
राम मंदिर घोटाला! सच सामने लाएगी SIT या सिर्फ होगी लीपापोती?
अयोध्या राम मंदिर के दानपात्रों से ₹200 करोड़ से अधिक की कथित हेराफेरी के मामले में केंद्र और यूपी सरकार ने तेज की जांच, एसआईटी खंगाल रही कर्मचारियों के रिकॉर्ड।

Nishpaksh With Neelu: अयोध्या के भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा आस्थापूर्वक अर्पित किए गए दान और चढ़ावे में कथित तौर पर एक बहुत बड़े वित्तीय घोटाले का मामला सामने आया है. शुरुआती अनुमानों और जांच के आधार पर इस घोटाले की रकम ₹200 करोड़ से अधिक होने की आशंका जताई जा रही है, जिसने पूरे देश और विशेषकर रामभक्तों को उद्वेलित कर दिया है. इस बेहद गंभीर विषय पर द फ़ेडरल देश के शो निष्पक्ष में चर्चा की गयी. शो की एंकर नीलू व्यास ने शो में शामिल अतिथि कांग्रेस प्रवक्ता संजीव सिंह, वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन और अयोध्या की स्थैन्य पत्रकार सुमन गुप्ता से तमाम पहलुओं पर चर्चा की.
मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार दोनों ही स्तरों पर जांच की रफ्तार तेज़ कर दी गई है. उत्तर प्रदेश शासन द्वारा इस पूरे प्रकरण की सघन जांच के लिए एक 'विशेष जांच दल' (SIT) का गठन किया गया है. इसके साथ ही, दिल्ली से एक वरिष्ठ आईपीएस (IPS) अधिकारी को विशेष रूप से इस घटनाक्रम की निगरानी और जांच के समन्वय के लिए अयोध्या भेजा गया है. जांच के दौरान अब तक कई कर्मचारियों से जुड़ी करोड़ों रुपये की नकदी, महंगी गाड़ियाँ और अन्य बेनामी संपत्तियों का पता चला है, जिन्हें जब्त किया जा रहा है.
अत्यंत गोपनीय कक्ष से जुड़ा है सुरक्षा का चक्र
पटल पर आई जानकारियों के अनुसार, रामलला के गर्भगृह और दर्शन पथ के पास रखे गए दानपात्रों से नकदी निकालने और उसकी गिनती करने की एक बेहद सख्त प्रक्रिया है. इन पात्रों से नकदी निकालकर मंदिर परिसर में ही बने एक अत्यंत गोपनीय कक्ष (Secret Room) में पहुँचाई जाती है, जहाँ सुरक्षा कारणों से बाहरी लोगों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है और इस कमरे की सटीक स्थिति को भी सार्वजनिक नहीं किया जाता. इस कक्ष में कुल 50 चुनिंदा कर्मचारी चौबीसों घंटे चढ़ावे की गिनती और उसकी कड़ी निगरानी का कार्य करते हैं. ऐसे में यह साफ़ है कि यदि इतनी बड़ी हेराफेरी हुई है, तो इसमें मंदिर प्रबंधन और अंदरूनी स्तर के लोगों की मिलीभगत के बिना यह संभव नहीं था.
चंपत राय और ट्रस्ट पर गंभीर आरोप, विपक्ष हमलावर
कांग्रेस प्रवक्ता संजीव सिंह ने इस एसआईटी जांच को पूरी तरह से 'लीपापोती' करार दिया है. उन्होंने आरोप लगाया कि यह वित्तीय गड़बड़ी साल 2021 से ही संज्ञान में थी, जब मंदिर के तत्कालीन लेखाकार (अकाउंटेंट) ने इस पर सवाल उठाए थे और उन्हें उनके पद से हटा दिया गया था. सिंह ने सीधा हमला बोलते हुए कहा:
"चंपत राय के जो पूर्व ड्राइवर और सहयोगी हुआ करते थे, वे आज मंदिर के सलाहकार बन बैठे हैं. यहाँ तक कि भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने भी यह स्वीकार किया है कि इसमें बहुत बड़े-बड़े लोग शामिल हैं और यदि वे नाम लेंगे तो खुद फँस जाएँगे."
कांग्रेस प्रवक्ता ने इस बात पर भी गंभीर सवाल उठाए कि जब पैसा पुलिस ने बरामद किया, तो इसे नियमित पुलिस केस बनाने के बजाय एसआईटी को क्यों सौंपा गया? उन्होंने एसआईटी के नेतृत्व कर रहे अधिकारी की भूमिका पर भी संदेह जताया और कहा कि प्रयागराज कुंभ मेले की भगदड़ के समय भी इन्हीं अधिकारियों ने सच्चाई को दबाने का काम किया था. विपक्ष ने इस पूरे मामले की सीएजी (CAG) द्वारा फॉरेंसिक ऑडिट कराने अथवा सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों की निगरानी में निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है.
1989 के शिला पूजन से जुड़ा है आस्था का उद्वेलन
अयोध्या की स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता ने बताया कि यह केवल तात्कालिक चढ़ावे की चोरी नहीं है. साल 1989 में हुए ऐतिहासिक शिला पूजन के समय से ही देश और विदेश से श्रद्धालुओं ने अपनी अगाध श्रद्धा के चलते ना जाने कितनी सोने-चांदी की ईंटें, हीरे और जवाहरात दान किए हैं. मंदिर ट्रस्ट के पास इसका कोई पारदर्शी और सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है. गुप्ता ने कहा कि श्रद्धालुओं के मन में अब यह गहरा संदेह पैदा हो रहा है कि जो सोना-चांदी उन्होंने भगवान के चरणों में अर्पित किया था, वह कहीं बाद में पीतल या गिलट ना साबित हो. इस पूरे प्रकरण से रामभक्तों की भावनाओं और आस्था के साथ एक भद्दा खिलवाड़ हुआ है.
चुनावी वर्ष और सरकार की साख
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार सुनीता एरॉन के अनुसार, उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव (2027) को देखते हुए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील बन चुका है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा जुड़ी है. एरॉन का मानना है कि मुख्यमंत्री इस मामले में कोई राजनीतिक रिस्क नहीं लेंगे और चुनाव से ठीक पहले एसआईटी की एक विस्तृत रिपोर्ट लाकर त्वरित और कड़ी दंडात्मक कार्रवाई दिखाई जाएगी, ताकि इस विवाद को समय रहते शांत किया जा सके और विपक्षी नैरेटिव को बेअसर किया जा सके.
फिलहाल, अयोध्या की ज़मीन और देश के राजनीतिक गलियारों में इस ₹200 करोड़ के चढ़ावे घोटाले को लेकर आक्रोश और उद्वेलन का माहौल बना हुआ है. जनता अब यह देखना चाहती है कि एसआईटी की यह जांच किसी तार्किक अंजाम तक पहुँचती है या महज़ एक चुनावी लीपापोती बनकर रह जाती है.

