ढाका में बदलाव की आंधी, दिल्ली के लिए राहत के संकेत
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ढाका में बदलाव की आंधी, दिल्ली के लिए राहत के संकेत

बांग्लादेश में बीएनपी की प्रचंड जीत को यूनुस की राजनीति और जमात गठबंधन के खिलाफ जनादेश माना जा रहा है। 1971 की भावना की वापसी के संकेत मिले।


बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की प्रचंड जीत को अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस और उनके छात्र-युवा समर्थकों द्वारा अतीत से पूर्ण विच्छेद की कोशिश के खिलाफ जनता के स्पष्ट जनादेश के रूप में देखा जा सकता है। यह जनादेश उस प्रयास के विरुद्ध निर्णायक मत माना जा रहा है, जिसके तहत बांग्लादेश को एक तरह से बंगाली पाकिस्तान की दिशा में ले जाने की आशंका जताई जा रही थी।

यूनुस की रणनीति से गठित नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के छात्र-युवा नेताओं की करारी हार को शेख हसीना के बाद की उस राजनीति की पूर्ण अस्वीकृति के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसमें भीड़तंत्र को लोकतंत्र और सत्ता परिवर्तन को क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था। नोबेल पुरस्कार विजेता यूनुस ने मतदान के बाद “न्यू डॉन” (नई सुबह) का जो उत्साहपूर्ण वादा किया था, वह युवा मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सका।

जेन-ज़ेड का स्पष्ट संदेश

बांग्लादेश की जेन-ज़ेड पीढ़ी, जो इस चुनाव में एक अहम मतदाता वर्ग थी, भ्रष्टाचार और वसूली की राजनीति से मुक्ति तथा टिकाऊ आर्थिक विकास का रास्ता चाहती थी। लेकिन यूनुस के समर्थन से एनसीपी नेताओं द्वारा अपनाया गया टकरावपूर्ण और अस्थिर एजेंडा युवाओं को स्वीकार्य नहीं लगा।

जब एनसीपी ने जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन किया, तो युवा मतदाताओं ने इसे 2024 के जुलाई-अगस्त आंदोलन की भावना से समझौता माना। जुलाई-अगस्त आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कई युवा महिला नेताओं ने जमात से गठबंधन की घोषणा के बाद एनसीपी से दूरी बना ली। जमात प्रमुख द्वारा कामकाजी महिलाओं को चरित्रहीन बताने जैसी टिप्पणियों के बाद इस गठबंधन के खिलाफ लैंगिक प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। खासकर तब, जब बांग्लादेश में महिला मतदाता संख्या पुरुषों से अधिक है और अविभाजित बंगाल के समय से महिला सशक्तिकरण की मजबूत परंपरा रही है।

1971 की भावना की ओर वापसी

अतीत में बीएनपी ने अवामी लीग (एएल) के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन किया था। अवामी लीग स्वयं को 1971 के मुक्ति संग्राम की विरासत का एकमात्र संरक्षक बताती रही है। हालांकि जमात के समर्थन की कीमत बीएनपी को एक सख्त इस्लामी एजेंडे की ओर झुकाव के रूप में चुकानी पड़ी, जिससे पार्टी के प्रतिबद्ध बंगाली राष्ट्रवादी धड़े असहज थे।

इस चुनाव में, यूनुस द्वारा अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद बीएनपी ने अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए 1971 के मुक्ति संग्राम की भावना को मजबूती से उठाया। बीएनपी की स्थापना मुक्ति संग्राम के नायक जियाउर रहमान ने की थी, जिन्हें बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा करने वाले पहले नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

बीएनपी के टिकट पर स्वतंत्रता सेनानी फज़लुर रहमान की भारी जीत और पार्टी से टिकट न मिलने के बावजूद बैरिस्टर रूमिन फरहाना की प्रभावशाली जीत इस रुझान को दर्शाती है। रूमिन ने एक इस्लामी मौलवी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत दर्ज की, जिन्हें पार्टी का आधिकारिक समर्थन प्राप्त था। यह दर्शाता है कि बांग्लादेशी मतदाता स्वतंत्रता और 1971 की भावना को कितना महत्व देते हैं।

नई दिल्ली के लिए सकारात्मक संकेत

यह परिणाम नई दिल्ली के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। 1971 का मुक्ति संग्राम भारत और बांग्लादेश को ऐतिहासिक रूप से जोड़ता है। उस दौर में भारत ने पाकिस्तानी दमन से भागे लाखों शरणार्थियों को शरण दी थी और बंगाली स्वतंत्रता सेनानियों का समर्थन किया था।

प्रधानमंत्री पद के दावेदार तारिक रहमान और उनकी टीम ने भारत के साथ अच्छे संबंधों की वकालत की है। चूंकि भारत की करीबी मानी जाने वाली अवामी लीग इस चुनाव में नहीं थी, इसलिए भारत भी ढाका में जमात के नेतृत्व में इस्लामी वर्चस्व नहीं चाहता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले तारिक रहमान की मां खालिदा जिया के निधन पर संवेदना जताकर और अब बीएनपी की जीत के बाद संपर्क साधकर संकेत दिया है कि भारत इस बदलाव को महत्व दे रहा है।

भारत को यह भी चिंता थी कि यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के समर्थन से जमात का प्रभाव बढ़ रहा था, जिससे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और उदारवादी विचारधारा पर हमलों में वृद्धि देखी जा रही थी।

आगे की चुनौतियां

हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि सब कुछ सहज रहेगा। बीएनपी पर जमात का दबाव रहेगा कि वह भारत-हितैषी नीति से बचे और शेख हसीना के प्रत्यर्पण या नदी जल बंटवारे जैसे मुद्दों को जोरदार ढंग से उठाए।

भारत के लिए भी जरूरी होगा कि वह आवश्यक वस्तुओं जैसे चावल और प्याज की आपूर्ति में सहयोग करे और विशेषकर चिकित्सा वीजा को आसान बनाए, ताकि हाल के वर्षों में बढ़ी भारत-विरोधी भावनाओं को कम किया जा सके।तारिक रहमान के सामने पार्टी और प्रशासनिक ढांचे में मौजूद भारत-विरोधी तत्वों पर नियंत्रण रखना भी एक बड़ी चुनौती होगी। इनमें 2004 के चिटगांव हथियार कांड से जुड़े पूर्व राज्यमंत्री लुत्फोज्जमान बाबर जैसे नाम शामिल रहे हैं।

फिलहाल भारत के लिए बीएनपी को बंगाली कहावत के अनुसार मोंडेर भालो यानी बुरे से बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

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