ममता को तगड़ा झटका: अपनों ने ही दिया धोखा, क्या टूटेगी TMC?
द फेडरल की 'जनपथ' चर्चा में बड़ा खुलासा; सुवेंदु अधिकारी की मौजूदगी में हुई बैठक, केसेज से बचने के लिए एनडीए की शरण में जा सकते हैं कई टीएमसी सांसद।

Janpath With Manish Kumar: पश्चिम बंगाल विधानसभा और लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के महज दो सप्ताह के भीतर ही ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक अभूतपूर्व राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ी हो गई है। द फेडरल के खास शो 'जनपथ' में सामने आई जानकारियों के मुताबिक, 4 मई को चुनावी नतीजे आने के ठीक 14 दिन बाद यानी 18 मई को ही टीएमसी के एक बागी गुट ने लोकसभा में अलग मान्यता देने के लिए स्पीकर को पत्र भेज दिया था। सूत्रों के हवाले से खबर है कि यह बागी गुट सोमवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात भी कर सकता है।
इस गंभीर विषय पर द फेडरल के पॉलिटिकल एडिटर पुनीत निकोलस यादव और कोलकाता से एडिटर समीर ने 'जनपथ' चर्चा में इस पूरे संकट के कानूनी, राजनीतिक और जमीनी पहलुओं को परत-दर-परत खोला है।
वायरल चिट्ठी का सच और 'सिलेक्टिव लीक' का खेल
चर्चा के दौरान कोलकाता से एडिटर समीर ने बताया कि सोशल मीडिया और मीडिया गलियारों में जो चिट्ठियां वायरल हो रही हैं, वे दरअसल 'सिलेक्टिव लीक' (चुनिंदा पन्ने) का हिस्सा हैं। इसमें पूरा पत्र सामने न रखकर सिर्फ सांसदों के हस्ताक्षर (सिग्नेचर) वाला आखिरी पन्ना लीक किया गया है। अभी आधिकारिक तौर पर काकोली घोष दस्तीदार या किसी अन्य वरिष्ठ सांसद ने इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं की है। हालांकि, पार्टी के भीतर उथल-पुथल की बात पूरी तरह सच है।
पॉलिटिकल एडिटर पुनीत निकोलस यादव ने इस पर आश्चर्य जताते हुए कहा, "भारतीय राजनीतिक इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जहाँ कोई मजबूत क्षेत्रीय दल चुनाव हारने के महज 10 से 15 दिनों के भीतर इतनी तेजी से बिखरने लगे।"
बागी गुट की दोहरी बातें और सुवेंदु अधिकारी का 'वाशिंग मशीन कल्चर'
इस पूरे विद्रोह के पीछे भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सुवेंदु अधिकारी की भूमिका को मुख्य वजह बताया गया है। समीर के अनुसार, सुवेंदु अधिकारी की दिल्ली यात्रा के दौरान बंग भवन में एक चांस मीटिंग हुई थी, जिसके बाद बागी गुट के नेताओं ने भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के घर पर सुवेंदु की मौजूदगी में बैठक की।
इस विद्रोह में शामिल नेताओं के विरोधाभास पर भी सवाल उठे हैं। एक तरफ काकोली घोष दस्तीदार का लोकसभा वाला बागी गुट एनडीए (NDA) में शामिल होने की बात कह रहा है, तो दूसरी तरफ ऋतब्रत बनर्जी और विधायकों का बागी धड़ा कह रहा है कि वे राज्य में विपक्ष में बैठेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इन नेताओं का आपस में कोई सीधा संवाद नहीं है, ये सिर्फ भाजपा के जरिए बातचीत कर रहे हैं। इन नेताओं के इस कदम के पीछे करियर और खुद को बचाना मुख्य मकसद है, क्योंकि इस गुट के अधिकतम नेताओं के खिलाफ शारदा, नारदा और भर्ती घोटाला जैसे गंभीर मामले पेंडिंग हैं, जिसे 'वाशिंग मशीन कल्चर' के तौर पर देखा जा रहा है।
सांसद-विधायकों के जनाधार पर सवाल
इस बगावत में यूसुफ पठान (जिन्होंने अधीर रंजन चौधरी को हराया), अबू ताहिर खान और सायनी घोष जैसे प्रमुख नाम भी सामने आ रहे हैं। सायनी घोष का हाल ही में एयरपोर्ट पर मास्क पहनकर चेहरा छिपाने वाला एक वीडियो भी वायरल हुआ है, जिस पर भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तथागत राय ने ट्वीट कर आपत्ति भी जताई है।
डिबेट में विशेषज्ञों ने साफ कहा कि बगावत करने वाले इन नेताओं का जमीन पर कोई स्वतंत्र मास-बेस (जनाधार) नहीं है। ये सभी नेता केवल ममता बनर्जी के चेहरे, लोकप्रियता और पार्टी सिंबल पर चुनाव जीते हैं। चुनाव के समय इन नेताओं ने ममता बनर्जी के इस दावे का कभी विरोध नहीं किया था कि सभी सीटों पर वही एकमात्र उम्मीदवार हैं, लेकिन आज हार का ठीकरा अभिषेक बनर्जी के तानाशाही रवैये पर फोड़ रहे हैं।
ममता बनर्जी के पास क्या हैं विकल्प?
कल्याण बनर्जी जैसे वरिष्ठ नेताओं द्वारा 'ममता या अभिषेक में से किसी एक को चुनने' के बयानों के बीच ममता बनर्जी के सामने अपनी पार्टी को समेटने की बड़ी चुनौती है। पुनीत निकोलस यादव के अनुसार, ममता बनर्जी के पास इस समय केवल दो ही रास्ते बचते हैं:
संगठनात्मक स्तर पर: जो भी वफादार नेता और जमीन उनके साथ बची है, उनके साथ तुरंत बैठक कर व्यापक मनमुटाव को दूर करें और पार्टी का बिखराव रोकें।
राजनीतिक स्तर पर: ममता बनर्जी एक 'स्ट्रीट फाइटर' हैं। उन्हें कानूनी अड़चनों को देखते हुए कांग्रेस में विलय (Merge) करने के बजाय अपने साधारण कार्यकर्ताओं को साथ लेकर सड़कों पर उतरना होगा और अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए नए सिरे से संघर्ष करना होगा।

