टीएमसी की राजनीति में महासंकट, 20 बागी सांसदों ने छोड़ी ममता की छत

15 Jun 2026 4:57 PM IST

टीएमसी सांसदों की बगावत और दिल्ली दौड़ पर 'द फेडरल देश' के शो 'सियासत' में मनीष कुमार का बड़ा विश्लेषण, विचारधारा छोड़ नए राजनीतिक भविष्य की तलाश में बागी।

Siyasat : पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जो कुछ भी हो रहा है, उसे देखकर हर आम मतदाता का सिर चकरा सकता है। खासकर उनकी जिनकी देश के लोकतंत्र में गहरी आस्था है और जो संसदीय लोकतंत्र की मर्यादा को लेकर बेहद फिक्रमंद हैं। इस पूरे सियासी घमासान और उठापटक की हर परत को 'द फेडरल देश' के खास शो 'सियासत' में पूरी बारीकी से खोला गया है। शो के एंकर मनीष कुमार ने इस गंभीर विषय पर विस्तृत विश्लेषण किया कि कैसे नेताओं का रुख बदल रहा है।


कल तक भरोसेमंद सैनिक, आज बागी
ममता बनर्जी को लगा अब तक का सबसे बड़ा सदमा
कल तक जो नेता ममता बनर्जी को देश की सबसे मजबूत क्षेत्रीय नेता बताते थे, आज उन्होंने पाला बदल लिया है। जो मंचों से तृणमूल कांग्रेस को बंगाल की जनता की असली आवाज कहते थे, आज उन्हीं नेताओं ने नया ठिकाना खोज लिया है। बागियों ने ममता को ऐसी राजनीतिक पटखनी दी है कि शायद वे इस सदमे से अब उबर न पाएं। राजनीति में वैसे तो मौसम बदलने में काफी समय लगता है, लेकिन नेताओं का मिजाज कभी-कभी कुछ ही घंटों में बदल जाता है।


वेब सीरीज जैसा बना पूरा घटनाक्रम
सांसदों की दिल्ली दौड़ और ओम बिरला से मुलाकात
टीएमसी के भीतर मची इस कथित बगावत और सांसदों की दिल्ली दौड़ ने पूरे घटनाक्रम को किसी सस्पेंस वेब सीरीज जैसा बना दिया है। बागी सांसदों ने भाजपा के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र यादव से मुलाकात की है। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने संसद में अलग पहचान की मांग की गई और फिर नई पार्टी में विलय की चर्चाएं शुरू हो गईं। लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि सबसे भरोसेमंद सैनिक ही आज नई छत तलाश रहे हैं।

विचारधारा पर भारी पड़ा सियासी गणित
चुनाव के समय नीति और जीत के बाद प्राथमिकताएं बदलीं
भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि चुनाव के समय नेताओं को विचारधारा याद आती है और जीतने के बाद गणित। आम मतदाता सोचता है कि उसने किसी खास नीति और राजनीतिक दिशा के लिए अपना वोट दिया है। लेकिन कई बार चुनाव खत्म होते-होते पता चलता है कि नेता की प्राथमिकता विचारधारा नहीं, बल्कि अपना राजनीतिक भविष्य है। जब कोई नेता एक पार्टी के टिकट पर जीतकर दूसरी तरफ बढ़ता है, तो जनता के मन में गंभीर सवाल उठते हैं।

टीएमसी के संगठनात्मक मॉडल की कमजोरी
एक व्यक्ति पर पार्टी टिकने से शुरू हुई असली समस्या
ममता बनर्जी ने टीएमसी को अपने कड़े संघर्ष और मेहनत से खड़ा किया था। उन्होंने कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बनाई, वाम मोर्चे के लंबे शासन को उखाड़ फेंका और फिर बंगाल की राजनीति को बदला। लेकिन लगभग हर क्षेत्रीय दल की तरह टीएमसी भी धीरे-धीरे एक ऐसे मॉडल में बदल गई जहां नेतृत्व ही सब कुछ हो गया। जब पार्टी की ताकत सिर्फ एक व्यक्ति पर टिकी होती है, तो चुनौतियां बढ़ते ही संगठन के भीतर दबे हुए असंतोष अचानक बाहर आने लगते हैं।

महिला सांसदों के बदले सुर
अप्रैल में तारीफ और जून में दम घुटने का दावा
यही विरोधाभास इस समय तृणमूल कांग्रेस के भीतर साफ तौर पर देखने को मिल रहा है। यह वही टीएमसी थी और ममता को छोड़ने वाली वही महिला सांसद हैं, जो अप्रैल महीने में बढ़-चढ़कर कसीदे पढ़ रही थीं। वे गर्व से कह रही थीं कि टीएमसी में सबसे ज्यादा महिला सांसद हैं। लेकिन जून का महीना आते-आते उन्हीं महिला सांसदों का टीएमसी में दम घुटने लगा था। फिलहाल इस बगावत से बंगाल से लेकर दिल्ली तक का सियासी पारा पूरी तरह गरमाया हुआ है।