क्या पासपोर्ट सिर्फ यात्रा दस्तावेज़? नागरिकता पर बड़ा घमासान
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क्या पासपोर्ट सिर्फ यात्रा दस्तावेज़? नागरिकता पर बड़ा घमासान

विदेश मंत्रालय की टिप्पणी से नया विवाद; वोटर लिस्ट, आधार कार्ड और मत के अधिकार को लेकर पंजाब से बंगाल तक आम जनता और एक्टिविस्ट्स ने उठाए गंभीर सवाल।


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Nishpaksh: देश में इस समय पासपोर्ट, आधार कार्ड और नागरिकों के वोटिंग अधिकारों को लेकर एक नया कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। इस बहस की शुरुआत तब हुई जब विदेश मंत्रालय ने अपने एक बयान में स्पष्ट किया कि पासपोर्ट मुख्य रूप से केवल एक 'ट्रेवल डॉक्यूमेंट' (यात्रा दस्तावेज़) है, और यह आपकी नागरिकता को प्रमाणित करने वाला अंतिम दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता। सरकार की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा विवाद छिड़ गया है।

द फ़ेडरल देश के 'निष्पक्ष' शो में वरिष्ठ पत्रकार नीलू व्यास ने वरिष्ठ अधिवक्ता अरुणेश्वर गुप्ता और एक्टिविस्ट तारा राव के साथ इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं और आम जनता व एक्टिविस्ट्स की चिंताओं का गहराई से विश्लेषण किया।

क्या है पूरा विवाद और पंजाब-बंगाल कनेक्शन?

विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद जनता के बीच इस बात को लेकर असमंजस और गुस्सा है कि यदि आधार, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आईडी और अब पासपोर्ट भी नागरिकता का अचूक प्रमाण नहीं हैं, तो आखिर देशवासियों की नागरिकता साबित करने वाला दस्तावेज़ कौन सा है?

इस विवाद का सीधा असर आगामी चुनावों और राज्यों में चल रही प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर पड़ता दिख रहा है:

पंजाब में चुनाव और चिंता: पंजाब में 'स्टेट इन्फॉर्मेशन रजिस्टर' (SIR) या इसी तरह की पहचान प्रक्रियाएं शुरू होने की चर्चाओं के बीच यह मुद्दा गरमा गया है। पंजाब में देश में सबसे अधिक, लगभग 28% पासपोर्ट धारक रहते हैं। ऐसे में अगले साल होने वाले चुनावों से ठीक पहले आई इस टिप्पणी से लोग आशंकित हैं कि कहीं इसके ज़रिए नागरिकों के मतदान के अधिकार (वोटिंग राइट्स) को प्रभावित करने की कोशिश तो नहीं की जा रही है।

बिहार और बंगाल के आंकड़े: एक्टिविस्ट्स का दावा है कि वोटर लिस्ट में बदलावों या सुधारों के नाम पर लाखों लोग पहले ही अपने मत के अधिकार से वंचित हो चुके हैं। दावों के मुताबिक, बिहार में राशन कार्ड की सूची से लगभग 3% नाम काटे गए हैं, और इसी तरह की प्रक्रियाएं अन्य राज्यों में भी देखने को मिल रही हैं, जिससे नागरिकों में 'डिटेंशन सेंटर्स' और अधिकारों के छीने जाने का डर बैठ गया है।

कानूनी पक्ष: "पासपोर्ट एक खंडनीय अनुमान (Rebuttable Presumption) है"

मामले के कानूनी पहलू को समझाते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अरुणेश्वर गुप्ता ने बताया कि जनता में फैला यह डर काफी हद तक 'फ्यूचरिस्टिक ट्रॉमा' (भविष्य के अनजाने डर) पर आधारित है और कानूनी रूप से निराधार है। उनके अनुसार:

"संविधान के आर्टिकल 326 और रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ पीपल एक्ट के तहत देश के हर नागरिक को वोट देने का अधिकार है। जहाँ तक पासपोर्ट (पासपोर्ट एक्ट 1967) का सवाल है, तो यह केवल एक भारतीय नागरिक को ही जारी किया जा सकता है। इसलिए देश के भीतर यह नागरिकता का एक मज़बूत आधार है।"

उन्होंने तकनीकी बारीकी समझाते हुए कहा कि पासपोर्ट नागरिकता का 'खंडनीय अनुमान' (Rebuttable Presumption) है। इसका मतलब यह है कि जब तक कोई अदालत में यह साबित न कर दे कि आपका पासपोर्ट फ़र्जी (Forged) या अवैध है, तब तक उसे आपकी नागरिकता का वैध प्रमाण माना जाएगा। विदेश मंत्रालय का बयान विशुद्ध रूप से एक कानूनी परिभाषा है कि विदेश जाने पर तो यह आपकी नागरिकता का अचूक दस्तावेज़ है, लेकिन देश के भीतर इसके आधार पर अन्य कानूनी चुनौतियों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

एक्टिविस्ट्स की चिंता: "वोटर लिस्ट को ब्लैंक शीट बनाना लोकतंत्र के खिलाफ"

दूसरी ओर, एक्टिविस्ट तारा राव ने सरकार की इस नीति और मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ पासपोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे की बड़ी तस्वीर डराने वाली है।

मूविंग गोलपोस्ट: सरकार लगातार नियमों को बदल रही है। पहले आधार को मुख्य पहचान बताया गया, फिर उसे नागरिकता के दायरे से बाहर किया गया, राशन कार्डों को बदला गया और अब पासपोर्ट पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यह एक 'मूविंग गोलपोस्ट' की तरह है जहाँ नागरिक कभी तय नहीं कर पाते कि उनके पास कौन सा सही दस्तावेज़ है।

अधिकारों पर खतरा: तारा राव ने आगाह किया कि यदि किसी नागरिक का नाम वोटर लिस्ट से कट जाता है, तो धीरे-धीरे उसके सभी नागरिक अधिकार—जैसे ज़मीन रखना, घर खरीदना, बच्चों का स्कूल-कॉलेज में दाखिला कराना—सब दांव पर लग जाता है। लोकतंत्र एक समावेशी (Inclusive) प्रक्रिया होनी चाहिए, लेकिन मौजूदा नीतियों से यह प्रक्रिया 'एक्सक्लूसिव' (लोगों को बाहर करने वाली) बनती जा रही है।

इस पूरी बहस से यह साफ़ है कि जहाँ एक तरफ कानूनी जानकार विदेश मंत्रालय के बयान को तकनीकी और कानूनी रूप से शत-प्रतिशत सही मान रहे हैं, वहीं ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक संगठनों और आम जनता में अविश्वास का माहौल है। चुनाव के ठीक मुहाने पर खड़े राज्यों के नागरिकों को डर है कि पहचान और दस्तावेज़ों के इस तमाशे में कहीं उनका सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अधिकार—यानी 'वोट देने का अधिकार'—न छिन जाए।

अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इस असमंजस को दूर करने के लिए नागरिकता प्रमाणित करने का कोई एकल और सरल रास्ता देश के सामने रखती है या यह राजनीतिक रस्साकशी ऐसे ही चलती रहेगी।

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