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लखनऊ अग्निकांड में 15 की मौत, यूपी में ब्राह्मण वोटों पर सियासत तेज

द फेडरल देश के खास शो 'राजपथ' पर प्रदीप सहगल ने लखनऊ हादसे की पूरी टाइमलाइन दिखाई और बताया कि कैसे 2027 से पहले ब्राह्मण वोट बैंक पर नई जंग छिड़ गई है।


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Rajpath: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाली खबर सामने आई, जिसने पूरे देश के जेहन में बेचैनी पैदा कर दी है। 'द फेडरल देश' के बेहद खास शो 'राजपथ' पर आज उस मुद्दे की चर्चा हुई जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। शो में होस्ट प्रदीप सहगल ने अलीगंज इलाके में हुए इस खौफनाक अग्निकांड की मिनट-दर-मिनट की टाइमलाइन के जरिए सिस्टम की उस सुस्ती और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया है, जिसकी कीमत 15 परिवारों ने अपने बच्चों की जान देकर चुकाई। इसके साथ ही, कार्यक्रम में इस हादसे के राजनीतिक असर और उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर शुरू हुई नई राजनीतिक जंग का भी विस्तृत विश्लेषण किया गया।



अलीगंज अग्निकांड की मिनट-दर-मिनट टाइमलाइन
इमारत जल रही थी, अंदर मासूम छात्र फंसे थे और बाहर सरकारी व्यवस्था पहुंच रही थी—लेकिन शायद बहुत देर से। आइए देखते हैं कि उस काले दिन आखिर हुआ क्या था:

दोपहर 02:15 बजे (आग का तांडव): अलीगंज के एक कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के एसी डक्ट में शॉर्ट सर्किट होता है। ग्राउंड फ्लोर पर एक पेट शॉप थी और ऊपरी मंजिल पर 'हेड हॉपर एनिमेशन स्टूडियो' चल रहा था। पूरी तरह से फैशनेबल शीशों से पैक इस बिल्डिंग में वेंटिलेशन न होने की वजह से वेंटिलेशन न होने से पूरी इमारत 'गैस चैंबर' बन जाती है। आग लगते ही बिजली कट गई, जिससे एकमात्र निकास द्वार पर लगा बायोमेट्रिक लॉक हमेशा के लिए बंद हो गया। छात्र अंदर ही कैद होकर चीखते-चिल्लाते रहे। पूरी बिल्डिंग में बाहर निकलने की सिर्फ एक संकरी सीढ़ी ही थी, कोई दूसरा इमरजेंसी एग्जिट नहीं था।

दोपहर 02:30 बजे (जान बचाने की जंग): कमरों के भीतर जब दम घुटने लगा, तो छात्रों ने जिंदगी और मौत के बीच जूझते हुए शीशे तोड़े और पहली तथा दूसरी मंजिल से सीधे नीचे कूदना शुरू कर दिया। यह जिंदगी और मौत के बीच का सबसे खौफनाक मंजर था।

दोपहर 02:45 बजे (फायर ब्रिगेड की सुस्ती): हादसे के पूरे 30 मिनट बाद दमकल की पहली गाड़ी मौके पर पहुंचती है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि एंबुलेंस और दमकल ने आने में आधा घंटा लगा दिया, तब तक स्थानीय लोग अपनी जान पर खेलकर बच्चों को बचा रहे थे। जब संकरी गलियों में ऐसी अवैध बिल्डिंग खड़ी हो गई, तब फायर विभाग का एनओसी (NOC) दस्ता कहां सो रहा था?

