ट्रस्ट से चंपत राय आउट: इस्तीफा या कानूनी फंदे से बचाने का खेल?
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ट्रस्ट से चंपत राय आउट: इस्तीफा या कानूनी फंदे से बचाने का खेल?

राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे पर विशेष बहस। क्या यह केवल दिखावा है या अरेस्ट से बचाने की कोई गुप्त डील?


Nishpaksh: अयोध्या के भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे (दान राशि) की चोरी और वित्तीय हेराफेरी के महा-खुलासे के बाद देश की राजनीति में अब तक का सबसे बड़ा भूचाल आ गया है। विशेष जांच दल (SIT) की उस सनसनीखेज रिपोर्ट के बाद जिसमें खुलासा हुआ था कि महज 42 दिनों के भीतर राम मंदिर के खजाने से 70 बार कैश गायब किया गया श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और वरिष्ठ ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने आखिरकार 'नैतिकता' का हवाला देते हुए अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है।


इस महा-इस्तीफे और 8 नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद द फेडरल देश के लोकप्रिय शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने अयोध्या से वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता, कांग्रेस के प्रवक्ता संजीव सिंह और राजनीतिक विश्लेषक शायरा नईम के साथ इस गंभीर मुद्दे पर तीखी और निष्पक्ष बहस की। सवाल बड़ा है: यह इस्तीफा वाकई नैतिकता है, या फिर चंपत राय को सीधे कानूनी गिरफ्तारी से बचाने के लिए दिल्ली और लखनऊ के बीच हुआ कोई गुप्त कूटनीतिक समझौता?


"गिरफ्तारी से बचाने के लिए हुआ इस्तीफा; यह केवल दिखावा है" - कांग्रेस
बहस की शुरुआत करते हुए कांग्रेस प्रवक्ता संजीव सिंह ने सरकार और ट्रस्ट के पदाधिकारियों पर बेहद तीखे और सीधे कानूनी हमले किए:

मगरमच्छों को बचाने की कवायद: कांग्रेस प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि पहले दिन से विपक्ष इस खुली डकैती की आवाज उठा रहा था। नृपेंद्र मिश्र (राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष) ने खुद माना था कि यह चोरी नहीं डकैती है। पुलिस ने जिन 8 लोगों को गिरफ्तार किया है, वे केवल छोटी मछलियां हैं। असली बड़े मगरमच्छों (चंपत राय और अनिल मिश्रा) को कानूनी शिकंजे और गिरफ्तारी से बचाने के लिए ही रातों-रात यह 'इस्तीफे का ड्रामा' तैयार किया गया।

2021 के जमीन घोटाले का कनेक्शन: संजीव सिंह ने पुरानी कड़ियों को जोड़ते हुए कहा कि यह भ्रष्टाचार नया नहीं है। साल 2021 में महज 10 मिनट के भीतर 2 करोड़ रुपये की जमीन को ट्रस्ट ने साढ़े 18 करोड़ रुपये में खरीदा था, जिसमें अयोध्या के तत्कालीन बीजेपी मेयर ऋषिकेश उपाध्याय का भांजा शामिल था। इसके बाद 3 करोड़ की नजूल जमीन 24 करोड़ में और 9 करोड़ की जमीन साढ़े 54 करोड़ में खरीदी गई। चंपत राय खुद मजिस्ट्रेट के सामने जाकर इन कागजातों पर दस्तखत कर रहे थे, तो वे इस पूरे खेल से अनजान कैसे हो सकते हैं?

सिफारिशी तंत्र और अकूत संपत्ति: चंपत राय का निजी ड्राइवर और व्यवस्थापक टिन्नू यादव (रामशंकर यादव) आज करोड़ों का मालिक बन बैठा है। उसके पास 60-65 कमरों के होटल और कई रेस्टोरेंट्स में शेयर कहां से आए? उसने अपने चचेरे भाई मनीष यादव को नोट गिनने के काम में लगवाया। अनिल मिश्रा पर 40% कमीशन लेने के आरोप हैं, जिनके रिश्तेदारों के घर गोबर के ढेर से 12 लाख रुपये बरामद हुए।

