
वॉट्सऐप पे का फ्लॉप शो: कुणाल शाह बने नए प्रमुख, मेटा का बड़ा निवेश
WhatsApp Pay UPI Market Share: सिर्फ 0.65% बाजार हिस्सेदारी पर सिमटा वॉट्सऐप पे। मेटा ने क्रेड के कुणाल शाह को बनाया ग्लोबल हेड, क्रेड में किया $900M का निवेश।
Kunal Shah: भारत में वॉट्सऐप के पास करोड़ों यूजर्स का एक ऐसा अंपायर है, जिसे दुनिया का कोई भी देश टक्कर नहीं दे सकता। लेकिन जब बात डिजिटल पेमेंट और यूपीआई (UPI) इकोसिस्टम की आती है, तो वॉट्सऐप पे अपने इस विशाल यूजरबेस को ट्रांजैक्शन में बदलने में पूरी तरह नाकाम रहा है। चैटिंग और मैसेजिंग पर राज करने वाली कंपनी मेटा (Meta) के लिए अब यह अंतर एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस खाई को पाटने और अपनी पेमेंट व कॉमर्स महत्वाकांक्षाओं को नई जान देने के लिए मेटा ने फिनटेक कंपनी 'क्रेड' (CRED) के संस्थापक कुणाल शाह को वॉट्सऐप का नया ग्लोबल हेड (वैश्विक प्रमुख) नियुक्त किया है। इसके साथ ही मेटा ने क्रेड में 900 मिलियन डॉलर (करीब 7,500 करोड़ रुपये) का भारी-भरकम निवेश कर उसकी वैल्यूएशन 4.5 अरब डॉलर पहुंचा दी है।
बाजार की कड़वी हकीकत: दिग्गजों के सामने कहां टिकता है वॉट्सऐप?
भारत में वॉट्सऐप के पास 853 मिलियन (85.3 करोड़) से अधिक मंथली एक्टिव यूजर्स हैं, जबकि देश में एक्टिव यूपीआई यूजर्स की संख्या लगभग 500 मिलियन (50 करोड़) है। इसके बावजूद वॉट्सऐप पे का मार्केट शेयर बेहद चौंकाने वाला है:
महज 0.65% पर सिमटा: मई 2026 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत के कुल यूपीआई मार्केट में वॉट्सऐप पे की हिस्सेदारी सिर्फ 0.65 फीसदी है।
प्रतिद्वंद्वियों का एकछत्र राज: इसकी तुलना में फोनपे (PhonePe) 46.2% मार्केट शेयर के साथ पहले नंबर पर और गूगल पे (Google Pay) 32.7% के साथ दूसरे नंबर पर है। यहां तक कि संकटों से घिरी पेटीएम (Paytm) भी 7.9% शेयर के साथ तीसरे स्थान पर मजबूती से टिकी है।
छोटे ऐप्स से भी पीछे: हैरानी की बात यह है कि नवी (Navi), सुपरमनी (SuperMoney), भीम (BHIM), फेमपे (FamPay) और खुद क्रेड (CRED) जैसे छोटे और नए खिलाड़ी भी यूपीआई ट्रांजैक्शन के मामले में वॉट्सऐप पे से काफी आगे चल रहे हैं।
वॉट्सऐप पे के पिछड़ने के 5 मुख्य कारण: देरी से लेकर रणनीति तक की चूक
डिजिटल भुगतान के बाजार में वॉट्सऐप की इस विफलता के पीछे रक्षात्मक और रणनीतिक मोर्चे पर कई बड़ी गलतियां रहीं:
1. बाजार में बहुत देर से एंट्री: फोनपे ने साल 2016 और गूगल पे ने 2017 में भारतीय बाजार में कदम रख दिया था, जिससे उपभोक्ताओं को इन ऐप्स को डिफॉल्ट विकल्प के रूप में इस्तेमाल करने की आदत (Habit) पड़ गई। इसके उलट, रेगुलेटरी मंजूरियों के फेर में फंसने के कारण वॉट्सऐप पे को साल 2020 तक पूर्ण व्यावसायिक मंजूरी नहीं मिल सकी।
2. रेगुलेटरी बंदिशों का पहरा: भारतीय नियामकों ने वॉट्सऐप के लिए डेटा का स्थानीय भंडारण (Local Data Storage) अनिवार्य किया और इसे फेसबुक के मुख्य ऑपरेशन्स से अलग रखने को कहा। इसके अलावा, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने बाजार में एकाधिकार रोकने के लिए वॉट्सऐप पे के यूजर ऑनबोर्डिंग पर एक सख्त कैप (सीमित संख्या) लगा रखी थी, जिसे दिसंबर 2024 में जाकर पूरी तरह हटाया गया। तब तक प्रतिस्पर्धी मजबूत वफादार यूजरबेस बना चुके थे।
3. कैशबैक और ऑफर्स की कमी: जहां फोनपे और गूगल पे ने स्क्रैच कार्ड, रिफंड और आक्रामक कैशबैक ऑफर्स के जरिए ग्राहकों को अपनी ओर खींचा, वहीं वॉट्सऐप ने केवल अपने मौजूदा चैटिंग यूजरबेस के भरोसे हाथ पर हाथ धरे रखा। वह यूजर्स को ऐप बदलने का कोई ठोस कारण नहीं दे सका।
