
महाराष्ट्र: मराठी नहीं तो ऑटो-टैक्सी लाइसेंस नहीं, 1 मई से रद्द होंगे लाइसेंस!
भाजपा-शिवसेना-एनसीपी की महायुति सरकार ने ऑटो चालकों के लिए 1 मई से मराठी भाषा अनिवार्य की। मुंबई के लाखों गैर-मराठी चालकों के लाइसेंस पर मंडराया खतरा, भाषा की राजनीति ने पकड़ा जोर।
Marathi Politics And Auto Taxi Drivers : महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भाषा का कार्ड जोर-शोर से खेला जाने लगा है। राज्य की भाजपा, शिवसेना (शिंदे गुट) और एनसीपी (अजीत पवार गुट) की 'महायुति' सरकार ने ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा के ज्ञान को अनिवार्य बनाकर एक नया सियासी दांव चल दिया है। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के ताजा फरमान के मुताबिक, 1 मई 2026 यानी 'महाराष्ट्र दिवस' से उन सभी लाइसेंस प्राप्त ड्राइवरों पर कार्रवाई की जाएगी जो मराठी बोलने, पढ़ने और लिखने में सक्षम नहीं होंगे। इस फैसले ने मुंबई जैसे महानगर में रहने वाले लाखों गैर-मराठी चालकों के बीच हड़कंप मचा दिया है और राज्य में 'मराठी बनाम प्रवासी' की राजनीति को एक बार फिर से हवा दे दी है।
वोट बैंक को साधने की राजनीतिक कवायद
राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को आगामी चुनावों से पहले 'मराठी मानुस' को रिझाने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। महाराष्ट्र में भाजपा और उसके सहयोगी दल अपनी पैठ मजबूत करने के लिए अक्सर क्षेत्रीय गौरव का सहारा लेते रहे हैं। जानकारों का मानना है कि शिवसेना के दोनों गुटों के बीच चल रही 'असली शिवसेना' की जंग के बीच, महायुति सरकार खुद को मराठी अस्मिता का सबसे बड़ा रक्षक साबित करना चाहती है। यही कारण है कि अब प्रशासनिक आदेशों के जरिए भाषाई राष्ट्रवाद को लागू किया जा रहा है।
मुंबई के गैर-मराठी ड्राइवरों पर सीधा प्रहार
मुंबई की धड़कन कही जाने वाली काली-पीली टैक्सी और ऑटो रिक्शा के पीछे एक बड़ी आबादी उन प्रवासियों की है जो उत्तर भारत और अन्य राज्यों से आकर यहां बसे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई में लगभग 70 प्रतिशत ऑटो-टैक्सी चालक गैर-मराठी भाषी हैं। सरकार का यह नया फरमान इन लोगों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। मात्र 15 दिनों की समय सीमा के भीतर एक पूरी भाषा में दक्षता हासिल करना व्यावहारिक रूप से असंभव है, जिससे इन चालकों में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा हो गया है।
लाइसेंस रद्द करने की सख्त कानूनी चेतावनी
सरकार ने इस बार केवल सुझाव नहीं दिया है, बल्कि इसे लाइसेंस की अनिवार्यता से जोड़ दिया है। परिवहन मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि 1 मई से राज्य भर के 59 आरटीओ (RTO) कार्यालयों के माध्यम से एक विशेष जांच अभियान चलाया जाएगा। यदि कोई चालक मराठी भाषा की बुनियादी परीक्षा में फेल होता है, तो उसका लाइसेंस तुरंत रद्द किया जा सकता है। यह सख्ती उन गरीब चालकों के लिए रोजी-रोटी का संकट बन गई है जो दशकों से मुंबई की सड़कों पर बिना किसी भाषाई विवाद के सेवाएं दे रहे हैं।
विपक्ष और यूनियनों का तीखा पलटवार
सरकार के इस कदम पर विपक्षी दलों और ड्राइवर यूनियनों ने कड़ी आपत्ति जताई है। मुंबई टैक्सी एसोसिएशन और अन्य संगठनों का कहना है कि चालक पहले ही लाइसेंस लेते समय 'वर्किंग नॉलेज' के नियमों का पालन करते हैं। अचानक इस तरह की परीक्षा लेना और लाइसेंस रद्द करने की धमकी देना तानाशाही है। यूनियनों का आरोप है कि सरकार जनहित के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए भाषा की राजनीति का सहारा ले रही है। भाजपा के अपने ही कुछ सेल ने चिंता जताई है कि इस फैसले से उत्तर भारतीय वोट बैंक नाराज हो सकता है।
प्रशासनिक सख्ती या चुनावी प्रोपेगेंडा
प्रशासन ने इस नियम को लागू करने के लिए कमर कस ली है, लेकिन इसके पीछे के राजनीतिक निहितार्थों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्या वाकई यात्रियों की सुविधा के लिए यह कदम उठाया गया है, या फिर यह विरोधियों को मात देने का एक राजनीतिक औजार है? मुंबई जैसे शहर में, जो अपनी विविधता के लिए जाना जाता है, वहां इस तरह के भाषाई प्रतिबंध सामाजिक ताने-बाने पर भी असर डाल सकते हैं।

