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जमीन खरीद विवाद पर कांग्रेस का हमला, क्या जवाब देंगे सीएम मोहन यादव?

मध्य प्रदेश में कथित जमीन खरीद विवाद पर कांग्रेस ने सीएम मोहन यादव को घेरा है, जबकि पार्टी की अंदरूनी कलह ने विपक्ष की रणनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।


मध्य प्रदेश की राजनीति इस वक्त सिर्फ एक कथित जमीन विवाद तक सीमित नहीं है। एक तरफ कांग्रेस मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार से जुड़ी जमीन खरीद को लेकर गंभीर आरोप लगा रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ आरोपों का नहीं है बल्कि विपक्ष की विश्वसनीयता का भी है। क्या कांग्रेस सरकार को ढंग से घेर पाएगी या फिर उसकी अपनी अंदरूनी खींचतान ही उसके अभियान की धार को कमजोर कर देगी। इन सबके बीच कई और सवाल हैं।

अगर मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार से जुड़ी जमीन खरीद पर इतने गंभीर सवाल उठ रहे हैं तो क्या मुख्यमंत्री को खुद सामने आकर जवाब नहीं देना चाहिए? अगर इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट तथ्यों से परे है तो फिर उसके खिलाफ अदालत का दरवाजा अब तक क्यों नहीं खटखटाया गया? क्या कांग्रेस वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है या यह सिर्फ चुनावी राजनीति का एक और अभियान है और जब कांग्रेस खुद अपने नेताओं के बीच तालमेल नहीं बना पा रही तो क्या वह भाजपा को कटघरे में खड़ा कर पाएगी?


पिछले हफ्ते इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट सामने आती है। रिपोर्ट में दावा किया जाता है कि गया कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार से जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने उज्जैन में करीब 45 करोड़ रुपये खर्च कर 168 एकड़ में फैले 137 प्लॉट खरीदे। रिपोर्ट के मुताबिक यह खरीद दिसंबर 2023 के बाद शुरू हुई और जिन इलाकों में जमीन खरीदी गई वहां पहले से हाईवे,कॉरिडोर और मास्टर प्लान के तहत विकास परियोजनाओं की घोषणा हो चुकी थी। यहीं से कांग्रेस को सरकार पर बड़ा हमला बोलने का मौका मिल गया।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी लगातार मुख्यमंत्री से जवाब मांग रहे हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस ने मुख्यमंत्री को तीन दिन का समय दिया था। मंत्री बोल चुके हैं संगठन सफाई दे चुका है लेकिन मुख्यमंत्री अब भी चुप हैं। पटवारी का कहना है कि लोकतंत्र में मौन जवाब नहीं होता। उनका सीधा प्रश्न है कि अगर रिपोर्ट गलत है तो अदालत जाइए अगर आरोप बेबुनियाद हैं तो जनता के सामने सबूत रखिए। और अगर जवाब नहीं मिलेगा तो कांग्रेस जवाब दो अभियान चलाएगी।इसके बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव जयराम रमेश भी मैदान में उतरते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री पर निजी लाभ के लिए कथित भूमि घोटाले का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया और कहा कि कांग्रेस उनका इस्तीफा मांगती रहेगी क्योंकि जवाबदेही तय करने का यही रास्ता है। यानी अब यह सिर्फ प्रदेश कांग्रेस का अभियान नहीं रहा बल्कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी पूरी तरह इसमें उतर चुका है।

कांग्रेस सिर्फ जमीन विवाद तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी ने महाकाल मंदिर ट्रस्ट,खाद संकट,नीट,सीबीएसई और कथित भ्रष्टाचार जैसे कई मुद्दों को जोड़कर सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान का ऐलान किया है। जीतू पटवारी ने एक नया पोर्टल लॉन्च करने की भी घोषणा की है जिसमें कथित भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जानकारी जुटाई जाएगी। लेकिन यहीं कहानी अलग मोड़ भी लेती है। जब कांग्रेस भाजपा पर हमला तेज कर रही थी, उसी समय पार्टी के भीतर मतभेद भी सतह पर आ गए। दिग्विजय सिंह के एक बयान पर कांग्रेस के कई नेताओं ने नाराजगी जाहिर की। इससे यह संदेश गया कि भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने से पहले कांग्रेस को अपने घर की एकजुटता साबित करनी होगी। बाहर भाजपा से लड़ाई और भीतर नेतृत्व की खींचतान यह किसी भी विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है। वहीं भाजपा भी रक्षात्मक होने के बजाय पलटवार की रणनीति पर है। भाजपा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और उनके बेटे तथा कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियंक खड़गे पर जमीन खरीद को लेकर सवाल उठाए हैं। भाजपा ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से भी कार्रवाई की मांग की है।

अब सवाल जनता का है। जनता आरोप नहीं सबूत देखना चाहती है। जनता बयान नहीं जवाब चाहती है। जनता यह जानना चाहती है कि सच क्या है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री की चुप्पी चर्चा का विषय बन गई है। कांग्रेस कह रही है कि मुख्यमंत्री खुद सामने आकर जवाब दें। भाजपा के नेता सफाई दे रहे हैं। लेकिन विपक्ष का कहना है कि जनता सीधे मुख्यमंत्री की बात सुनना चाहती है। हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है। क्या हर राजनीतिक आरोप लगते ही किसी मुख्यमंत्री को सार्वजनिक सफाई देनी चाहिए? या पहले जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करना चाहिए? यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है। कांग्रेस अब इस पूरे मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश की निगरानी में कराने की मांग कर रही है। इससे वह यह संदेश देना चाहती है कि उसे राज्य की जांच एजेंसियों पर भरोसा नहीं है। लेकिन इस मांग पर फैसला राजनीतिक मंच नहीं कानूनी प्रक्रिया करेगी।

क्या यह मुद्दा 2028 के विधानसभा चुनाव तक जाएगा? इसका जवाब आज किसी के पास नहीं है। अगर नए दस्तावेज सामने आते हैं जांच आगे बढ़ती है और आरोपों की पुष्टि या खंडन होता है तो यह मामला लंबे समय तक राजनीति के केंद्र में रह सकता है। लेकिन अगर यह विवाद सिर्फ आरोप और पलटवार तक सिमट गया तो जनता अगले मुद्दे की तरफ बढ़ जाएगी। जवाब दो अभियान और नया पोर्टल की रणनीति के जरिए मध्य प्रदेश कांग्रेस ने अपने तेवर दिखा दिए हैं। इसी रणनीति का हिस्सा हैं। लेकिन मूल मुद्दा यह है कि क्या कांग्रेस खुद एकजुट है? अगर पार्टी के नेता अलग-अलग सुर में बोलेंगे सार्वजनिक मतभेद जारी रहेंगे और अंदरूनी खींचतान खत्म नहीं होगी तो क्या जनता उसके भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को गंभीरता से लेगी?

अंत में फिर वही सवाल क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव को खुद सामने आकर पूरे मामले पर विस्तार से जवाब नहीं देना चाहिए? क्या आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है? क्या कांग्रेस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार पर दबाव बनाए रख पाएगी या उसकी अंदरूनी कलह ही उसके अभियान की सबसे बड़ी बाधा बन जाएगी? क्या यह विवाद सचमुच जवाबदेही तय करेगा या फिर बाकी राजनीतिक आरोपों की तरह कुछ दिनों की सुर्खियां बनकर रह जाएगा? लेकिन इतना तय है कि मध्य प्रदेश की राजनीति कांग्रेस और भाजपा दोनों की पारदर्शिता और राजनीतिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा बन चुकी है।

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