
राम मंदिर चंदा विवाद: यूपी में राजनीतिक उबाल और अजय राय की नजरबंदी
राम मंदिर चढ़ावे में गड़बड़ी के आरोपों पर यूपी में सियासी घमासान; अजय राय नजरबंद, सपा ने सरकार को घेरा और वीएचपी ने ट्रस्ट के विवाद से पल्ला झाड़ा।
Nishpaksh : राम मंदिर चढ़ावे और चंदा चोरी के मामले को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया और बेहद संवेदनशील पड़ाव देखने को मिल रहा है। यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को उनके प्रतिनिधिमंडल के साथ अयोध्या के एक होटल से उठाकर नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में नजरबंद (हाउस अरेस्ट) कर दिया गया है। 'द फेडरल देश' के प्रमुख डिबेट शो 'निष्पक्ष' में आज इसी मुद्दे पर चर्चा हुई कि क्या बीजेपी इस मुद्दे से घबराकर विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश कर रही है?
1. अयोध्या में क्या हुआ? कैसे हुई अजय राय की नजरबंदी?
कार्यक्रम की शुरुआत में वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता ने अयोध्या के जमीनी हालातों की पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अजय राय अपने दल के विधायकों, सांसदों और अन्य पदाधिकारियों के साथ अयोध्या के एक होटल में पहुंचे थे। उनका उद्देश्य राम मंदिर प्रांगण में जाकर विशेष पूजा-प्रार्थना करना था।
"अजय राय का उद्देश्य भगवान से प्रार्थना करना था कि मंदिर के नाम पर गबन और चोरी करने वालों को ईश्वर सद्बुद्धि दे और उन्हें दंड मिले। लेकिन उनके पहुंचते ही पुलिस ने होटल में ही उन्हें नजरबंद कर दिया और रात में विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस ले गई।" - सुमन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार
जैसे ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं को इसकी भनक लगी, सुबह से ही वहां जोरदार धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया। माहौल बिगड़ता देख पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के 5-6 नेताओं को गेस्ट हाउस ले जाकर अजय राय से मुलाकात कराई, जिसके बाद धरना समाप्त हुआ। हालांकि, अजय राय अब भी दर्शन करने की मांग पर अड़े हुए हैं।
2. "चोर की दाढ़ी में चंदा है" - समाजवादी पार्टी का करारा हमला
चर्चा में शामिल हुए समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता सर्वेश त्रिपाठी ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए अजय राय की नजरबंदी को 'अपहरण' करार दिया। उन्होंने योगी सरकार और बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को घेरते हुए कहा:
"चोर की दाढ़ी में सामान्यतः तिनका होता है, लेकिन यहाँ चोर की दाढ़ी में चंदा और चढ़ावा है। यह हाउस अरेस्ट नहीं, बल्कि सरकार के डर के कारण किया गया अपहरण है।" - सर्वेश त्रिपाठी, प्रवक्ता, सपा
सर्वेश त्रिपाठी ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के हाथ बंधे हुए हैं और पूरा खेल दिल्ली (PMO) से संचालित हो रहा है। उन्होंने अयोध्या के स्थानीय संत समाज की नाराजगी का हवाला देते हुए कहा कि नृपेंद्र मिश्रा और चंपत राय जैसे बाहरी लोगों को लाकर ब्यूरोक्रेसी के जरिए मंदिर को विवादित कर दिया गया है। सपा प्रवक्ता ने पूर्व मेयर ऋषिकेश उपाध्याय और जमीनों के सौदों में हुई कथित हेराफेरी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है।
3. चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे: क्या केवल खानापूर्ति?
डिबेट में यह बड़ा सवाल भी उठा कि चंपत राय और अनिल मिश्रा द्वारा ट्रस्ट से दिए गए इस्तीफों के बाद क्या उनकी गिरफ्तारी होगी?
इस पर सर्वेश त्रिपाठी ने कहा कि जिन धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई है, वे बेहद कमजोर हैं। जब एसआईटी की प्रारंभिक जांच में चंपत राय को क्लीन चिट दे दी गई, तो फिर उनका इस्तीफा क्यों लिया गया? विपक्ष का आरोप है कि मुख्य आरोपियों को बचाने के लिए केवल इस्तीफों से काम चलाया जा रहा है, जबकि दर्शन करने जा रहे विपक्षी नेताओं को अघोषित जेल (नजरबंदी) में भेजा जा रहा है।
4. पल्ला झाड़ रही है वीएचपी, जनता तक पहुंच चुका है संदेश
वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता ने इस पूरे प्रकरण का एक और दिलचस्प पहलू सामने रखा। उन्होंने बताया कि विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी अब इस पूरे विवाद से पल्ला झाड़ लिया है। वीएचपी का कहना है कि उनका काम केवल आंदोलन और अदालती फैसला आने तक था, उसके बाद ट्रस्ट की गतिविधियों से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
सुमन गुप्ता ने विश्लेषण करते हुए कहा:
"अब कोई भी इस बदनामी को अपने सिर नहीं लेना चाहता। जो लोग पहले इस मुद्दे पर अपना पेटेंट बताते थे, वे अब पल्ला झाड़ रहे हैं। विपक्ष इस मुद्दे को आगे कितना उठा पाता है, यह अलग बात है, लेकिन श्रद्धालुओं और आम जनता तक यह संदेश स्पष्ट रूप से चला गया है कि मंदिर में जो कुछ हुआ है, वह बहुत गलत हुआ है।"
'निष्पक्ष' शो के इस विश्लेषण से साफ है कि राम मंदिर के चढ़ावे में हुई गड़बड़ी के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह बैकफुट पर नजर आ रही है। हालांकि, विपक्ष के सामने चुनौती यह है कि वह सरकार की कड़ी बंदिशों और नजरबंदी जैसी कार्रवाइयों के बीच इस संवेदनशील मुद्दे को 2027 के विधानसभा चुनाव तक जमीन पर कैसे जिंदा रखता है। क्या यह जांच किसी तार्किक अंत तक पहुंचेगी या फिर नृपेंद्र मिश्रा और चंपत राय जैसे बड़े नाम इस कानूनी फंदे से साफ बच निकलेंगे, इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं।
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