अयोध्या से मायावती का शंखनाद! BJP या PDA, निशाने पर कौन?
22 जून को अयोध्या में होने वाली मायावती की महारैली ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। क्या BSP सुप्रीमो मायावती 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक वापसी की तैयारी कर रही हैं?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पुरानी कहावत है मायावती चुनाव जीतें या हारें, नतीजे जरूर बदल देती हैं। 2027 विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं। लेकिन अयोध्या में 22 जून की प्रस्तावित महारैली ने एक बार फिर यूपी की राजनीति में इस पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है क्या बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती वापसी की तैयारी में हैं? और अगर हैं, तो आखिर खतरा किसके लिए हैं ? क्या मायावती, समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले की हवा निकालेंगी? क्या बीजेपी को दलित वोटों में सेंधमारी से बचाने का काम करेंगी? या फिर बीएसपी खुद को एक बार फिर तीसरे विकल्प के तौर पर खड़ा करने जा रही है? जिस पार्टी का वोट शेयर बचा है लेकिन सीटें गायब हैं, क्या वह फिर से सत्ता की लड़ाई में लौट सकती है?
विधानसभा चुनाव 2022 में बीएसपी को सिर्फ 1 सीट और 2024 लोकसभा चुनाव में शून्य सीट मिली। पहली नजर में लगता है कि बीएसपी खत्म हो चुकी है। लेकिन राजनीति सिर्फ सीटों से तय होती तो 2024 में कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक नहीं होती। सच यह है कि बीएसपी अभी भी यूपी में 9 से 13 प्रतिशत के बीच वोट हासिल करने की क्षमता रखती है। यही वजह है कि भले बहनजी यानी मायावती सत्ता से दूर हैं, लेकिन सभी दल उनकी हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। राजनीति में वोट बैंक मरता नहीं है, बस इधर उधर फिसल जाता है। दलित वोटर आज भी बीएसपी का सबसे बड़ा आधार है। भले उसका एक हिस्सा बीजेपी की ओर गया हो लेकिन पूरी तरह नहीं गया। यही वह पूंजी है जिस पर मायावती फिर से दांव लगाने की कोशिश कर रही हैं।
लोकसभा चुनाव 2024 और उसके बाद सबसे ज्यादा चर्चा पीडीए की हो रही है। पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक यानी वही सामाजिक गठबंधन जिस पर कभी बीएसपी खड़ी हुई थी। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले इस समीकरण का केंद्र मायावती थीं, आज अखिलेश यादव बनने की कोशिश कर रहे हैं। यहीं से बहनजी की बेचैनी शुरू होती है क्योंकि अगर दलित वोटर बड़ी संख्या में पीडीए की तरफ चला गया, तो बीएसपी के अस्तित्व का सवाल खड़ा हो जाएगा। इसलिए अयोध्या रैली सिर्फ बीजेपी विरोध नहीं है। यह PDA की चुनौती का जवाब भी है। मायावती जानती हैं कि बीजेपी से लड़ाई बाद की बात है। पहले अपने सामाजिक आधार को बचाना जरूरी है।
राजनीति में एक कहावत यह भी है कि जो अप्रासंगिक होता है, उसके बारे में कोई बात नहीं करता। लेकिन यूपी में ऐसा नहीं है। बीजेपी भी मायावती की गतिविधियां देखती है और समाजवादी पार्टी भी। । कांग्रेस भी। क्यों? क्योंकि BSP का वोट शेयर भले कम हुआ हो, लेकिन उसका असर खत्म नहीं हुआ। कई सीटों पर 4 से 8 प्रतिशत वोट का ट्रांसफर चुनाव का परिणाम बदल देता है। और बीएसपी यही काम कर सकती है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि BSP कितनी सीटें जीतेगी।सवाल यह है कि बीएसपी किसकी सीटें हरवाएगी। यूपी की राजनीति में बहनजी कई बार किंग नहीं रहीं। लेकिन किंगमेकर जरूर रही हैं।
अयोध्या में होने वाली रैली सिर्फ रैली मात्र नहीं है। यह लोकेशन भी एक राजनीतिक संदेश है। अयोध्या जहां बीजेपी की सबसे बड़ी वैचारिक जीत दर्ज हुई। लेकिन 2024 में इसी अयोध्या वाली सीट पर बीजेपी को झटका भी लगा। मायावती शायद यही संदेश देना चाहती हैं कि हिंदुत्व की राजनीति के केंद्र में भी बहुजन राजनीति की जगह है। यह सीधा टकराव नहीं है। लेकिन प्रतीकात्मक चुनौती जरूर है। अयोध्या से रैली का मतलब है हम अभी मैदान में हैं और यह संदेश सिर्फ बीजेपी को नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी को भी है।
बीजेपी की चिंता क्या है? बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत गैर-यादव पिछड़े और गैर-जाटव दलित वोट रहे हैं। अगर मायावती दलितों को फिर से संगठित करने में सफल हो जाती हैं, तो बीजेपी का सामाजिक समीकरण प्रभावित हो सकता है।हालांकि यह आसान नहीं होगा। क्योंकि पिछले दस वर्षों में बीजेपी ने दलित समाज के बीच गहरी राजनीतिक पैठ बनाई है।
सपा की चिंता क्या है? सपा के लिए खतरा और बड़ा है क्योंकि PDA का बड़ा हिस्सा दलित वोट पर भी निर्भर है। अगर BSP दलित वोट वापस खींच लेती है तो PDA का गणित कमजोर पड़ सकता है। यानी बहनजी की सक्रियता का सबसे ज्यादा असर शायद सपा पर पड़े।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती को नजरअंदाज करना हमेशा जोखिम भरा रहा है। उनका राजनीतिक ग्राफ गिरा है। संगठन कमजोर हुआ है। सीटें गायब हुई हैं। लेकिन वोट पूरी तरह खत्म नहीं हुए और राजनीति में जब तक वोट बचा है, तब तक वापसी की संभावना भी बची है। अब देखना यह है कि 22 जून की महारैली के बाद यूपी की राजनीति में सबसे ज्यादा बेचैनी किसे होती है बीजेपी को? अखिलेश यादव को? या फिर उन लोगों को जिन्होंने BSP को समय से पहले खत्म घोषित कर दिया है?