शाम 04:30 बजे (बावायरमेंट बना कब्र): रेस्क्यू टीम को बगल की बिल्डिंग की दीवार तोड़कर, हथौड़े से सुराख करके अंदर घुसना पड़ा। जब वॉशरुम का दरवाजा तोड़ा गया, तो वहां एक साथ कई बच्चों की लाशें मिलीं। वे जान बचाने के लिए पानी चलाकर बाथरूम में छिपे थे, लेकिन वेंटिलेशन न होने से दम घुटने से उनकी मौत हो गई।

शाम 05:30 बजे (15 मौतें और वीआईपी अलर्ट): दमकल विभाग ने कहा कि आग बुझ गई, लेकिन तब तक 15 जवान जिंदगियां स्वाहा हो चुकी थीं। इसके बाद सिस्टम जागता है और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक आनन-फानन में मौके पर पहुंचते हैं और पत्रकारों से बात करते हुए भावुक हो जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ अलीगढ़ में जनसभा कर रहे सीएम योगी आदित्यनाथ को खबर मिलती है, तो वो अपना दौरा बीच में रद्द कर लखनऊ के लिए निकलते हैं।

रात 06:15 बजे (ग्राउंड जीरो पर सीएम और 5 लाख का मरहम): मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सीधे अलीगंज के घटनास्थल पर पहुंचते हैं। अफसरों को ऑन-कैमरा कड़ी फटकार लगाई जाती है। घायलों से मिलने केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर जाया जाता है और हमेशा की तरह... केंद्र से 2 लाख और राज्य से 5 लाख के मुआवजे का ऐलान हो जाता है।

बड़ा सवाल: मुख्यमंत्री जी अब फटकार लगाने से क्या फायदा! काश ये फटकार पहले लगाई होती....तो 15 लोगो की जान बच जाती। यह बिल्डिंग कागजों पर 'residential' थी, लेकिन इसमें धड़ल्ले से कमर्शियल गेमिंग ज़ोन और कोचिंग चल रही थी। पुलिस ने बिल्डिंग मालिक समेत 4 लोगों को गिरफ्तार तो कर लिया है, लेकिन असली कातिल तो वो सफेदपोश अधिकारी हैं जो एयरकंडीशनर कमरों में बैठकर हर महीने अवैध इमारतों से महीना वसूलते हैं।

यूपी की सियासत: 2027 से पहले ब्राह्मण वोट बैंक पर जंग
इस बड़े हादसे के बीच उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक समीकरण भी तेजी से बदलने लगे हैं। यूपी की सियासत में ब्राह्मणों की आबादी भले ही 10 फीसद हो, लेकिन सरकार बनने और बनाने के खेल में उनकी भूमिका अहम है।

मायावती का 2007 वाला सोशल इंजीनियरिंग कार्ड: बसपा प्रमुख मायावती ने साफ संकेत दिया है कि पार्टी ब्राह्मण समाज को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों का चयन शुरू कर चुकी है। उनका दावा है कि ब्राह्मणों का सम्मान और राजनीतिक भागीदारी सबसे ज्यादा बसपा में सुरक्षित है। मायावती की यह रणनीति नई नहीं है। 2007 में ब्राह्मण-दलित सोशल इंजीनियरिंग के दम पर बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था। लेकिन सवाल यह है कि क्या वही प्रयोग 2027 में दोहराया जा सकता है?

अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला: दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव लगातार पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) कार्ड खेल रहे हैं। हालांकि, पार्टी ब्राह्मण नेताओं को भी आगे कर संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।

बीजेपी का पारंपरिक आधार: वहीं बीजेपी के लिए ब्राह्मण वोट बैंक लंबे समय से मजबूत आधार रहा है। राम मंदिर, हिंदुत्व और सत्ता में हिस्सेदारी के जरिए पार्टी ने सवर्ण मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखा है। ऐसे में मायावती की सक्रियता बीजेपी के लिए पूरी तरह नजरअंदाज करने वाली चुनौती नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा को ब्राह्मण वोटों का सीमित लेकिन असरदार हिस्सा मिल सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां पार्टी का पारंपरिक दलित आधार अभी भी मौजूद है। हालांकि बीजेपी अभी भी इस वर्ग में सबसे मजबूत स्थिति में दिखाई देती है, जबकि सपा की रणनीति पीडीए गठजोड़ पर टिकी हुई है। यानी 2027 की लड़ाई में ब्राह्मण वोट बैंक निर्णायक तो हो सकता है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि मायावती की नई कवायद वोट में बदलती है या सिर्फ राजनीतिक संदेश बनकर रह जाती है।


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