RBI ला रहा है प्लास्टिक नोट: जानिए कागजी करेंसी क्यों बदलेगी?
आरबीआई जल्द कागजी नोटों की जगह पॉलीमर करेंसी लाने की तैयारी में है। नकली नोटों पर लगाम और छपाई का खर्च कम करने के लिए केंद्रीय बैंक उठा रहा है यह कदम।

Polymer Currency Notes: देश की बैंकिंग व्यवस्था और आम नागरिकों की जेब में जल्द ही एक बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जल्द ही पारंपरिक कागज के नोटों को चरणबद्ध तरीके से हटाकर उनकी जगह प्लास्टिक यानी पॉलीमर के नोट चलन में लाने की तैयारी कर रहा है। पिछले कई दशकों से इस तकनीक पर चर्चा चल रही थी, लेकिन अब केंद्रीय बैंक और सरकार इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। 'द फेडरल देश' की एक विशेष चर्चा में बैंकिंग मामलों के जानकार और 'वॉइस ऑफ बैंकिंग' के संस्थापक अश्विनी राणा ने इस फैसले के पीछे की ठोस वजहों और इसके दूरगामी प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला है।
क्यों पड़ी प्लास्टिक नोटों की जरूरत?
वर्तमान में हमारे बटुए में रहने वाले नोट मुख्य रूप से कागज (कॉटन और अन्य फाइबर के मिश्रण) से बने होते हैं। हालांकि, समय के साथ इस व्यवस्था को बनाए रखना रिजर्व बैंक के लिए काफी खर्चीला साबित हो रहा है। अश्विनी राणा के अनुसार, इसके मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं:
भारी-भरकम छपाई खर्च: रिजर्व बैंक को हर साल केवल नए नोटों की छपाई और पुराने या कटे-फटे नोटों को बदलने पर लगभग ₹5,000 से ₹6,000 करोड़ खर्च करने पड़ते हैं।
कम टिकाऊपन: मौजूदा कागजी नोटों की अधिकतम उम्र महज 5 साल होती है, और कई बार खराब रखरखाव के कारण ये एक साल के भीतर ही चलने लायक नहीं रह जाते। इसके विपरीत, प्लास्टिक या पॉलीमर नोट पानी, पसीने और मिट्टी से खराब नहीं होते और इनकी उम्र कागजी नोटों से कई गुना ज्यादा होती है।
नकली नोटों के सिंडिकेट पर लगेगा ताला
विमुद्रीकरण (Demonetisation) के समय यह उम्मीद जताई गई थी कि नकली नोटों का कारोबार पूरी तरह ठप हो जाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। आए दिन देश के अलग-अलग हिस्सों से नकली नोटों की बरामदगी और अवैध फैक्ट्रियों के खुलासे होते रहते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कागजी नोटों की सुरक्षा विशेषताओं की नकल करना जालसाजों के लिए आसान होता जा रहा है। पॉलीमर या प्लास्टिक नोटों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बेहद उन्नत और जटिल सुरक्षा फीचर्स शामिल किए जा सकते हैं, जिनकी हूबहू नकल करना लगभग असंभव होता है। इससे देश की आंतरिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को नकली नोटों के खतरे से बचाया जा सकेगा।
एक तीर से दो निशाने: ₹500 के नोटों पर भी नजर!
इस चर्चा में एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक पहलू सामने आया है। ₹2,000 के नोट को चलन से बाहर करने के बाद भी बैंकिंग सिस्टम के सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ₹500 के नोटों की एक बहुत बड़ी तादाद बाजार में सर्कुलेशन (लेनदेन) में दिखने के बजाय डंप हो चुकी है, यानी लोगों ने इसे जमा करके रख लिया है।
सरकार और आरबीआई इस बदलाव के जरिए एक तीर से दो निशाने साध सकते हैं:
जमाखोरी पर प्रहार: जब कागजी नोटों को बदलकर नए प्लास्टिक नोट जारी किए जाएंगे, तो अलमारियों और बोरों में बंद ₹500 के पुराने नोटों को बाहर निकलना ही पड़ेगा और उन्हें बैंकों में जमा कराना होगा।
पारदर्शी अर्थव्यवस्था: इस पूरी प्रक्रिया से न केवल सिस्टम की सफाई होगी, बल्कि काले धन पर भी एक बार फिर से लगाम कसी जा सकेगी।
छोटे नोटों से होगी शुरुआत?
अश्विनी राणा के अनुसार, दुनिया के कई देशों (जैसे ऑस्ट्रेलिया, यूके और वियतनाम) में पॉलीमर नोटों का सफल प्रयोग चल रहा है। भारत में भी साल 2013 के दौरान ₹10 के छोटे नोटों को ट्रायल के तौर पर बाजार में उतारने का प्रस्ताव आया था। संभावना यही जताई जा रही है कि आरबीआई सीधे बड़े नोटों के बजाय पहले ₹10, ₹20 या ₹100 के छोटे डिनॉमिनेशन से इसकी शुरुआत कर सकता है। हालांकि, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और मिडिल ईस्ट में चल रहे तनावों के चलते सरकार फूंक-फूंक कर कदम रख रही है ताकि आम जनता को किसी तरह की असुविधा न हो.
कागज से प्लास्टिक करेंसी की ओर बढ़ने का यह फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था को आधुनिक, सुरक्षित और कम लागत वाली बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि आरबीआई इन नए चमचमाते और टिकाऊ पॉलीमर नोटों को कब तक हमारे हाथों में सौंपता है।

