
यूपी में कांग्रेस का 'दलित कार्ड' और प्रभारी बदलने के सियासी मायने
यूपी कांग्रेस में बड़ा फेरबदल: 'आप' से आए राजेंद्र पाल गौतम बने नए प्रभारी; अखिलेश यादव के PDA के सामने कांग्रेस ने चला बड़ा 'दलित कार्ड'।
Janpath: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही सभी राजनीतिक दलों ने गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। इसी कड़ी में कांग्रेस आलाकमान ने एक बड़ा संगठनात्मक फेरबदल करते हुए अविनाश पांडे की जगह राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का नया प्रभारी नियुक्त किया है। 'द फेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'जनपथ' में एंकर ललित राय के साथ वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक नितिन श्रीवास्तव ने इस फैसले के पीछे छिपे कांग्रेस के 'दलित कार्ड' और इसके जमीनी असर का बेहद बारीकी से विश्लेषण किया।
पेश है इस खास चर्चा के ख़ास अंश :
1. पहला मिशन फेल: मायावती से मुलाकात की अधूरी कोशिश
वरिष्ठ विश्लेषक नितिन श्रीवास्तव ने चर्चा की शुरुआत में ही एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी घोषित किए जाने से ठीक पहले ही उत्तर प्रदेश (लखनऊ) भेजा गया था।
"राजेंद्र पाल गौतम लखनऊ के बेहद नजदीकी जिले बाराबंकी से सांसद और पूर्व आईएएस अधिकारी के बेटे तनुज पुनिया के साथ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती से मिलने उनके आवास पहुंचे थे। यह एक अनौपचारिक मुलाकात की कोशिश थी, लेकिन वहां सुरक्षाकर्मियों ने यह कहकर उन्हें गेट से ही वापस कर दिया कि मायावती अभी किसी से नहीं मिलना चाहतीं।" - नितिन श्रीवास्तव, राजनीतिक विश्लेषक
इस घटना से साफ है कि कांग्रेस का पहला मिशन जमीन पर फेल रहा। हालांकि, इससे कांग्रेस की भावी रणनीति का पता जरूर चलता है कि उसकी पूरी नजर उत्तर प्रदेश के दलित वोट बैंक और मायावती की सियासी जमीन पर टिकी हुई है।
2. दिल्ली से अखिलेश यादव पर 'प्रेशर पॉलिटिक्स'
राजेंद्र पाल गौतम ने प्रभारी बनने के तुरंत बाद दिल्ली से ही उत्तर प्रदेश की सियासत को लेकर बड़े बयान देने शुरू कर दिए हैं। उन्होंने सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का नाम लिए बिना प्रेशर बनाने की रणनीति अपनाई और कहा कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ने में पूरी तरह सक्षम है।
गठबंधन और सीटों की बारगेनिंग का खेल
राजनीतिक पंडितों के अनुसार, राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच व्यक्तिगत दोस्ती और केमिस्ट्री (जैसे 2017 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में दिखी) अपनी जगह ठीक है, लेकिन चुनावी जमीन पर असली खेल सीटों के गुणा-भाग का होता है।
कांग्रेस के भीतर दबी जुबान में 60-40 के रेशियो (सीट शेयरिंग) की चर्चा चल रही है।
हालांकि, विश्लेषक मानते हैं कि समाजवादी पार्टी मौजूदा समय में लोकसभा की तीसरी सबसे बड़ी ताकत और यूपी की मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते कांग्रेस को 10 से 20 प्रतिशत से ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं है।
ऐसे में राजेंद्र पाल गौतम की नियुक्ति केवल एक 'प्रेशर टैक्टिक्स' है, ताकि आगामी गठबंधन में सपा से ज्यादा से ज्यादा सीटें झटकी जा सकें।
3. 'आयातित नेताओं' पर भरोसा और विचारधारा का संकट
