मोदी राज के 12 साल और तेल का खेल, क्यों नहीं घटे पेट्रोल-डीजल के दाम?
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मोदी राज के 12 साल और तेल का खेल, क्यों नहीं घटे पेट्रोल-डीजल के दाम?

पीएम मोदी के आत्मनिर्भरता के वादे फेल; देश में कच्चे तेल का उत्पादन घटने से विदेशी आयात पर निर्भरता 90% हुई, विदेशी तनाव का खामियाजा भुगत रही जनता।


Siyasat: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध भले ही खत्म हो गया हो, 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' का रास्ता फिर से खुल गया हो और कच्चे तेल (Crude Oil) के दाम वैश्विक बाजार में $80 प्रति बैरल के नीचे आ गए हों; लेकिन इस युद्ध ने भारत की अर्थव्यवस्था और सरकारी नीतियों पर कुछ ऐसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब मिलना अभी बाकी है।


द फेडरल देश के खास कार्यक्रम 'सियासत' में आज हम परत-दर-परत पड़ताल कर रहे हैं उसी 'तेल के खेल' की, जिसका सीधा असर आपकी रसोई और आपकी जेब पर पड़ता है।


मोदी राज के 12 साल: क्या आपने कभी सोचा?
हर आम और खास भारतीय के ज़हन में आज यह सवाल है कि पिछले 12 वर्षों में सरकार ने तेल के दामों में स्थायी कमी क्यों नहीं की?

क्या आपने कभी सोचा कि आपको पेट्रोल-डीजल के लिए हमेशा ज्यादा कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है?

क्यों विदेशों में होने वाले हर छोटे-बड़े तनाव का बहाना बनाकर आपकी जेब काट ली जाती है?

और सबसे बड़ा सवाल जिस आत्मनिर्भर भारत का सपना देश को पिछले 12 सालों से दिखाया जा रहा है, क्या भारत वाकई तेल के मामले में आत्मनिर्भर बन पाया?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से वादा किया था कि वे भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को घटाकर पहले 67 फीसदी और फिर अपने तीसरे कार्यकाल के अंत तक 50 फीसदी पर ले आएंगे। लेकिन आज हकीकत इस वादे के बिल्कुल उलट खड़ी है।

90% आयात पर निर्भरता: उजागर हुई भारत की सबसे बड़ी कमजोरी
बीते 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, तो पूरे पश्चिम एशिया (West Asia) में युद्ध छिड़ गया। ईरान ने जैसे ही सामरिक रूप से महत्वपूर्ण 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को बंद किया, उसका सबसे बड़ा खामियाजा भारत को उठाना पड़ा।

इसकी वजह बेहद चौंकाने वाली है:

आयात में भारी उछाल: भारत अब अपनी ईंधन खपत का करीब 90 फीसदी हिस्सा सिर्फ आयात (Import) के जरिए पूरा कर रहा है।

घरेलू उत्पादन में गिरावट: पिछले 12 वर्षों में जहां एक तरफ विदेशी तेल पर हमारी निर्भरता 15 फीसदी बढ़ गई, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर कच्चे तेल का घरेलू प्रोडक्शन (Production) बढ़ने के बजाय लगातार गिरता चला गया।

पश्चिम एशिया के इस संकट ने पूरी दुनिया के सामने भारत की इस सबसे बड़ी नीतिगत और आर्थिक कमजोरी को बेनकाब कर दिया है।

'महंगा डॉलर और तेल कंपनियों का घाटा' बोझ सिर्फ जनता पर
देश के भीतर कच्चे तेल का उत्पादन न बढ़ा पाने का ही नतीजा था कि ईरान युद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ते ही देश की जनता त्राहि-त्राहि करने लगी।

इस संकट के बीच सरकारी तेल कंपनियों ने तुरंत 8 रुपये प्रति लीटर तक पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा दिए। कंपनियों की तरफ से तर्क दिया गया कि:

महंगा कच्चा तेल खरीदने के कारण उन्हें घरेलू बाजार में ईंधन बेचने पर भारी नुकसान (Under-recovery) हो रहा है।

डॉलर के मुकाबले रुपये की रिकॉर्ड कमजोरी ने कच्चे तेल के आयात को भारत के लिए और ज्यादा महंगा बना दिया है।

दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा फासला
तमाम दावों, बैठकों और 'समुद्र मंथन' के बावजूद, सरकार देश के भीतर क्रूड ऑयल का प्रोडक्शन बढ़ाने में नाकाम साबित हुई है। नतीजा यह है कि हमारी निर्भरता दूसरे देशों पर साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।

जब तक इस बुनियादी कमजोरी का ठोस सामाधान नहीं निकाला जाता, तब तक वैश्विक मंच पर होने वाली किसी भी हलचल की कीमत भारत के आम आदमी को अपनी जेब से ही चुकानी पड़ेगी।


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