मिडिल ईस्ट संकट के 81 दिन: ट्रंप की धमकी से भारत में बढ़ा तेल संकट

21 May 2026 8:53 PM IST

81 दिन बाद भी मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव; ट्रंप की धमकियों और हॉर्मुज संकट के बीच भारत में ईंधन की बढ़ती कीमतों से गहराया आर्थिक संकट।

USA Iran War: मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में जारी भीषण सैन्य संकट को 81 दिन पूरे हो चुके हैं। बीते 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए ताबड़तोड़ हमलों के बाद हालांकि सीजफायर (युद्धविराम) तो हुआ, लेकिन इलाके में शांति अब भी कोसों दूर है। दोनों पक्षों की ओर से जारी तीखी बयानबाजी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लगातार मिल रही सैन्य कार्रवाई की धमकियों ने दुनिया को एक बार फिर महायुद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।


इस बेहद संवेदनशील और पेचीदा वैश्विक संकट पर 'द फेडरल' ने पूर्व राजनयिक और वेस्ट सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए विवेक काट्जू से विशेष बातचीत की। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार जैसे देशों में भारत के राजदूत रह चुके काट्जू ने पर्दे के पीछे चल रही कूटनीति, ट्रंप की वास्तविक रणनीति और भारत पर पड़ने वाले इसके विनाशकारी प्रभावों का बेहद सटीक विश्लेषण किया है।

ट्रंप और जेडी वेंस के बयानों में विरोधाभास क्यों?
इंटरव्यू के दौरान जब यह सवाल उठाया गया कि एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप दो-तीन दिनों के भीतर ईरान पर दोबारा भीषण हमले की धमकी दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस कह रहे हैं कि बातचीत बहुत सकारात्मक दौर में है; तो इस पर पूर्व राजनयिक विवेक काट्जू ने कहा:

"यह विरोधाभास सतही है, वास्तविक नहीं। ट्रंप असल में ईरान पर दबाव बना रहे हैं कि यदि कोई 'डील' नहीं होती, तो वे दो-तीन दिनों में बमबारी शुरू कर देंगे। वहीं वेंस का बयान यह दिखाता है कि इस सैन्य धमकी के पीछे कूटनीतिक बातचीत का दौर भी जारी है। ट्रंप के पास अब विकल्पों की कमी है। उन्होंने ईरान पर भारी विनाश ढाया, लेकिन ईरान न तो दबा और न ही टूटा।"

काट्जू के मुताबिक, 11-12 अप्रैल को इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत बेनतीजा रही थी क्योंकि अमेरिका और ईरान के रुख में जमीन-आसमान का अंतर है। ट्रंप चाहते हैं कि उन्हें बराक ओबामा द्वारा 2015 में की गई JCPOA (परमाणु समझौते) से कहीं बेहतर डील मिले, जिसे देने के लिए ईरान किसी भी कीमत पर तैयार नहीं है।

'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz): ईरान का सबसे बड़ा हथियार
इस पूरे संकट में स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) का ब्लॉक होना सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया है। विवेक काट्जू ने बताया:

वैश्विक ऊर्जा संकट: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहला ऐसा संकट है जिसने दुनिया के ऊर्जा बाजार से एक झटके में 20% तेल और गैस को गायब कर दिया।

ईरान की आक्रामक रणनीति: जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, तो ईरान ने डिफेंसिव (रक्षात्मक) होने के बजाय ऑफेंसिव (आक्रामक) रुख अपनाया। उसने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अमेरिकी समर्थक देशों की ऑयल फैसिलिटीज को निशाना बनाने की रणनीति चुनी।

यदि ट्रंप अपनी धमकी के मुताबिक ईरान की बची-कुची ऑयल रिफाइनरियों, बिजलीघरों और पुलों को ध्वस्त करते हैं, तो ईरान भी हॉर्मुज पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ेगा। वह अरब खाड़ी के देशों के तेल संयंत्रों और वाटर डिसेलिनेशन (पानी को साफ करने वाले) प्लांट्स को तबाह कर देगा, जिससे पूरे पश्चिम एशिया में हाहाकार मच जाएगा।

भारत पर दुष्प्रभाव: 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा और महंगी इकॉनमी
इस युद्ध की तपिश भारत तक पहुंच चुकी है और ईंधन लगातार महंगा हो रहा है। यद्यपि अमेरिका ने भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए एक महीने की ढील दी है, लेकिन विवेक काट्जू के अनुसार, भारत के लिए खतरा बहुत बड़ा है:

आर्थिक दबाव: तेल और फर्टिलाइजर (उर्वरक) की बढ़ती कीमतों से देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव है। विदेशी मुद्रा भंडार का आउटफ्लो तेजी से हो रहा है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने हाल ही में नागरिकों से साल भर सोना न खरीदने और ऊर्जा का किफायत से इस्तेमाल करने की अपील की है।

मानवीय संकट: खाड़ी के इस पूरे प्रभावित इलाके में करीब 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय रहते हैं। अगर युद्ध दोबारा भड़का और वहां पानी-बिजली का संकट पैदा हुआ, तो इन करोड़ों भारतीयों की सुरक्षा और उन्हें वहां से सुरक्षित निकालना भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

क्या परदे के पीछे चल रही है बातचीत?
विवेक काट्जू ने अपने कूटनीतिक अनुभव के आधार पर बताया कि पाकिस्तान और कुछ अरब देशों (जैसे सऊदी अरब, मिस्र, ओमान और कतर) के माध्यम से बैक-चैनल (पर्दे के पीछे) बातचीत लगातार जारी है। खुद सऊदी अरब और कतर के दबाव के कारण ही ट्रंप ने पिछले दिनों अपनी सैन्य कार्रवाई को कुछ दिनों के लिए रोका था।

समझौते में मुख्य अड़चनें क्या हैं?

मुआवजा: ईरान का कहना है कि युद्ध अमेरिका ने शुरू किया, इसलिए पहले वह नुकसान का हर्जाना दे।

परमाणु अधिकार: ईरान परमाणु बम न बनाने पर तो राजी हो सकता है, लेकिन एनपीटी (NPT) के तहत मिले अपने परमाणु संवर्धन के अधिकारों को छोड़ने को तैयार नहीं है।

बाजार को ठंडा रखने की चाल: ट्रंप के बार-बार बदलते बयानों का एक मकसद दुनिया के शेयर और बॉन्ड बाजारों में मची उथल-पुथल को नियंत्रित करना भी हो सकता है।

इजरायल का रुख और निष्कर्ष
क्या इजरायल इस समझौते को होने देगा? इस पर काट्जू ने बेहद अनूठे अंदाज में कहा, "अल्टीमेटली इजरायल अमेरिका का एक शरारती बच्चा है। वह कई बार बात नहीं मानता, लेकिन जब अमेरिका कड़ाई से कह देगा कि बस अब बहुत हो गया, तो वह शांति से बैठ जाएगा।"

फिलहाल, मई के आखिरी हफ्ते में भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। दोनों देशों के रुख में भारी दूरी है। लेकिन चूंकि भारत समेत पूरी दुनिया इस संकट का खामियाजा भुगत रही है, इसलिए वैश्विक राजनीति और ग्लोबल इकॉनमी को वापस पटरी पर लाने के लिए जल्द से जल्द एक स्थाई सीजफायर और कूटनीतिक समाधान की सख्त जरूरत है।