अंतरराष्ट्रीय दान की चोरी: सिंधी समाज के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजू मानवाणी ने दावा किया है कि उन्होंने 200 किलो चांदी दान की, जिसकी रसीद तक नहीं मिली। उद्धव ठाकरे ने भी रसीद न मिलने की बात कही है। कांग्रेस ने मांग की है कि वर्तमान सरकारी एसआईटी के बजाय सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों की निगरानी में नई जांच समिति बनाई जाए और इस ट्रस्ट से भाजपा, आरएसएस (RSS) और विहिप (VHP) के राजनीतिक लोगों को पूरी तरह बाहर कर केवल साधू-संतों को कमान सौंपी जाए।

"अपराध और इस्तीफा दोनों अलग बातें; पर्दा डालना नामुमकिन" - सुमन गुप्ता
अयोध्या से ग्राउंड जीरो की हकीकत बयां करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता ने बताया कि इस समय अयोध्या के भीतर और आम राम भक्तों में भारी आक्रोश है:

"यह इस्तीफा दिया नहीं गया है, बल्कि चौतरफा दबाव के बाद शासन स्तर पर 'लिया गया है', ताकि इस पूरे विवाद का किसी तरह पटाक्षेप (End) किया जा सके। अगर यह वाकई नैतिकता के आधार पर होता, तो जैसे ही 13 जून को एसआईटी (SIT) का गठन हुआ था, इन्हें तभी पद छोड़ देना चाहिए था। अब जब 42 दिनों में 70 बार चोरी के पुख्ता सीसीटीवी (CCTV) और हिडन कैमरों के सबूत सामने आ चुके हैं, तब इस्तीफा हो रहा है। दिल्ली और कोलकाता के पुराने मामलों की तरह, पद छोड़ने से राजनीतिक बचाव तो हो सकता है, लेकिन जो वास्तविक आपराधिक कृत्य (Criminal Misappropriation of Funds) हुआ है, उस पर पर्दा डालना नामुमकिन है।"

"बोतल से बाहर आया करप्शन का जिन्न, ढहेगा ताश का महल" - शायरा नईम
राजनीतिक विश्लेषक शायरा नईम ने इस पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा के आंतरिक संबंधों के लिहाज से बेहद गंभीर बताया:

सैफरन ब्रिगेड पर बड़ा दाग: चंपत राय और अनिल मिश्रा दोनों का पुराना आरएसएस बैकग्राउंड है। इस घोटाले ने पूरे मंदिर आंदोलन से जुड़े संगठनों की साख को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह करप्शन रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि लंबे समय से चल रहे लैंड स्कैम और वित्तीय लूपहोल्स का नतीजा है।

हाउस ऑफ कार्ड्स की तरह ढहने का खतरा: यह पूरा विवाद अब एक 'ताश के महल' की तरह ढहने की ओर बढ़ रहा है। अयोध्या की जनता ने लोकसभा चुनाव में ही भाजपा को हराकर अपना संदेश दे दिया था क्योंकि उनकी आस्था को चोट पहुंचाई जा रही थी। यह केवल उत्तर प्रदेश की बात नहीं है, इस आंदोलन के दम पर भाजपा ने पूरे देश में नैरेटिव सेट कर सत्ता हासिल की थी, इसलिए इसका डैमेज बेहद व्यापक होगा।

साख और आस्था की कसौटी पर सरकार
इस पूरी बहस से यह साफ है कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के दो सबसे कद्दावर चेहरों का हटना केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि भाजपा के 'कोर सनातनी वोट बैंक' में गहरी दरार पैदा करने वाला कड़ा राजनीतिक संकट है।

भाजपा और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार निश्चित रूप से इस मामले पर डैमेज कंट्रोल करने और इसे 'निचले स्तर के कर्मचारियों की चोरी' साबित करने की पूरी कोशिश करेगी। लेकिन जिस तरह से करोड़ों रुपये के कैश, सोने के आभूषणों (रामलला के कंगन, नथ, पैजनिया) के गबन की इनसाइड स्टोरी और बैंक वाउचर्स में हेराफेरी के सबूत हिडन कैमरों में कैद हुए हैं, उसने जनता के विश्वास को झकझोर दिया है। अब यह विपक्ष की सांगठनिक क्षमता पर निर्भर करता है कि वह इस राष्ट्रीय स्तर के संवेदनशील मुद्दे को केवल बयानों तक सीमित रखता है या जमीन पर ले जाकर 2027 के चुनावों में सरकार के खिलाफ एक बड़ा हथियार बनाता है।


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