पुराने नेताओं की घर वापसी पर जोर, मायावती का मास्टरस्ट्रोक या आखिरी दांव?
2027 यूपी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बीएसपी अपने पुराने नेताओं की वापसी पर जोर लगा रही है।

क्या बसपा की सबसे बड़ी समस्या नेताओं की कमी है या वोटरों का भरोसा खत्म होना? क्या दलित वोट अब बसपा की स्थायी संपत्ति नहीं रहा? ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित फॉर्मूला 2027 में चलेगा या नहीं? क्या बसपा की समस्या संगठन की है या नेतृत्व से जुड़ी है? क्या बसपा अब चुनाव जीतने की पार्टी है या सिर्फ वोट काटने वाली ताकत बनकर रह गई है? उत्तर प्रदेश की सियासत में मायावती सक्रिय मोड में दिखाई दे रही हैं। पार्टी के भीतर बैठकों का दौर चल रहा है, पुराने नेताओं की घर वापसी की तैयारी हो रही है, ब्राह्मणों से लेकर मुस्लिमों और अति-पिछड़ों तक को साधने की नई रणनीति बनाई जा रही है।क्या केवल पुराने नेताओं की वापसी से बसपा का खोया हुआ जनाधार वापस आ जाएगा?
बसपा के सामने सबसे बड़ा संकट संगठन का नहीं बल्कि भरोसे का नजर आता है। पिछले दस वर्षों में कई बड़े नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वोटर भी उन्हीं नेताओं के साथ चले गए या बसपा का कोर वोटर ही दूसरी पार्टियों में बंट गया? बसपा की राजनीति की नींव दलित वोट बैंक पर टिकी थी। लेकिन 2014 के बाद भाजपा ने गैर-जाटव दलितों में लगातार अपनी पैठ बढ़ाई है। वहीं जाटव वोट का भी एक हिस्सा अब पूरी तरह बसपा के साथ नहीं दिखता। विभिन्न चुनावी विश्लेषणों में यह बात सामने आई है कि बसपा का पारंपरिक सामाजिक गठबंधन पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। अगर दलित वोट ही खिसक रहा है तो फिर पुराने नेताओं की वापसी कितनी कारगर होगी?
बताया जा रहा है कि पश्चिमी यूपी, अवध और पूर्वांचल के कई पूर्व सांसद और विधायक पार्टी के संपर्क में हैं। हालांकि अभी तक बसपा ने किसी नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ऐसे नेता, जिन्हें भाजपा, सपा, कांग्रेस या अन्य दलों से टिकट कटने का अंदेशा है, वे बसपा का रुख कर सकते हैं। अंतिम फैसला आने वाले महीनों में साफ होगा। जो नाम अभी बसपा की रणनीति में प्रमुख भूमिका में दिख रहे हैं, वे हैं सतीश चंद्र मिश्रा जिनको ब्राह्मण समाज को जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई है। उमाशंकर सिंह के जरिए राजपूत समाज को साधने की तैयारी। विश्वनाथ पाल के जरिए अति पिछड़ा वर्ग पर नजर और मायावती तो पूरे सामाजिक समीकरण की अगुवाई कर रही हैं।
2024 लोकसभा चुनाव में भले ही बसपा कोई सीट नहीं जीत सकी, लेकिन कई सीटों पर उसके वोट निर्णायक साबित हुए। यह चर्चा लगातार रही कि बसपा का वोट शेयर त्रिकोणीय मुकाबले बनाता है और परिणामों को प्रभावित करता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी पार्टी का लक्ष्य सिर्फ किंगमेकर या वोट कटवा बनना हो सकता है या फिर बसपा अभी भी सत्ता में वापसी का सपना देख रही है? ऐसी सूरत में आंकड़े क्या कहते हैं?
विधानसभा चुनाव में बसपा की ताकत
2002 में वोट शेयर: 30.43% सीटें: 206। 2012 में वोट शेयर: 25.91% सीटें: 80। 2017 में वोट शेयर: 22.23% सीटें: 19। 2022 में वोट शेयर: 12.88% सीटें: 1
2007 में मायावती ने सर्वजन मॉडल बनाया था। दलितों के साथ ब्राह्मणों को जोड़ा और बसपा सत्ता में पहुंची। लेकिन आज की राजनीति 2007 जैसी नहीं है। खास बात यह गिरावट केवल सीटों में नहीं बल्कि सामाजिक आधार में भी दिखाई देती है। बसपा की वापसी की राह में तीन बड़ी चुनौतियों में से पहला दलित वोट का बिखराव है। दूसरा, मुस्लिम वोट का समाजवादी पार्टी की ओर झुकाव। 2022 और 2024 के चुनाव इसके गवाह हैं। तीसरा, संगठन का कमजोर होना। जमीनी स्तर पर बूथ संरचना और स्थानीय नेतृत्व का अभाव बसपा की सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है।
उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत से राज करने वाली बसपा आज उस मुकाम पर खड़ी है जहां उसका वोट बैंक लगातार सिकुड़ रहा है और संगठन कमजोर पड़ता नजर आता है। 2007 में बसपा ने 30.43 प्रतिशत वोट के साथ 206 सीटें जीतकर इतिहास रचा था, लेकिन 2022 तक आते-आते उसका वोट शेयर घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया और पार्टी महज एक सीट पर सिमट गई। ऐसे में मायावती का नया दांव क्या वास्तव में पार्टी को पुनर्जीवित कर सकता है या यह केवल राजनीतिक ऑक्सीजन जुटाने की कोशिश है?
पुराने नेताओं की घर वापसी निश्चित रूप से बसपा को कुछ जिलों में नई ऊर्जा दे सकती है। कुछ बड़े चेहरे चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। लेकिन सियासी इतिहास गवाह है कि चुनाव सिर्फ नेताओं से नहीं जीते जाते बल्कि सामाजिक गठबंधन, मजबूत संगठन और विश्वसनीय नेतृत्व से जीत हासिल होती है। मायावती के सामने असली चुनौती नेताओं को वापस लाना नहीं है। असली चुनौती यह है कि क्या वह दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों और सवर्णों के उस सामाजिक गठबंधन को फिर से खड़ा कर सकती हैं जिसने 2007 में उन्हें सत्ता तक पहुंचाया था।
[11:50, 2/6/2026] Lalit Rai:

