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झारखंड राज्यसभा झटका: क्रॉस वोटिंग का खेल या गठबंधन में बगावत? क्या INDIA गठबंधन में बढ़ गई दरार?

झारखंड के राज्यसभा चुनाव में जेएमएम के बैद्यनाथ राम जीतने में सफल रहे, वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा हार गए. क्रॉस-वोटिंग के चलते एनडीए समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी ने चुनाव में जीत हासिल की.


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क्या बिहार में टूट सकता है महागठबंधन? क्या झारखंड में बिखर सकता है INDIA ब्लॉक? ये बात हम इसलिए कह रहे क्योंकि झारखंड के राज्यसभा चुनाव का परिणाम केवल एक सीट की हार-जीत तक सीमित नहीं है. कांग्रेस के राज्यसभा उम्मीदवार प्रणव झा के केवल एक उम्मीदवार ही नहीं थे बल्कि वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के राजनीतिक सलाहकार भी थे. ऐसे में प्रणव झा की हार कांग्रेस अध्यक्ष के हार से कम नहीं है. और ऐसे में प्रणव झा की हार ने INDIA गठबंधन के भीतर छिपे तनाव, आपसी अविश्वास और राजनीतिक समीकरणों की कमजोरियों को फिर सामने लाकर रख दिया है. जिस चुनाव में INDIA गठबंधन को आसानी से दोनों सीटें जीतने की उम्मीद थी, वही चुनाव अब गठबंधन की एकता पर सवाल खड़े कर रहा है.

झारखंड की राजधानी रांची में राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव में INDIA गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या बल मौजूद था. विधानसभा में गठबंधन के कुल 56 विधायक थे और गणित साफ तौर पर दोनों उम्मीदवारों के पक्ष में दिखाई दे रहा था. लेकिन राजनीति में केवल संख्या ही पर्याप्त नहीं होती, गठबंधन की एकजुटता और आपसी विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है. यही वह जगह है जहां INDIA गठबंधन कमजोर दिखाई दिया. और वो भी तब जब राज्यसभा चुनाव से ठीक 10 दिन पहले दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बड़ी बैठक हुई थी. जिसमें विपक्षी दलों की एकता एकजुटता पर जोर दिया गया था. लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि साथ आ गए तो कैसे बीजेपी को हराया जा सकता है. लेकिन 10 दिन बाद ही हुए लिटमस टेस्ट में INDIA गठबंधन बिखर गया, उसकी अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई.

झारखंड के राज्यसभा चुनाव में जेएमएम के बैद्यनाथ राम जीतने में सफल रहे, वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा हार गए. क्रॉस-वोटिंग के चलते एनडीए समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी ने चुनाव में जीत हासिल की. नाथवानी को 28 वोट मिले, जिसके बाद उन्हें विजेता घोषित किया गया. वहीं, कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा को 20 वोट मिले.

परिमल नाथवानी चौथी बार राज्यसभा सदस्य के रूप में संसद पहुंचेंगे. परिमल नाथवानी को रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और अंबानी परिवार का खासमखास माना जाता है. रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड में कॉर्पोरेट मामलों के निदेशक के पद पर कार्यरत परिमल नाथवानी पिछले तीन दशक से खासे रिलायंस समूह में सक्रिय हैं.

लेकिन परिमल नाथवानी के हाथों प्रणव झा की हार के बाद एक बड़ा सवाल पैदा हुआ जब संख्या आपके पक्ष में थी, तो वोट आखिर गए कहां? कांग्रेस ने तुरंत आरजेडी और CPI माले पर क्रॉस-वोटिंग का आरोप लगा दिया. कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने प्रणव झा की हार के लिए राजद और माले के विधायकों पर धोखा देने के आरोप लगाया. लेकिन जवाब भी उतनी ही तेजी से आया. CPI माले ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर आरोपों को "दुर्भावनापूर्ण झूठ" बताया.

आरजेडी ने कांग्रेस को उसके पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड की याद दिलाई कि कैसे अतीत में कई राज्यों में कांग्रेस के विधायक खुद बीजेपी उम्मीदवारों के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग करते रहे हैं. यहीं से मामला केवल चुनावी हार का नहीं बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता का बन जाता है. सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपनी हार का कारण दूसरों में ढूंढ रही है, या वास्तव में गठबंधन के भीतर कुछ गंभीर टूट-फूट चल रही है?

इस सब में सबसे दिलचस्प पहलू जेएमएम की चुप्पी है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विजेताओं को बधाई दी लेकिन पूरे विवाद पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी. राजनीति में कई बार बयान से अधिक महत्व चुप्पी का होता है. यह चुप्पी कई तरह के सवाल पैदा कर रही है. हालांकि उनके नेता बोल रहे हैं जेएमएम का चार विधायक ने प्रणव झा को वोट दिया.

क्या जेएमएम कांग्रेस को कोई राजनीतिक संदेश देना चाहता था? क्या बिहार विधानसभा चुनावों में सीट बंटवारे को लेकर पुराने मतभेद अभी भी बने हुए हैं? या फिर यह केवल एक सामान्य चुनावी घटना थी जिसे अब अनावश्यक रूप से बड़ा बनाया जा रहा है? पिछले कुछ समय से कांग्रेस और जेएमएम के रिश्तों में खटास की खबरें लगातार सामने आती रही हैं. पिछले कुछ महीनों में कई बार ये अफवाहें उड़ती रही है कि हेमंत सोरेन की बीजेपी से नजदिकियां बढ़ी है. बिहार चुनाव में सीटों को लेकर असहमति, असम चुनाव में सीट बंटवारे पर विवाद और अब राज्यसभा चुनाव में तनाव—ये घटनाएं बताती हैं कि INDIA गठबंधन के भीतर क्षेत्रीय दल और कांग्रेस बराबरी के संबंधों को लेकर अलग-अलग सोच रखते हैं.

एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या कांग्रेस अभी भी गठबंधन की राजनीति को उसी पुराने राष्ट्रीय दल वाले नजरिए से देख रही है, जबकि क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक ताकत और महत्व को अधिक आक्रामक तरीके से स्थापित करना चाहते हैं?

यह घटना विपक्ष के सामने एक और चुनौती रखती है. INDIA गठबंधन का गठन बीजेपी के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक मोर्चा बनाने के लिए हुआ था. लेकिन यदि सहयोगी दल एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने लगें, तो बीजेपी के खिलाफ संयुक्त रणनीति कमजोर पड़ सकती है.

हालांकि इस पूरे मामले में कुछ सावधानी भी जरूरी है. अभी तक किसी दल या नेता की भूमिका को लेकर ठोस प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं. इसलिए आरोपों और राजनीतिक अटकलों को अंतिम सच मानना जल्दबाजी होगी।

लेकिन एक बात साफ दिखाई देती है—झारखंड का यह राज्यसभा चुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं था। इसने INDIA गठबंधन के भीतर मौजूद अविश्वास, नेतृत्व की चुनौतियों और सहयोगी दलों के बदलते समीकरणों को उजागर कर दिया है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या INDIA गठबंधन इन दरारों को भर पाएगा या यह केवल एक बड़ी राजनीतिक समस्या की शुरुआती चेतावनी है?

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