MVA में दरार! अकेले पड़े उद्धव ठाकरे, सहयोगियों से पूछा- क्या हम साथ हैं?
x

MVA में दरार! अकेले पड़े उद्धव ठाकरे, सहयोगियों से पूछा- क्या हम साथ हैं?

बैठक से 23 विधायक और शरद पवार गायब; 'जनपथ' शो में मनीष कुमार का बड़ा विश्लेषण—क्या महाराष्ट्र में टूटने की कगार पर है महा विकास आघाड़ी?


Click the Play button to hear this message in audio format

Siyasat: महाराष्ट्र की सियासत में इस समय सबसे बड़ा भूचाल आया हुआ है। कभी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को सत्ता से दूर रखने के लिए 'फेविकोल के जोड़' की तरह बनाई गई महा विकास आघाड़ी (MVA) अब खुद अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ती नजर आ रही है। राजनीति में हार सिर्फ सीटों की नहीं होती, सबसे बड़ी हार भरोसे की होती है, और जब सहयोगियों के बीच से वही भरोसा टूटने लगे, तो दरारें सीधे घर के भीतर दिखाई देने लगती हैं।


'द फेडरल देश' के शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने महाराष्ट्र विपक्ष के इस गहरे संकट का एक-एक पन्ना खोला है। महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र से ठीक पहले बुलाई गई विपक्षी गठबंधन की महा-बैठक ने एकजुटता का संदेश देने के बजाय बिखराव की एक नई और चिंताजनक कहानी देश के सामने रख दी है।


बैठक से सीनियर लीडर्स और 23 विधायक गायब: एकजुटता का दावा हवा!
मानसून सत्र में शिंदे-भाजपा सरकार को घेरने की रणनीति बनाने के लिए बुलाई गई इस हाई-प्रोफाइल बैठक का नतीजा पूरी तरह उल्टा रहा।

23 विधायकों ने बनाई दूरी: गठबंधन के कुल 60 विधायकों में से 23 विधायक इस बैठक में पहुंचे ही नहीं। इतनी बड़ी संख्या में विधायकों का नदारद रहना साफ तौर पर अंदरूनी बगावत या भारी असंतोष की ओर इशारा करता है।

दिग्गज चेहरों की गैर-मौजूदगी: बैठक में केवल विधायक ही गायब नहीं थे, बल्कि एनसीपी (शरद चंद्र पवार) के चाणक्य शरद पवार, महाराष्ट्र कांग्रेस के कद्दावर नेता नाना पटोले और जयंत पाटिल जैसे सबसे बड़े चेहरे भी मंच पर दिखाई नहीं दिए।

राजनीति में नेताओं की अनुपस्थिति कई बार उनकी मौजूदगी से ज्यादा शोर करती है। बैठक में उद्धव ठाकरे के इर्द-गिर्द सिर्फ जूनियर नेताओं की फौज बची थी, जिसने विपक्ष के शक्ति-प्रदर्शन के गुब्बारे की हवा निकाल दी।

"क्या हम सचमुच साथ हैं?" उद्धव ठाकरे का तीखा सवाल
मंच से बड़े नेताओं और अपनी ही आघाड़ी के विधायकों को गायब देख शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे अपनी नाराजगी और लाचारी नहीं छिपा सके। उन्होंने भरी बैठक में अपनी ही आघाड़ी से बेहद तीखे और असहज करने वाले सवाल पूछे:

"हम मंच पर खड़े होकर कहते हैं कि हम साथ हैं... लेकिन क्या हम सचमुच साथ हैं? क्या हम सदन के भीतर एकजुट हैं? क्या हम जनता के मुद्दों को मिलकर उठाते हैं या सिर्फ कहने के लिए एक मंच साझा कर रहे हैं?"

