AI कोल्ड वॉर: ट्रम्प के प्रतिबंध और भारत के पिछड़ने की पूरी इनसाइड स्टोरी
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AI कोल्ड वॉर: ट्रम्प के प्रतिबंध और भारत के पिछड़ने की पूरी इनसाइड स्टोरी

श्रीनि से संवाद: अमेरिका-चीन में छिड़ा AI कोल्ड वॉर। डोनाल्ड ट्रम्प ने एंथ्रोपिक के फेबल और माइथोस मॉडल पर लगाया बैन। जानें भारत क्यों बन रहा केवल डेटा कंज्यूमर।


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Shrini se Samwad: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर इस वक्त पूरी दुनिया में एक महा-संग्राम छिड़ा हुआ है। ओरेकल (Oracle) जैसी दिग्गज टेक कंपनियों द्वारा कर्मचारियों की छंटनी कर उनकी जगह AI को तैनात करने से लेकर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा एंथ्रोपिक (Anthropic) के एडवांस मॉडल्स को दुनिया में बेचने पर लगाई गई रोक तक—यह साफ हो चुका है कि AI अब सिर्फ कोई तकनीकी खिलौना नहीं, बल्कि वैश्विक वर्चस्व का सबसे बड़ा कूटनीतिक हथियार बन चुका है।


डिजिटल क्रांति के इस दौर में द फेडरल के खास कार्यक्रम 'श्रीनि से संवाद' में एंकर मनीष ने एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन से विस्तार से चर्चा की कि किस तरह दुनिया इस रेस में आगे निकल रही है और भारत इनोवेशन के मामले में कहाँ पिछड़ता नजर आ रहा है।


डीपसीक का तहलका और चीन का बढ़ता दबदबा: अमेरिका को $1 ट्रिलियन का झटका
चर्चा की शुरुआत करते हुए एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन ने साल 2024 की शुरुआत में चीनी कंपनी डीपसीक (DeepSeek) द्वारा मचाए गए तहलके का जिक्र किया। डीपसीक ने बेहद कम लागत में एक बेहतरीन 'फाउंडेशन मॉडल' तैयार कर अमेरिकी तकनीकी दिग्गजों के एकाधिकार को चुनौती दी थी। इसके कारण अमेरिकी शेयर बाजार (Nasdaq) और दुनिया की सबसे बड़ी चिप मैन्युफैक्चरिंग कंपनी एनवीडिया (Nvidia) को एक झटके में एक ट्रिलियन डॉलर का भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

चीन इस मोर्चे पर लगातार अपनी बढ़त बनाए हुए है:

Zhipu AI का GLM 5.2: अभी ठीक 10 दिन पहले (13 जून 2026 को) चीनी कंपनी 'Zhipu AI' ने अपना नया फाउंडेशन मॉडल GLM 5.2 लॉन्च किया है। चीन का दावा है कि यह फ्रंटियर टेक्नोलॉजी अमेरिकी मॉडल्स के बेहद करीब पहुंच चुकी है और वे इसे बेहद कम कीमतों पर दुनिया के लिए रिलीज कर सकते हैं।

समकालीन थे, पर अब फासला बढ़ा: 1980 के दशक में भारत और चीन दोनों की आर्थिक स्थिति लगभग एक जैसी थी, लेकिन आज तकनीक के मामले में चीन भारत से कोसों आगे निकल चुका है।

ट्रम्प का नया आर्डर: 'फेबल' और 'माइथोस' पर क्यों लगा ताला?
इस 'टेक्नोलॉजिकल कोल्ड वॉर' में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब अमेरिकी सरकार ने 12 जून 2026 को एक बड़ा फैसला लेते हुए टेक कंपनी एंथ्रोपिक को आदेश दिया कि वह विदेशी नागरिकों के लिए अपने एडवांस एआई मॉडल्स 'फेबल' (Fable) और 'माइथोस' (Mythos) का एक्सेस पूरी तरह ब्लॉक कर दे।

भारत को लगा झटका: भारत ने हाल ही में अमेरिका से अनुरोध कर 'माइथोस' मॉडल के प्रयोग और टेस्टिंग की अनुमति हासिल की थी, लेकिन ट्रम्प के इस एकतरफा आदेश के बाद भारत के हाथ से यह एक्सेस भी निकल गया।

सुरक्षा कवच भेदने का डर: अमेरिका का मानना है कि ये फ्रंटियर मॉडल्स इतने शक्तिशाली हैं कि ये दुनिया के किसी भी देश या सॉफ्टवेयर के रक्षा कवच (Guardrails) को आसानी से भेद सकते हैं। इसलिए अमेरिका अब इसे अपने सहयोगियों (Allies) और यूरोप के देशों के साथ भी साझा करने को तैयार नहीं है।

'टेक्नोलॉजी डिनायल रिजीम': यह कोई पहली बार नहीं है
एस. श्रीनिवासन ने रेखांकित किया कि विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को आधुनिक तकनीक न देना कोई नई बात नहीं है। इतिहास में इसे 'टेक्नोलॉजी डिनायल रिजीम' कहा जाता रहा है, जिसके कई उदाहरण मौजूद हैं:

एन्क्रिप्शन और न्यूक्लियर टेक: शुरुआत में डेटा को गुप्त रखने वाली एन्क्रिप्शन कूटनीति और बाद में परमाणु तकनीक (Nuclear Technology) को अमेरिका ने भारत से छुपाकर रखा, जिसमें बाद में रूस ने हमारी मदद की।

