यूपी में कुछ अफसरों के पास सारी ताकत, बाकी सिर्फ नाम के IPS? देखें Video
यूपी पुलिस में कुछ अफसरों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा और ताकत केंद्रित होने से सिस्टम पर सवाल उठ रहे हैं, जबकि कई सीनियर IPS अधिकारी बिना अहम जिम्मेदारी के हैं।

क्या यूपी पुलिस सुपर IPS क्लब बन चुकी है? रेणुका मिश्रा जैसी सीनियर अफसर दो साल से बिना काम के? सात साल का सस्पेंशन कार्रवाई या प्रशासनिक प्रताड़ना?क्या पोस्टिंग अब योग्यता नहीं, राजनीतिक भरोसे से तय होती है?क्या कुछ अफसरों पर पूरा सिस्टम टिकाना भविष्य का खतरा है? उत्तर प्रदेश पुलिस, देश की सबसे बड़ी पुलिस फोर्स में से एक लेकिन अब यह फोर्स वन मैन शो बनती हुई नजर आ रही है। क्या यूपी पुलिस में जिम्मेदारियां अब योग्यता से नहीं भरोसे से तय होती हैं? क्या कुछ अफसरों को इतना ताकतवर बना दिया गया है कि पूरा सिस्टम उन्हीं के कंधों पर टिक गया है जबकि कुछ सीनियर अफसर सिर्फ फाइलों में जिंदा हैं? एक तरफ कुछ पुलिस अधिकारियों के पास काम ही काम है और दूसरी तरफ ऐसे आईपीएस हैं। जिनके पास सिर्फ कुर्सी है लेकिन जिम्मेदारी नहीं।
एक तरफ कार्यवाहक डीजीपी राजीव कृष्ण जिनके पास विजिलेंस का भी काम है। यानी सिस्टम का सिर भी वही और निगरानी की आंख भी वही! डीजी आलोक सिंह जिनके पास पीएससी और एसएसएफ की जिम्मेदी है। इसके अलावा एक और बड़ा एडीजी अमिताभ यश जिनके पास एसटीएफ और कानून व्यवस्था का भार है। यानी कि गैंगस्टर भी वही पकड़ेंगे, दंगा भी वही संभालेंगे वीआईपी ड्यूटी भी वही देखेंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बाकी आईपीएस अधिकारी छुट्टी पर हैं या सरकार को कुछ ही चेहरों पर भरोसा है। अब यदि भरोसा ही पैमाना है तो फिर सीनियरिटी का मतलब क्या? इस तरह के सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं। 1990 बैच की आईपीएस रेणुका मिश्रा। यूपी पुलिस की सबसे सीनियर महिला आईपीएस अफसर। लेकिन तस्वीर देखिए पिछले दो साल से वो बिना जिम्मेदारी काम कर रही हैं। पुलिस भर्ती का पेपर लीक हुआ और उन्हें भर्ती बोर्ड से हटा दिया गया। कार्रवाई हुई लेकिन उसके बाद ना नई पोस्टिंग और ना ही जिम्मेदारी। डीजीपी ऑफिस में अटैच कर दी गईं। खास बात यह है कि जिस अधिकारी के वो अधीन हैं वो उनका जूनियर है। किसी अफसर को लंबे समय तक बिना काम रखना सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं होता ये एक संदेश भी होता है।संदेश किसके लिए? बाकी अफसरों के लिए कि सिस्टम में काम से ज्यादा जरूरी है सिस्टम के साथ होना। सिस्टम के साथ नजर आना।
यूपी पुलिस में कुछ पोस्टिंग्स सिर्फ पार्किंग ज़ोन की तरह है जैसे एडीजी रूल्स एंड मैन्युअल। सुनने में लगता है बड़ा गंभीर विभाग होगा लेकिन पुलिस मुख्यालय के गलियारों में इसे नाम दिया गया है शंटिंग पोस्ट और यहीं तैनात हैं एंटनी देव कुमार। एक ऐसा अधिकारी जिसे यूएन मिशन तक में सम्मान मिला, कोसोवो में सेवा दी। अंतरराष्ट्रीय अनुभव वाला अफसर और जिम्मेदारी लगभग शून्य। यानी कि यूपी में ऐसी पोस्ट जहां काम ना के बराबर। क्या सस्पेंशन अब सजा नहीं अनिश्चितकाल तक निर्वासन बन चुका है? अब 1992 बैच के आईपीएस जसवीर सिंह को देखिए। सात साल से सस्पेंड। 2019 में सस्पेंड हुए जांच हुई लेकिन नतीजा कुछ नहीं? सवाल ये है अगर दोषी हैं तो फैसला क्यों नहीं? और अगर दोषी नहीं हैं तो बहाली क्यों नहीं?