कांग्रेस की इस रणनीति पर विश्लेषक ने एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा किया है। राजेंद्र पाल गौतम मूल रूप से आम आदमी पार्टी (AAP) के कद्दावर नेता रहे हैं और अरविंद केजरीवाल की कैबिनेट में 2024 तक मंत्री भी रहे।
"जो व्यक्ति दिल्ली में कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार की नीतियों को पानी पी-पीकर कोसता था और उसी के खिलाफ चुनाव जीतकर मंत्री बना, वो आज उत्तर प्रदेश की जनता को कांग्रेस की नीतियां समझाएगा। यह विरोधाभास जनता के गले कैसे उतरेगा?" - नितिन श्रीवास्तव
इसके अलावा, कांग्रेस के पास अपने बड़े नेताओं को रोकने की कोई ठोस गारंटी नहीं है। अतीत में जितिन प्रसाद ने तीन साल तक यूपी के गांव-गांव जाकर ब्राह्मणों को जोड़ा, लेकिन बीजेपी उन्हें तोड़कर केंद्र में मंत्री बना ले गई। आरपीएन सिंह से लेकर राहुल गांधी की कोर टीम के कई 'नवरत्न' आज बीजेपी का हिस्सा हैं। ऐसे में 2024 में कांग्रेस में शामिल हुए राजेंद्र पाल गौतम यूपी की जटिल जातिगत पृष्ठभूमि को कितना समझ पाएंगे और कब तक टिकेंगे, यह बड़ा सवाल है।
4. 1989 के बाद से यूपी में कांग्रेस का 'जीरो' होना और गुटबाजी
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस तीन दशकों (1989 के बाद) से सत्ता से बाहर है और लगभग हाशिए पर आ चुकी है।
भीतर की सिर-फुटौवल: यूपी कांग्रेस कार्यालय में आज भी इतने धड़े और गुट सक्रिय हैं कि यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा नेता किसको रिपोर्ट कर रहा है।
बीजेपी बनाम कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा: बीजेपी में शीर्ष नेतृत्व द्वारा कही गई बात पार्टी लाइन बनकर नीचे तक जाती है, जबकि कांग्रेस में हर क्षेत्रीय और जातीय स्तर पर अलग ही विचारधारा चल रही होती है।
बड़े चेहरों की तलाश
अजय राय (जो खुद बीजेपी पृष्ठभूमि से आए हैं) को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। अब कांग्रेस अंदरूनी तौर पर एक बड़े मुस्लिम चेहरे, ब्राह्मण चेहरे या फिर किसी बड़े पिछड़े वर्ग (OBC) के नेता की तलाश में है, ताकि प्रभारी और अध्यक्ष के जरिए दलित-पिछड़ा कॉम्बिनेशन बनाकर 2027 के दंगल में उतरा जा सके।
5. मायावती से गठबंधन की कितनी संभावना?
क्या एक दलित प्रभारी (राजेंद्र पाल गौतम) के जरिए कांग्रेस, मायावती के साथ 2027 के लिए कोई छुपा हुआ रास्ता तलाश रही है? इस पर विश्लेषक ने साफ कहा कि राजनीति में संभावनाएं हमेशा खुली रहती हैं, लेकिन मायावती कभी भी किसी अन्य दलित नेता या कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगी। बसपा आज भले ही हाशिए पर हो (लोकसभा-राज्यसभा में शून्य और विधानसभा में महज 1 सीट), लेकिन वह अपनी बची-कुची दलित राजनीतिक जमीन को कांग्रेस के हाथों में सौंपने का आत्मघाती कदम कभी नहीं उठाएगी।
केवल कागजों पर कवायद या जमीनी बदलाव?
चर्चा का कटु सत्य यही है कि उत्तर प्रदेश में बिना किसी मजबूत क्षेत्रीय दल (सपा या बसपा) के सहारे के कांग्रेस का अपने दम पर पुनर्जीवित (Revive) होना नामुमकिन है। चुनाव से ठीक कुछ महीने पहले प्रभारी बदल देना केवल कागजी तौर पर खुद को मजबूत दिखाने की एक कोशिश है। जब तक राहुल गांधी या प्रियंका गांधी स्वयं उत्तर प्रदेश की जमीन पर 'भारत जोड़ो यात्रा' जैसे बड़े और सघन कार्यक्रम नहीं करेंगे, तब तक केवल प्रभारियों के बदलने से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की किस्मत बदलने वाली नहीं है।
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