4. खराब और उलझा हुआ प्रोडक्ट डिजाइन: एक समर्पित (Dedicated) पेमेंट ऐप न होकर वॉट्सऐप पे आज भी चैटिंग इंटरफेस के भीतर ही छुपा हुआ है। देश के करोड़ों यूजर्स को आज भी यह नहीं पता कि चैट बॉक्स में पेमेंट का भी एक फीचर है। इसकी कोई स्टैंडअलोन होम-स्क्रीन प्रेजेंस नहीं है।
5. मर्चेंट और क्यूआर (QR) कोड का अभाव: फोनपे और गूगल पे ने देश के कोने-कोने में, किराना दुकानों से लेकर बड़े मॉल्स तक अपने साउंडबॉक्स और क्यूआर कोड लगा दिए, जिससे वे रोजमर्रा की खरीदारी का हिस्सा बन गए। वॉट्सऐप केवल पीयर-टू-पीयर (एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति) ट्रांसफर तक ही सीमित रह गया और जमीनी इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं बना सका।
प्राइवेसी की चिंता और 'मेटा' का टैग
इसके अलावा, फेसबुक और मेटा की डेटा प्राइवेसी नीतियों को लेकर भारतीय यूजर्स के मन में हमेशा एक संशय रहा है। बैंक खातों को एक सोशल मीडिया और चैटिंग प्लेटफॉर्म से जोड़ने में लोग हिचकिचाते रहे हैं, जिसे वॉट्सऐप पर आने वाले लगातार स्पैम और फिशिंग मैसेजेस ने और हवा दी।
इस स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वॉट्सऐप के अपने नए बिजनेस फीचर 'वॉट्सऐप फ्लोज़' में भी अब ग्राहकों के लिए वॉट्सऐप पे का इस्तेमाल करना अनिवार्य नहीं है; वे खरीदारी के दौरान किसी भी अन्य यूपीआई ऐप या क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर सकते हैं। यानी मेटा खुद मान चुका है कि लोग चैटिंग के लिए उसका उपयोग करेंगे, लेकिन पेमेंट के लिए दूसरों का।
कुणाल शाह के कंधों पर दारोमदार; क्या बदलेगा वॉट्सऐप का भविष्य?
अब मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को उम्मीद है कि भारतीय फिनटेक जगत के दिग्गज कुणाल शाह इस पूरी तस्वीर को बदल सकते हैं। इससे पहले फ्रीचार्ज (FreeCharge) की स्थापना और फिर क्रेड (CRED) को 4.5 अरब डॉलर की कंपनी बनाने वाले कुणाल शाह के पास भारतीय कंज्यूमर बिहेवियर और वित्तीय प्रोडक्ट्स का एक लंबा अनुभव है। जुकरबर्ग के अनुसार, शाह के पास वह 'बिल्डर मेंटैलिटी' और वैश्विक नजरिया है जो वॉट्सऐप को अगले अध्याय में ले जाएगा।
इस डील के साथ प्राइवेसी विवादों से बचने के लिए मेटा और क्रेड दोनों ने साफ किया है कि इस निवेश के बदले मेटा को क्रेड के प्रीमियम ग्राहकों के डेटा का कोई एक्सेस नहीं दिया जाएगा। भारत की आम बोलचाल में 'वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी' और 'वॉट्सऐप अंकल' जैसे शब्दों को शामिल करने वाला यह प्लेटफॉर्म क्या भारतीय डिजिटल पेमेंट कल्चर का हिस्सा बन पाएगा? कुणाल शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे करोड़ों भारतीयों को उस काम के लिए राजी करें जिसे वे अब तक नकारते आए हैं— यानी जिससे चैट करते हैं, उसी से पेमेंट भी करें।
(ऊपर दिया गया कंटेंट एक बेहतरीन AI मॉडल का इस्तेमाल करके वीडियो से ट्रांसक्राइब किया गया है। सटीकता, क्वालिटी और एडिटोरियल ईमानदारी बनाए रखने के लिए, हम 'ह्यूमन-इन-द-लूप' (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, लेकिन हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम पब्लिश करने से पहले कंटेंट की सावधानीपूर्वक समीक्षा, एडिटिंग और उसे बेहतर बनाती है। 'द फेडरल' में, हम भरोसेमंद और जानकारीपूर्ण पत्रकारिता देने के लिए AI की कुशलता और इंसानी एडिटर्स की विशेषज्ञता को मिलाते हैं।)
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