क्या यूपी पुलिस अब पसंदीदा अफसर मॉडल पर चल रही है? अब ज़रा पैटर्न देखिए। राजीव कृष्ण, जहां मुख्यमंत्री वहीं राजीव कृष्ण। डेप्युटेशन से लौटे के बाद पहले अकादमी की जिम्मेदारी मिली उसके बाद लखनऊ, आगरा, विजिलेंस और कार्यवाहक डीजीपी बनाए गए। यानी लगातार प्रमोशन और लगातार भरोसा। आलोक सिंह, आईजी से सीधे सत्ता के भरोसे के केंद्र में। मेरठ कमिश्नरेट, नोएडा, कानपुर और अब पीएसी की जिम्मेदारी। अमिताभ यश 2017 से अब तक एसटीएफ के मुखिया। इतना लंबा कार्यकाल कि रिकॉर्ड बन गया। अब कानून व्यवस्था भी उन्हीं के पास। मतलब अपराधी भी वही संभालेंगे और पूरा प्रदेश भी वही संभालेंगे।
एक तरफ कुछ अफसरों के पास इतनी जिम्मेदारियां हैं कि मानो पूरा यूपी वही चला रहे हों दूसरी तरफ कुछ अफसर ऐसे हैं, जिनके पास सरकारी गाड़ी है ऑफिस है, स्टाफ है लेकिन काम नहीं। नवनीत सिकेरा वाला मामला भी समझिए। एडीजी रैंक का अफसर लेकिन पोस्टिंग पुलिस ट्रेनिंग स्कूल, उन्नाव। मजेदार बात यह कि दूसरे पुलिस ट्रेनिंग स्कूलों में उनसे दो और तीन रैंक नीचे के अफसर काम कर रहे हैं। क्या पोस्टिंग अब पद के हिसाब से नहीं मैसेज के हिसाब से होती है? एक बड़े राजनीतिक एंगल को भी समझना जरूरी है। योगी सरकार की कार्यशैली हमेशा से विश्वास आधारित प्रशासन पर रही है। यानी जो अफसर रिजल्ट देंगे, जो राजनीतिक और प्रशासनिक लाइन समझेंगे उन्हें ज्यादा जिम्मेदारी मिलेगी। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब वही कुछ चेहरे पूरी व्यवस्था पर हावी होने लगते हैं। क्योंकि तब सिस्टम संस्थागत नहीं व्यक्तिगत हो जाता है।
यूपी पुलिस में आज दो तरह के अफसर दिखते हैं पहले वो जो इतने शक्तिशाली हैं कि हर दूसरी फाइल उन्हीं तक जाती है। और दूसरे वो जिन्हें देखकर लगता है कि सिस्टम कह रहा हो आप बस मौजूद रहिए काम कोई और कर लेगा। यूपी पुलिस की ये कहानी सिर्फ पोस्टिंग की कहानी नहीं है। ये उस सिस्टम की कहानी है जहां भरोसा योग्यता से बड़ा हो चुका है। जहां कुछ अफसर पावर सेंटर बन चुके हैं और कुछ वेटिंग रूम में बैठे हैं। जहां जिम्मेदारियां बराबर नहीं बंट रहीं
बल्कि चुनिंदा चेहरों में केंद्रित हो रही हैं और लोकतांत्रिक प्रशासन के लिए सबसे बड़ा खतरा यही होता है जब सिस्टम व्यक्ति आधारित हो जाए। यूपी पुलिस में आज सवाल अपराध से बड़ा है सवाल ये है कि क्या पूरी फोर्स कुछ अफसरों के भरोसे चल सकती है?

