BJP से बढ़ा खतरा, फिर करीब आ सकते हैं शिंदे और उद्धव गुट!
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BJP से बढ़ा खतरा, फिर करीब आ सकते हैं शिंदे और उद्धव गुट!

महाराष्ट्र की राजनीति में नया मोड़। शिवसेना के दोनों गुटों (शिंदे और ठाकरे) ने माना कि सहयोगी दलों को खत्म कर रही है बीजेपी; अब्दुल सत्तार और अंबादास दानवे ने दिए एक होने के संकेत।


Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति में साल 2022 में शिवसेना को दो फाड़ करने वाली कड़वाहट क्या अब खत्म होने की ओर है? एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेताओं के हालिया बयानों ने दोनों गुटों के फिर से एक होने की चर्चाओं को हवा दे दी है। इस बार दोनों धुर विरोधियों को करीब लाने की वजह कोई आंतरिक समझौता नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सियासत में पैर पसारती बीजेपी (BJP) का बढ़ता दबदबा और दोनों गुटों में पनपा राजनीतिक वजूद खत्म होने का साझा डर है।


दोनों पक्षों के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह तर्क देना शुरू कर दिया है कि बीजेपी सुनियोजित तरीके से दोनों क्षेत्रीय पार्टियों को कमजोर कर रही है और उनके पारंपरिक जनाधार को निगल रही है। हालांकि, शिंदे और उद्धव ठाकरे के बीच अभी तक किसी औपचारिक बातचीत के संकेत नहीं हैं, लेकिन वैचारिक स्तर पर आया यह बदलाव राज्य में एक नए सियासी समीकरण की आहट दे रहा है।

'हाथ-पैर काट दिए, अब सिर कलम करने की तैयारी' शिंदे गुट के मंत्री अब्दुल सत्तार का बड़ा आरोप
केंद्र और महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार में साझीदार होने के बावजूद शिंदे गुट के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार के बयानों ने महायुति गठबंधन के भीतर की दरार को उजागर कर दिया है। सत्तार ने छत्रपति संभाजीनगर में मीडिया से बात करते हुए कहा, "यही सही समय है जब दोनों शिवसेना को एक हो जाना चाहिए।"

बीजेपी पर गंभीर आरोप: सत्तार ने अपनी ही सहयोगी पार्टी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, "बीजेपी शिवसेना को खत्म करने की कोशिश कर रही है। उसने पहले ही हमारे हाथ-पैर तोड़ दिए हैं और अब हमारा सिर कलम करने की फिराक में है। जिला परिषद और नगर निगम जैसे स्थानीय निकायों पर हमारा नियंत्रण पहले ही खत्म हो चुका है।"

बगावत का दर्द: सत्तार का यह गुस्सा तब फूटा जब विधान परिषद सीट के लिए उनके बेटे समीर सत्तार की दावेदारी को दरकिनार कर बीजेपी ने सुहास शिरसाट को टिकट दे दिया, जिसके बाद समीर ने बागी उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया। सत्तार ने बीजेपी की कार्यशैली को "स्लो पॉइज़न" (धीमा जहर) बताते हुए कहा कि वे उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ सिर्फ इसलिए आए थे ताकि बेहतर काम कर सकें, लेकिन यहाँ उन्हें लगातार नजरअंदाज और दरकिनार किया जा रहा है।

'बड़ी मछली छोटी मछली को निगल रही है' ठाकरे गुट के अंबादास दानवे ने दी मातोश्री आने की सलाह
दूसरी तरफ, शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता और विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष अंबादास दानवे ने भी इस विचार का समर्थन किया है। उन्होंने औरंगाबाद-जालना निर्वाचन क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि जो सीटें पारंपरिक रूप से अविभाजित शिवसेना लड़ती थी, वे अब बीजेपी के हाथ में चली गई हैं।

बीजेपी की तुलना 'छोटी मछली को निगलने वाली बड़ी मछली' से करते हुए दानवे ने आरोप लगाया कि भाजपा का एकमात्र लक्ष्य शिवसेना और एनसीपी (NCP) दोनों को पूरी तरह से समाप्त करना है। दानवे ने तंज कसते हुए कहा कि जिन लोगों ने 2022 में पार्टी तोड़ी थी, अब उन्हें अहसास हो रहा होगा कि बीजेपी उन्हें हाशिए पर धकेल रही है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि शिंदे गुट विलय चाहता है, तो मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को सीधे 'मातोश्री' (ठाकरे परिवार का निवास स्थान) जाकर उद्धव ठाकरे से बात करनी चाहिए, क्योंकि बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा वाली असली शिवसेना वही है।

संजय राउत ने खोले वापसी के दरवाजे, लेकिन प्रवक्ता ने याद दिलाई 'बेबसी'
शिंदे खेमे में बढ़ती बेचैनी को भांपते हुए शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने मंगलवार को बड़ा बयान दिया। राउत ने कहा, "2022 की बगावत के दौरान जो नेता शिंदे के साथ चले गए थे और अब अगर उन्हें अपने फैसले पर पछतावा है या वे घुटन महसूस कर रहे हैं, तो वे उद्धव ठाकरे की पार्टी में वापस लौट सकते हैं।" हालांकि, उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि हर किसी की वापसी इतनी आसान नहीं होगी और कुछ नेताओं के लिए दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं।

इस बीच, कड़वाहट और अविश्वास की परतें अभी भी पूरी तरह हटी नहीं हैं। शिवसेना (UBT) की प्रवक्ता सुषमा अंधारे ने सत्तार पर पलटवार करते हुए कहा, "हम तो पहले दिन से जानते थे कि बीजेपी स्लो पॉइज़न है... लेकिन सत्तार भाई, आप सत्ता की लालच में बेबस थे और जानते बूझते हुए भी आपने यह रास्ता चुना।"

इन बयानों से साफ है कि हालांकि दोनों गुटों के बीच पुनर्मिलन की चर्चाएं अब बंद कमरों से निकलकर सरेआम होने लगी हैं, लेकिन ढाई साल पुरानी कड़वाहट और गहरा अविश्वास इस राह की सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ है।


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