
अमेरिका-ईरान में ऐतिहासिक शांति समझौता, भारत के लिए खुलेंगे विकास के द्वार!
अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौते से मध्य एशिया में स्थिरता की उम्मीद, भारत की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक विकास को मिलेगी नई रफ्तार, स्विट्जरलैंड बैठक पर टिकी निगाहें।
Janpath : विश्व राजनीति के पटल पर पिछले 100 दिनों से चल रहे तनावपूर्ण घटनाक्रम में एक बड़ा मोड़ आया है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम पर सहमति बनी है, जो न केवल पश्चिम एशिया के लिए बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और विशेष रूप से भारत के लिए एक सुखद संकेत है। शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में इस ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे, जो हॉर्मूज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी में बने लंबे समय के गतिरोध को समाप्त कर सकता है।
इस महत्वपूर्ण विषय पर द फ़ेडरल देश के कार्यक्रम जनपथ में इस विषय पर मनीष कुमार ने तकनीकी और कूटनीतिक पहलुओं पर प्रकाश डालने के लिए पूर्व राजनयिक विवेक काट्जू से चर्चा की।
विस्तृत विश्लेषण
चर्चा के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि 8 अप्रैल से ही युद्ध विराम के प्रयास जारी थे, लेकिन इसके बावजूद समुद्री मार्ग पर नाकेबंदी और तनाव के कारण दुनिया की 20 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित थी। विवेक काजू ने बताया कि इस स्थिति के कारण भारत सहित पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आया था। काजू ने रेखांकित किया कि अब उम्मीद है कि स्थिति सामान्य होगी, हालाँकि वहां बिछाई गई माइंस को हटाने में अभी कुछ समय लगेगा, जिसके बाद तेल की आपूर्ति पुनः सुचारू हो सकेगी।
कार्यक्रम में एक प्रमुख सवाल इजराइल के रुख को लेकर था। काट्जू ने स्पष्ट किया कि यद्यपि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस समझौते के प्रति सशंकित हैं और उसे 'एकतरफा' मान रहे हैं, लेकिन अंततः उन्हें अमेरिका की नीति के साथ तालमेल बिठाना पड़ेगा। अमेरिका वर्तमान में स्वयं महंगाई और आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे में ट्रंप प्रशासन के लिए इस शांति को बनाए रखना एक राजनीतिक मजबूरी और आवश्यकता दोनों है।
पाकिस्तान की भूमिका पर भी चर्चा हुई। एंकर ने शहबाज शरीफ द्वारा इस शांति प्रक्रिया में निभाई गई मध्यस्थता की ओर ध्यान दिलाया। काट्जू ने सतर्क करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने संदेशवाहक की भूमिका निभाई है और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाहवाही मिल रही है, लेकिन 'गुडविल' को आर्थिक विकास या विदेशी निवेश में बदलना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्योंकि वहां की आंतरिक लॉ एंड ऑर्डर और आधारभूत संरचना की स्थिति अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।
भारत के लिए प्रभाव
अंत में, चर्चा का केंद्र भारत रहा। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, जिसमें पर्शियन गल्फ का क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चर्चा का निष्कर्ष ये निकला कि यदि ईरान के साथ संबंध सुधरते हैं और सप्लाई चेन मजबूत होती है, तो यह भारत के लिए एक वरदान साबित हो सकता है। यह न केवल महंगाई को कम करेगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी सृजित करेगा। काजू ने अंत में एक महत्वपूर्ण सलाह दी कि भारत को अब अपनी पश्चिम एशियाई नीतियों को पुनः 'ड्राइंग बोर्ड' पर रखकर बारीकी से जांचने की आवश्यकता है ताकि बदली हुई भू-राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाया जा सके।
यह शांति समझौता आने वाले दिनों में न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि क्षेत्र में एक नई स्थिरता का आधार भी रखेगा, जिस पर 19 जून की स्विट्जरलैंड बैठक के बाद पूरी दुनिया की निगाहें टिकी होंगी।
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