स्पेस और क्रायोजेनिक रॉकेट: अंतरिक्ष विज्ञान में भी भारत को ड्युअल-यूज़ टेक्नोलॉजी (युद्ध में इस्तेमाल होने का डर) का हवाला देकर सालों तक रोका गया।

तेजस के लिए GE F404 इंजन का रुकना: अटल बिहारी वाजपेयी के समय जब भारत ने दूसरा परमाणु परीक्षण किया, तो अमेरिका ने हमारे लड़ाकू विमान 'तेजस' के लिए आने वाले GE F404 इंजन की सप्लाई पर सैंक्शंस लगा दिए, जिससे हमारा स्वदेशी फाइटर जेट प्रोग्राम 15 साल पीछे चला गया।

भारत के पिछड़ने के 3 सबसे बड़े कारण
भारत सूचना प्रौद्योगिकी (IT) का गढ़ है, दुनिया की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों को भारतीय इंजीनियर्स चला रहे हैं, फिर भी भारत के पास अपना कोई 'फाउंडेशन मॉडल' क्यों नहीं है? इसके पीछे श्रीनि ने 3 मुख्य कारण बताए:

1. कंप्यूटिंग पावर और GPU की भारी कमी: एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए बहुत भारी हार्डवेयर और ग्राफ़िक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) की ज़रूरत होती है, जो बहुत तेज़ी से गणितीय गणनाएं कर सकें। भारत के पास इस कंप्यूटिंग पावर का भारी अभाव है।

2. R&D बजट और रिस्क न लेने की आदत: भारत अपने कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का महज 0.65% ही रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर खर्च करता है, जबकि विकसित देश 2.5% से 3% तक खर्च करते हैं। हमारे यहाँ के उद्योगपति ऐसे बिजनेस में पैसा लगाने से कतराते हैं जहाँ प्रयोगों के फेल होने का खतरा (Risk Adverse) हो।

3. प्राथमिकताओं का अंतर: अमेरिकी क्लाउड कंप्यूटिंग को बढ़ाने के लिए लाखों करोड़ रुपये निवेश कर रहा है। रिलायंस ने भी 30,000 करोड़ के आईपीओ की बात की है और सरकार ने 'इंडिया एआई मिशन' के लिए 10,000 करोड़ रुपये की घोषणा की है। यह रकम हमारे लिए बड़ी है, लेकिन वैश्विक स्तर पर जहां लाखों करोड़ की बात हो रही है, वहां हम केवल हजार करोड़ में सीमित हैं क्योंकि हमारी प्राथमिकताएं आज भी बुनियादी ज़रूरतें (दाल-रोटी, घर) प्रदान करना है।

भाषाई विविधता: भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं और अनगिनत बोलियां हैं। लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) बनाने के लिए इतनी विविधता को एक सूत्र में पिरोना एक जटिल और चुनौतीपूर्ण काम है।

'डेटा इज द न्यू ऑइल': क्या हम डिजिटल गुलामी की तरफ बढ़ रहे हैं?
चर्चा का सबसे गंभीर पहलू यह था कि क्या भारत सिर्फ एक कंज्यूमर बनकर रह जाएगा? श्रीनिवासन ने इसकी तुलना स्वतंत्रता से पहले के ब्रिटिश काल से की:

"आजादी से पहले हम भारत से कच्चा कपास बहुत सस्ते दामों में ब्रिटेन भेजते थे और वहां की मिलों से बनकर आने वाला कपड़ा महंगे दामों में वापस खरीदते थे। आज डिजिटल दुनिया में भी यही हो रहा है। हम अपना कीमती डेटा (फोटो, मैसेज, डिजिटल पेमेंट्स का रिकॉर्ड) इन विदेशी कंपनियों को मुफ्त में दे रहे हैं। 'डेटा ही नया तेल है', इसी डेटा का इस्तेमाल करके वे अपने मॉडल्स को ट्रेन करते हैं और फिर कुछ समय बाद वे फेबल और माइथोस जैसे सॉफ्टवेयर हमें ही महंगे दामों पर बेचते हैं। हम दुनिया के सबसे बड़े डेटा जनरेटर और यूजर हैं, जो हमारी ताकत भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी।"

समाधान: रेगुलेशन को बनाना होगा 'लोहे का कवच'
इस डिजिटल साम्राज्यवाद और सोवरेन्टी (संप्रभुता) पर मंडराते खतरे से बचने का केवल एक ही रास्ता है कि भारत सरकार अपने घरेलू कानूनों को बेहद सख्त बनाए।

विपक्ष ने भी संसद में इस मुद्दे को उठाया है कि देश का डेटा बाहर जा रहा है और हम उसका सदुपयोग नहीं कर पा रहे हैं। भारत को अपने डेटा प्रोटेक्शन लॉ (Data Protection Law) और निजी सूचनाओं से जुड़े कानूनों को इतना मजबूत करना होगा कि कोई भी विदेशी कंपनी हमारी अनुमति के बिना हमारे डेटा का व्यावसायिक लाभ न उठा सके। यदि हम कड़े नियमों के जरिए विदेशी तकनीक को भारतीय नियमों के दायरे में नहीं ला पाए, तो कूटनीतिक रूप से भारत इस एआई की दौड़ में केवल एक बाजार बनकर रह जाएगा।


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