क्या बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना सही है?
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क्या बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना सही है?

हालांकि लत, एंग्जायटी और साइबर खतरों को लेकर चिंताएं व्यापक रूप से मानी जाती हैं, लेकिन विशेषज्ञ इस बात पर बंटे हुए हैं कि क्या भारत को बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा देना चाहिए।


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AI With Sanket: दुनियाभर में नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की मांग बहुत तेज हो गई है। बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, लत और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच इस पर बहस छिड़ गई है। द फेडरल पर संकेत उपाध्याय द्वारा होस्ट की गई एक विशेष चर्चा में देश के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख, मीडियानामा के संस्थापक निखिल पाहवा और साइबर कानून विशेषज्ञ खुशबू जैन ने अपने विचार साझा किए। इस चर्चा में विशेषज्ञों ने इस बात पर मंथन किया कि क्या सोशल मीडिया पर पूरी तरह से बैन लगाना ही इसका एकमात्र समाधान है।



सोशल मीडिया से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर
मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख ने कहा कि सोशल मीडिया बच्चों के दिमाग पर बहुत गहरा असर डाल रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि इसके कारण बच्चों में एकाग्रता की कमी और न्यूरोकॉग्निटिव प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। इसके साथ ही बच्चों में खुद को लेकर हीन भावना, साइबरबुलिंग और गलत नजरिया विकसित होने जैसी गंभीर समस्याएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। डॉ. पारिख के अनुसार इस विषय पर अब और अधिक बहस की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

सुरक्षा के लिए उम्र का प्रतिबंध बेहद जरूरी
डॉ. पारिख ने सोशल मीडिया की तुलना गाड़ी चलाने और शराब के सेवन के लिए तय उम्र सीमा से की। उन्होंने तर्क दिया कि जब बच्चे किसी बड़े जोखिम को खुद संभालने के लायक नहीं होते, तो समाज सुरक्षात्मक नियम अपनाता है। आज के बच्चे बिना किसी तैयारी और जरूरी कौशल के इस जटिल डिजिटल दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं। माता-पिता और शिक्षक भी पिछले दो दशकों में आए इस तकनीकी बदलाव के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं।

पूर्ण प्रतिबंध से पैदा हो सकते हैं नए खतरे
मीडियानामा के संपादक निखिल पाहवा ने माना कि सोशल मीडिया से होने वाले नुकसान पूरी तरह से वास्तविक हैं। हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इस समस्या का समाधान हो जाएगा। पाहवा ने कहा कि यदि मुख्यधारा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पूरी तरह बैन लगाया गया, तो बच्चे अनियंत्रित और ज्यादा खतरनाक प्लेटफॉर्म्स की तरफ चले जाएंगे। प्रतिबंध चीजों को सुधारने के बजाय उन्हें और अधिक गंभीर बना देगा।

प्लेटफॉर्म के डिजाइन में सुधार करना बेहतर विकल्प
निखिल पाहवा के अनुसार सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉलिंग और डोपामाइन बढ़ाने वाला कंटेंट बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है। लेकिन यह नुकसान इन प्लेटफॉर्म्स के डिजाइन की वजह से है, जिसे बदला भी जा सकता है। सरकार को कंपनियों पर सुरक्षा तंत्र मजबूत करने और बेहतर पैरेंटल कंट्रोल लागू करने का दबाव बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल अगर जिम्मेदारी से किया जाए, तो वे शिक्षा का बड़ा माध्यम हैं।

भारत में फिलहाल सोशल मीडिया बैन पर कोई कानून नहीं
साइबर कानून विशेषज्ञ खुशबू जैन ने देश की कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि भारत में फिलहाल ऐसा कोई कानून नहीं है जो बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को रोकता हो। हालांकि राजनीतिक और कानूनी स्तर पर इसके खतरों को लेकर लगातार चर्चाएं हो रही हैं। खुशबू जैन ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP एक्ट) का जिक्र किया, जो साल 2027 में लागू होने की उम्मीद है। यह कानून बच्चों के डेटा प्रोसेसिंग पर कड़े नियम तय करेगा।

उम्र के हिसाब से धीरे-धीरे मिले डिजिटल एक्सेस
चर्चा में इस बात पर असहमति दिखी कि बच्चों को सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखा जाए या धीरे-धीरे इसकी अनुमति दी जाए। पाहवा ने तर्क दिया कि बचपन का विकास क्रमिक होता है, इसलिए डिजिटल पहुंच भी वैसी ही होनी चाहिए। 16 साल के किशोर और 8 साल के बच्चे की जरूरतें अलग हैं। उन्होंने सोशल मीडिया की तुलना तंबाकू या शराब से करने को गलत बताया और स्कूलों के पाठ्यक्रम में डिजिटल साक्षरता शामिल करने की वकालत की।

चाइल्ड इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी का छिपा हुआ खतरा
खुशबू जैन ने चर्चा के दौरान 'चाइल्ड इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी' के बढ़ते चलन पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आजकल कई माता-पिता लोकप्रियता और कमाई के चक्कर में बच्चों की तस्वीरें और वीडियो ऑनलाइन पोस्ट कर देते हैं। इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि इंटरनेट पर मौजूद यह डिजिटल फुटप्रिंट हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। यह भविष्य में बच्चों की पढ़ाई और नौकरी के अवसरों को प्रभावित कर सकता है।

वयस्क होने पर डेटा डिलीट करने का मिले अधिकार
खुशबू जैन ने सुझाव दिया कि भारत को एक ऐसा कानूनी तंत्र विकसित करना चाहिए, जिससे कोई भी बच्चा वयस्क होने पर अपने बचपन के इंटरनेट डेटा को हटाने की मांग कर सके। इसे उन्होंने सोशल मीडिया का 'अदृश्य नुकसान' बताया, जिसे माता-पिता और शिक्षक अक्सर पहचान नहीं पाते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार स्कूल खुद चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक (फेशियल रिकग्निशन) का इस्तेमाल कर बच्चों की निजता का उल्लंघन करते हैं।

सिर्फ तकनीकी समाधानों पर निर्भर रहना ठीक नहीं
निखिल पाहवा ने कहा कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स या सरकारों पर नहीं छोड़ी जा सकती। माता-पिता को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उन्होंने आगाह किया कि उम्र के सत्यापन के लिए इस्तेमाल होने वाली फेशियल रिकग्निशन जैसी तकनीकी प्रणालियां भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं और बच्चे आसानी से इनका तोड़ निकाल लेते हैं। इसलिए बैन के बजाय प्राइवेसी और प्लेटफॉर्म डिजाइन को मजबूत करना सही रास्ता है।

(ऊपर दिया गया कंटेंट एक बेहतरीन AI मॉडल का इस्तेमाल करके वीडियो से ट्रांसक्राइब किया गया है। सटीकता, क्वालिटी और एडिटोरियल ईमानदारी बनाए रखने के लिए, हम 'ह्यूमन-इन-द-लूप' (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, लेकिन पब्लिश करने से पहले हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम कंटेंट की सावधानी से समीक्षा, एडिटिंग और उसे बेहतर बनाती है। 'द फेडरल' में, हम भरोसेमंद और जानकारीपूर्ण पत्रकारिता देने के लिए AI की क्षमता और इंसानी एडिटर्स की विशेषज्ञता को मिलाते हैं।)


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