर्यात भी करता है. विदेशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा भेजा गया पैसा यानी रेमिंटेस भी इसी में शामिल है. लेकिन भारत अक्सर जितना बेचता है उससे ज्यादा खरीदता है. इसी वजह से भारत लंबे समय से Current Account Deficit में रहता आया है. यह कोई नई समस्या नहीं है. कई दशकों से भारत की अर्थव्यवस्था इसी तरीके से चल रही है.

लेकिन यहां तक स्थिति संभल जाती थी क्योंकि दूसरा हिस्सा, यानी Capital Account, संतुलन बनाने का काम करता था. Capital Account को निवेश वाला खाता समझिए. इसका मतलब है कि देश में कितना विदेशी निवेश आ रहा है और देश का पैसा कितना बाहर जा रहा है. एक समय ऐसा था जब भारत दुनिया के लिए एक बड़ी ग्रोथ स्टोरी बनकर उभर रहा था. विदेशी निवेशक भारत में पैसा लगा रहे थे, स्टार्टअप्स तेजी से बढ़ रहे थे, आईटी सेक्टर मजबूत हो रहा था और बेंगलुरु, पुणे तथा हैदराबाद जैसे शहर तेजी से विकसित हो रहे थे. इन शहरों का विकास सिर्फ शहरीकरण की कहानी नहीं था बल्कि विदेशी निवेश और पूंजी प्रवाह की भी कहानी थी.

एक समय भारत दुनिया के लिए बड़ी ग्रोथ स्टोरी माना जाता था. 2005 से 2010 के बीच देश में बड़े स्तर पर निवेश हुआ, उद्योग बढ़े और शहर तेजी से विकसित हुए. लेकिन अब निवेशक AI और कमोडिटी जैसे नए क्षेत्रों की तरफ ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं. आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को फिर से ऐसे माहौल की जरूरत है जिससे विदेशी निवेशक यहां पैसा लगाने के लिए आकर्षित हों. इसके बिना अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रह सकता है. सरकार ने कुछ सुधार जरूर किए हैं, जैसे विदेशी निवेश के नियम आसान करना। लेकिन निजीकरण और बड़े आर्थिक सुधारों की रफ्तार अभी भी धीमी मानी जा रही है. Ease Of Doing Business की बात केवल स्लोगन तक नहीं बल्कि धरातल पर भी नजर आना चाहिए.

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