उज्जैन जमीन विवाद में घिरे सीएम मोहन यादव, कांग्रेस का मोदी पर हमला
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उज्जैन जमीन विवाद में घिरे सीएम मोहन यादव, कांग्रेस का मोदी पर हमला

द फेडरल देश के खास शो 'सियासत' पर एंकर मनीष कुमार ने बताया कि सिंहस्थ कुंभ 2028 से पहले मोहन यादव परिवार की 45 करोड़ की लैंड डील पर क्यों मचा है सियासी बवाल।


Siyasat: अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़े चंदे के आरोपों की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि भारतीय जनता पार्टी के हिंदुत्व के एजेंडे की पहली प्रयोगशाला माने जाने वाले मध्य प्रदेश में एक नया सियासी तूफान खड़ा हो गया है। सूबे के सबसे पवित्र शहरों में से एक उज्जैन में सत्ता और जमीन की भारी-भरकम खरीद-फरोख्त के गठजोड़ ने बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया है। यह गंभीर आरोप किसी और पर नहीं, बल्कि सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनके परिवार पर लगे हैं। डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म 'द फेडरल देश' के विशेष कार्यक्रम 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के हवाले से इस पूरे लैंड डील विवाद का बेहद सटीक, निष्पक्ष और विस्तृत विश्लेषण किया है। शो में दिखाया गया है कि कैसे इस जमीन खरीद ने मध्य प्रदेश से लेकर दिल्ली तक का राजनीतिक पारा बढ़ा दिया है और विपक्ष इसे लेकर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख पर सवाल उठा रहा है।



क्या है पूरा उज्जैन जमीन विवाद?
उज्जैन में अप्रैल-मई 2028 में होने वाले पवित्र 'सिंहस्थ कुंभ मेले' को लेकर बड़े पैमाने पर सरकारी विकास कार्य चल रहे हैं। शिप्रा नदी के तट पर होने वाले इस आयोजन के लिए नई सड़कें, हाईवे कॉरिडोर और लैंड यूज़ (भूमि उपयोग) में बदलाव किए जा रहे हैं। इस इंफ्रास्ट्रक्चर बूम की वजह से उज्जैन देश के सबसे तेजी से बढ़ते प्रॉपर्टी बाजारों में शुमार हो चुका है।

विवाद की जड़ इसी विकास कार्य की टाइमलाइन और जमीन खरीद से जुड़ी है:

दिसंबर 2023 के बाद ताबड़तोड़ खरीदारी: 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट और विपक्षी आरोपों के मुताबिक, दिसंबर 2023 में मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके परिवार, भाई-बहन, चचेरे भाइयों और उनसे जुड़ी कंपनियों ने उज्जैन व उसके आसपास लगभग 137 प्लॉट और करीब 168 एकड़ जमीनें खरीदीं।

करोड़ों का निवेश: शुरुआती रिपोर्टों में इस भारी-भरकम लैंड डील की कुल कीमत करीब 45 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

रणनीतिक स्थान (Strategic Location):
सबसे बड़ा आरोप यह है कि ये तमाम जमीनें ठीक उन्हीं इलाकों में खरीदी गईं, जहां सरकार भविष्य में सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर, कॉरिडोर और मास्टर प्लान से जुड़े विकास कार्यों को चिन्हित कर रही थी।

कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट (हितों का टकराव) और नैतिकता का सवाल
एंकर मनीष कुमार ने शो में बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा कि कानूनी पहलू से पहले यह मामला घोर नैतिक सवाल और 'कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' (हितों का टकराव) से जुड़ा है। जब किसी मुख्यमंत्री या उनके करीबियों को यह पहले से पता हो कि सरकार अगले कुछ महीनों में किस इलाके का लैंड यूज़ बदलने वाली है या कहां कॉरिडोर बनाने वाली है - जिसकी जानकारी आम जनता को नहीं होती और उसी आधार पर जमीनें खरीदी जाएं, तो सब कुछ कागजों पर कानूनी होने के बावजूद पारदर्शिता पर सवाल उठना लाज़मी है।

