आखिर नीतीश कुमार को क्यों दिया गया यह विशेषाधिकार?
राष्ट्रीय राजनीति में पिछले कुछ समय से क्षेत्रीय दलों में टूट और उनके राष्ट्रीय चिन्ह व संविधान को लेकर कानूनी लड़ाइयां देखने को मिली हैं। शो में पुनीत निकोलस यादव ने इस पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसके पीछे राष्ट्रीय राजनीति का बदलता परिदृश्य हो सकता है।
चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि केंद्र सरकार में बीजेपी के लिए जेडीयू की निर्भरता अब वैसी नहीं रह गई है जैसी कुछ समय पहले तक थी। टीएमसी और शिवसेना (UBT) के धड़ों में टूट और एनडीए में नए समीकरणों के जुड़ने की अटकलों के बीच नीतीश कुमार बखूबी समझ रहे हैं कि अगर पार्टी को अंदरूनी तौर पर सुरक्षित और अभेद्य नहीं बनाया गया, तो आने वाले दिनों में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पुनीत यादव का मानना है कि इस फैसले के जरिए नीतीश कुमार ने पार्टी की पूरी कमान अपने हाथ में केंद्रित कर ली है ताकि भविष्य में किसी भी तरह के 'ऑपरेशन लोटस' या आंतरिक बगावत की स्थिति में वो बिना किसी सांगठनिक अड़चन के तुरंत और कड़े फैसले ले सकें।
निशांत कुमार की 'लॉन्चिंग' और जेडीयू का नया वारिस
इस बैठक का एक और सबसे बड़ा और अप्रत्यक्ष पहलू नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को पार्टी के भावी चेहरे के रूप में स्थापित करना रहा। वरिष्ठ पत्रकार दीपक कोजगवे ने बताया कि भले ही निशांत कुमार को अभी आधिकारिक रूप से कोई बड़ा सांगठनिक पद न दिया गया हो, लेकिन करपूरी सभागार में हुई इस बैठक और हालिया घटनाक्रमों से यह साफ संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में जेडीयू की बागडोर उन्हीं के हाथों में होगी।
पूर्व शिक्षा मंत्री और जेडीयू विधायक सुनील कुमार समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने बैठक के बाद खुले तौर पर कहा कि 'सात निश्चय पार्ट-3' और पार्टी के विस्तार कार्यक्रम में निशांत कुमार की बड़ी भूमिका होगी। दीपक कोजगवे के अनुसार, नीतीश कुमार खुद को जानबूझकर मंच पर पीछे रख रहे हैं ताकि निशांत कुमार को वरिष्ठ नेताओं (ललन सिंह, संजय झा, विजय चौधरी और विजेंद्र यादव) के बीच आगे बढ़ने और रिहर्सल करने का पूरा मौका मिले। हाल ही में योग दिवस के कार्यक्रम में भी निशांत कुमार को बीजेपी नेता सम्राट चौधरी के बगल में देखा गया, जो उनके बढ़ते राजनीतिक कद को दर्शाता है।
सेकेंड लाइन लीडरशिप की मजबूरी और परिवारवाद का नया ट्रेंड
नीतीश कुमार हमेशा से राजनीति में परिवारवाद के मुखर विरोधी रहे हैं, लेकिन जेडीयू में निशांत कुमार को आगे बढ़ाना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी माना जा रहा है। पुनीत निकोलस यादव के अनुसार, नीतीश कुमार ने अपने इतने लंबे राजनीतिक करियर में कभी भी किसी 'सेकेंड लाइन लीडरशिप' या अपने 'उत्तराधिकारी' को पनपने नहीं दिया। जो भी नेता नंबर-2 की हैसियत में आने की कोशिश करता था, वो समय के साथ पार्टी से बाहर या साइडलाइन हो गया।
अब जबकि नीतीश कुमार के स्वास्थ्य और सक्रियता को लेकर लगातार कयास लगाए जाते रहे हैं, पार्टी को टूटने से बचाने और अपनी विरासत को सुरक्षित रखने के लिए उनके पास निशांत कुमार के अलावा कोई दूसरा भरोसेमंद चेहरा नहीं है। हालांकि, निशांत कुमार के पास तेजस्वी यादव या चिराग पासवान की तरह जमीन पर चुनाव लड़ने या रैलियों को लीड करने का व्यापक अनुभव नहीं है। उन्हें स्वास्थ्य मंत्री के रूप में सरकार में शामिल जरूर किया गया है, लेकिन जनता के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए उनके पास बेहद कम समय है, जहां उन्हें अपने पिता के राजनीतिक संरक्षण की जरूरत होगी। वहीं दीपक कोजगवे ने जोड़ा कि आज की राजनीति में यह एक कल्चर और ट्रेंड बन गया है कि नेता अपनी बनाई हुई पार्टी को अपनी ही संतान को सौंप रहे हैं, चाहे वह लालू प्रसाद यादव हों, रामविलास पासवान, ममता बनर्जी या अखिलेश यादव।
बीजेपी का दबाव और नीतीश कुमार की जमीनी यात्रा
बिहार की मौजूदा सरकार में बीजेपी ने जेडीयू पर अपनी पकड़ मजबूत की है। गृह मंत्रालय और सामान्य प्रशासन जैसे महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रखने के बाद बीजेपी बैक-टू-बैक प्रशासनिक फेरबदल कर रही है। नीतीश कुमार के करीबी अधिकारियों को हटाकर जिलों के एसपी और डीएम बदले जा रहे हैं। नीतीश कुमार इस दबाव को भांप चुके हैं। उन्हें पता है कि अगर वो सांगठनिक रूप से कमजोर पड़े, तो बीजेपी उन पर पूरी तरह हावी हो जाएगी।
यही कारण है कि चौथी बार अध्यक्ष बनते ही नीतीश कुमार ने दोबारा जमीन पर उतरने का फैसला किया है। वो जल्द ही बिहार के अलग-अलग शहरों और जिलों का दौरा करेंगे, कार्यकर्ताओं से मिलेंगे और जनता से सीधा संवाद स्थापित करेंगे। नीतीश कुमार का यह पुराना और परखा हुआ स्टाइल रहा है। वो जानते हैं कि जब तक जमीन पर जेडीयू का कैडर मजबूत रहेगा, तब तक आरजेडी जैसी विरोधी पार्टी और बीजेपी जैसी सहयोगी पार्टी, दोनों ही उन्हें कम आंकने की भूल नहीं कर पाएंगी।
'द फेडरल देश' के 'जनपथ' शो में हुई इस खास चर्चा ने साफ कर दिया है कि नीतीश कुमार भले ही उम्र के इस पड़ाव पर हों, लेकिन उनकी राजनीतिक चतुराई और दूरदर्शिता अभी भी कम नहीं हुई है। पार्टी संविधान में संशोधन का एकाधिकार लेकर उन्होंने बाहरी खतरों का रास्ता बंद किया है, तो वहीं बेटे निशांत कुमार को धीरे-धीरे आगे बढ़ाकर उन्होंने जेडीयू के 'स्मूथ ट्रांजिशन' (सत्ता हस्तांतरण) की नींव रख दी है। बिहार की राजनीति में आने वाले दिन बेहद दिलचस्प होने वाले हैं।