— उद्धव ठाकरे (MVA की बैठक में)

उद्धव ठाकरे की यह छटपटाहट और उनकी 'बॉडी लैंग्वेज' साफ बयां कर रही थी कि वे गठबंधन के भीतर खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। विरोधियों को भी चुटकी लेने का मौका मिल गया है कि उद्धव ठाकरे अब महा विकास आघाड़ी में बिल्कुल अलग-थलग पड़ चुके हैं।

ठाकरे परिवार की 'राजनीतिक विरासत' पर सीधा वार
शो में एंकर मनीष कुमार ने विश्लेषण करते हुए बताया कि उद्धव ठाकरे का यह दर्द अकारण नहीं है। उनके सामने इस समय अपनी पार्टी और ठाकरे परिवार की राजनीतिक विरासत को बचाने का दोहरा संकट खड़ा है:

2022 का जख्म और नया झटका: 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना तोड़ी, सरकार गिराई और तीर-कमान का सिंबल भी ले गए। उद्धव इस झटके से संभलने की कोशिश कर ही रहे थे कि हाल ही में उनकी शिवसेना यूबीटी के 6 लोकसभा सांसद भी पाला बदलकर शिंदे खेमे में चले गए।

पार्टी के भीतर फिर बगावत का डर: राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का अंतिम लक्ष्य सिर्फ सत्ता चलाना नहीं, बल्कि ठाकरे परिवार के राजनीतिक प्रभाव को महाराष्ट्र से पूरी तरह खत्म करना है। यही वजह है कि उद्धव खेमे में अब अपने बचे हुए विधायकों के टूटने का डर भी सता रहा है।

विरोधाभासी विचारधारा का बेमेल गठबंधन
'जनपथ' के विश्लेषण में यह बात साफ तौर पर उभर कर आई कि महा विकास आघाड़ी की बुनियाद ही कमजोर थी। यह वैचारिक तालमेल का नहीं, बल्कि 'राजनीतिक मजबूरी' और 'साझा दुश्मन' (बीजेपी) को रोकने के लिए बनाया गया गठबंधन था:

शिवसेना: हमेशा से कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करती आई है।

कांग्रेस: खुद को देश में सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) राजनीति का चेहरा बताती है।

एनसीपी: क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और मराठा कार्ड पर चलती है।

जब तक सत्ता की मलाई थी, ये तीनों दल एक साथ थे, लेकिन सत्ता से बाहर आते ही इस बेमेल रसायन की दरारें पूरी तरह खुल चुकी हैं।

महाराष्ट्र की बेचैनी: पूरे 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के लिए खतरे की घंटी
एंकर मनीष कुमार ने शो के अंत में एक बेहद महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को सामने रखा। MVA की यह आंतरिक कलह केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर पर बने 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के भीतर की कमजोरियों का भी आईना है:

बिहार में झटका: राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस विधायकों के भितरघात या असहयोग के चलते आरजेडी (RJD) के अधिकृत प्रत्याशी एडी सिंह को हार का सामना करना पड़ा।

झारखंड में दरार: सीटों के बंटवारे और आपसी खींचतान के कारण झारखंड में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा चुनाव हार गए।


यद्यपि गठबंधन के कुछ छोटे नेता कैमरे के सामने डैमेज कंट्रोल करते हुए यह सफाई दे रहे हैं कि "सब कुछ ठीक है और अनुपस्थित विधायक अपने क्षेत्रों के दौरे पर थे," लेकिन बंद कमरों की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

उद्धव ठाकरे का यह सवाल "क्या हम सचमुच साथ हैं?" आज सिर्फ महाराष्ट्र की महा विकास आघाड़ी से नहीं, बल्कि पूरे देश के विपक्षी कुनबे से पूछा जा रहा है। आने वाले मानसून सत्र और आगामी विधानसभा चुनाव तय करेंगे कि यह गठबंधन केवल मंच साझा करने तक सीमित रहेगा या सचमुच एकजुट होकर चुनावी समर में उतर पाएगा।



Read More
Next Story