इस विवाद को लेकर कांग्रेस ने बीजेपी और मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने 5 कड़े सवाल दागे हैं:

क्या मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके परिवार ने पब्लिक डोमेन के तहत ये जमीनें खरीदीं या नहीं? इसका स्पष्ट उत्तर दें।

क्या यह सच है कि इस खरीदी गई जमीन का एक बड़ा हिस्सा उन्हीं क्षेत्रों में है जहां बाद में सरकारी कॉरिडोर और विकास योजनाएं चिन्हित की गईं?

क्या सरकार इन तमाम विकास परियोजनाओं की टाइमलाइन को सार्वजनिक करेगी?

यदि सब कुछ पूरी तरह पारदर्शी है, तो क्या बीजेपी और पीएम मोदी इसकी स्वतंत्र न्यायिक जांच (ED या CBI से) कराने का साहस दिखाएंगे?

क्या मुख्यमंत्री ईमानदारी का परिचय देते हुए 2023 के बाद अपने परिवार द्वारा खरीदी गई सभी भूमियों को लेकर एक 'श्वेत पत्र' (White Paper) जारी कर सकते हैं?

कांग्रेस इस मामले को सीधे जनता की आस्था पर चोट बता रही है। विपक्ष का कहना है कि अयोध्या हो या उज्जैन, देश के बुजुर्ग और आम लोग पेट काटकर तीर्थस्थलों के दान पात्रों में पैसा डालते हैं। ऐसे धार्मिक शहरों में सत्ता के रसूखदार लोगों द्वारा जमीन की ऐसी मलाई काटना लोगों की आस्था की पीठ में खंजर घोंपने जैसा है। कांग्रेस इसे राष्ट्रीय नहीं, बल्कि 'अंतरराष्ट्रीय घोटाला' करार दे रही है।

बीजेपी का पलटवार: 'रियल एस्टेट का पुराना पारिवारिक कारोबार'
दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी अपने मुख्यमंत्री के बचाव में पूरी ताकत से उतर आई है। बीजेपी ने कांग्रेस के इन आरोपों को पूरी तरह से बेबुनियाद और एक राजनीतिक साजिश करार दिया है। बीजेपी प्रवक्ताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव का परिवार मुख्यमंत्री बनने से सालों पहले से ही रियल एस्टेट और प्रॉपर्टी के कारोबार से जुड़ा रहा है। ऐसे में एक कारोबारी परिवार द्वारा जमीन खरीदना कोई अपराध नहीं है।

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही अभी तक किसी अदालत, ईडी या लोकायुक्त ने मोहन यादव को दोषी नहीं ठहराया है और इसे 'घोटाला' कहना तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी, लेकिन राजनीति में कानूनी दोष से पहले 'परसेप्शन' (जनता की धारणा) और नैतिकता की परीक्षा होती है।

पीएम मोदी के 'ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा' के नारे पर प्रहार
इस पूरे विवाद के बहाने विपक्ष ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों लिया है। शो में पीएम मोदी के उस प्रसिद्ध पुराने चुनावी बयान को याद दिलाया गया जिसमें उन्होंने देश से वादा किया था "भाइयों और बहनों, मैंने बीड़ा उठाया है और मेरा तो मंत्र है, ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा।"

अब कांग्रेस और पूरा विपक्ष प्रधानमंत्री से सवाल पूछ रहा है कि देश के सामने सार्वजनिक तौर पर ऐसा ऐलान करने वाले पीएम का क्या यह नैतिक दायित्व नहीं बनता कि वे अपने ही मुख्यमंत्री के परिवार पर लगे इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच करवाएं? सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या सरकार जनता के विकास के लिए नीतियां बना रही है या सत्ता के शीर्ष पर बैठे रसूखदारों की निजी संपत्ति को बढ़ाने का माध्यम बन रही है।


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