
यूपी 2027: ओवैसी के गठबंधन प्रस्ताव में सपा-कांग्रेस के लिए 'खतरे का जाल'
यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का सपा-कांग्रेस को गठबंधन का दांव, क्या ओवैसी का प्रस्ताव विपक्ष के लिए बनेगा सियासी जाल? मुस्लिम वोट बैंक की लड़ाई हुई तेज।
Uttar Pradesh Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने गठबंधन का प्रस्ताव देकर चुनावी बिसात बिछा दी है। ओवैसी का कहना है कि बीजेपी को रोकने के लिए विपक्ष को साथ आना चाहिए, लेकिन उन्होंने "सम्मान और बराबरी" की शर्त जोड़कर सपा और कांग्रेस के लिए एक कूटनीतिक जाल बुन दिया है। राजनीति के गलियारों में "बराबरी" का अर्थ सीटों के बंटवारे से है, जो गठबंधन की मेज पर पहुंचते ही लोकतंत्र को 'कैलकुलेटर की राजनीति' में बदल देता है। द फ़ेडरल देश के कार्यक्रम सियासत में आज इसी पर विस्तार से विश्लेषण किया गया है।
चुनावी ताकत या 'वोट कटर' की पहचान?
ओवैसी का प्रस्ताव: मुस्लिम नेतृत्व और प्रतिनिधित्व की नई जंग
राजनीतिक आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि 2022 में 0.49% वोट पाने वाली एआईएमआईएम गठबंधन की मेज पर आखिर क्या लेकर आएगी? लेकिन ओवैसी की असली ताकत सीटों से नहीं, बल्कि उनकी उस क्षमता से आंकी जाती है जिससे वे स्थापित दलों की नींद उड़ा देते हैं। बिहार के सीमांचल (2020 और 2025 चुनाव) और महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में पांच सीटें जीतकर उन्होंने साबित किया है कि वे मुस्लिम युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने में सक्षम हैं, जो अब नेतृत्व की तलाश में है।
सपा-कांग्रेस के सामने दोधारी तलवार
गठबंधन स्वीकारना या ठुकराना, दोनों में सियासी नुकसान
ओवैसी का यह प्रस्ताव समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के लिए एक दोधारी तलवार है:
प्रस्ताव ठुकराना: ओवैसी को एक 'तैयार नैरेटिव' मिल जाएगा—"हमने साथ आने की कोशिश की, लेकिन हमें बाहर रखा गया।" राजनीति में यह एक वाक्य, कई भाषणों पर भारी पड़ता है।
प्रस्ताव स्वीकारना: गठबंधन होने पर सीटों का बंटवारा और क्षेत्रों का चयन एक कठिन चुनौती होगा। सबसे बड़ा डर यह है कि एक बार ओवैसी के साथ गठबंधन हुआ, तो सपा-कांग्रेस का पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक हमेशा के लिए छिटक सकता है।
सामाजिक समीकरणों का गणित
सपा का 'मुस्लिम-पिछड़ा' और कांग्रेस की वापसी की कोशिश
समाजवादी पार्टी लंबे समय से मुस्लिम-पिछड़ा (M-Y) समीकरण के सहारे राजनीति करती रही है, जबकि कांग्रेस अपने खोए हुए आधार को पुनर्जीवित करने में जुटी है। ओवैसी पर अक्सर 'वोट कटवा' होने के आरोप लगते रहे हैं, जिसे वे सिरे से खारिज करते हैं। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में हर दल को चुनाव लड़ने और प्रतिनिधित्व की राजनीति करने का पूरा अधिकार है। फिलहाल, ओवैसी के इस प्रस्ताव ने विपक्ष के भीतर जगह तय करने की एक ऐसी लड़ाई शुरू कर दी है, जिसका असर 2027 के चुनावी परिणामों पर गहरा पड़ना तय है।
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