ट्रंप संबोधन से पहले चीन-पाकिस्तान की पहल, शांति पर संशय कायम
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ट्रंप संबोधन से पहले चीन-पाकिस्तान की पहल, शांति पर संशय कायम

चीन-पाकिस्तान के शांति प्रस्ताव के बावजूद अमेरिका और ईरान की सख्त शर्तों के कारण युद्धविराम की राह मुश्किल बनी हुई है और तनाव बरकरार है।


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 2 अप्रैल को देश को संबोधित करने वाले हैं और उम्मीद है कि वे कोई बड़ा ऐलान कर सकते हैं। जंग अब पांचवें हफ्ते में पहुंच चुकी है और इसका अंत कब होगा, यह साफ नहीं है। हर दिन के साथ संघर्ष बढ़ता जा रहा है और खाड़ी क्षेत्र के कई देश भी इसकी चपेट में आ चुके हैं। ऐसे में दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस संकट का समाधान कैसे निकलेगा।

इसी बीच चीन और पाकिस्तान ने मिलकर 5 सूत्रीय शांति प्रस्ताव पेश किया है। इसमें बिना किसी शर्त के तुरंत युद्धविराम की बात कही गई है, ताकि हालात और न बिगड़ें। साथ ही सभी पक्षों से बातचीत की मेज पर लौटने और शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने की अपील की गई है।

यह प्रस्ताव सिर्फ युद्ध रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके असर को कम करने पर भी जोर देता है। इसमें नागरिकों और जरूरी ढांचों जैसे बिजली, पानी और परमाणु संयंत्रों को सुरक्षित रखने की बात कही गई है। साथ ही होरमुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बनाए रखने पर भी जोर दिया गया है, क्योंकि यह दुनिया की ऊर्जा सप्लाई का अहम रास्ता है।

हालांकि, इस प्रस्ताव को लागू करना आसान नहीं है। अमेरिका, इजरायल और ईरान—तीनों की अपनी-अपनी शर्तें हैं, जो एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।ईरान का कहना है कि किसी भी समझौते से पहले हमले और टारगेट किलिंग पूरी तरह बंद होनी चाहिए। वह भविष्य में सुरक्षा की गारंटी, युद्ध के नुकसान की भरपाई और पूरे क्षेत्र में शांति चाहता है। साथ ही वह होरमुज जलडमरूमध्य पर अपने नियंत्रण को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की मांग कर रहा है।

वहीं अमेरिका का रुख सख्त है। वह चाहता है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह बंद करे, यूरेनियम संवर्धन रोके और अपने परमाणु भंडार को अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को सौंप दे। साथ ही मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय समर्थन खत्म करने की भी मांग की गई है। बदले में अमेरिका प्रतिबंधों में राहत देने की बात कह रहा है, लेकिन ईरान ने इन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया है।

युद्धविराम की राह अभी मुश्किल नजर आ रही है। चीन-पाकिस्तान का प्रस्ताव बातचीत शुरू करने का एक रास्ता जरूर देता है, लेकिन असली समस्या आपसी भरोसे की कमी और कड़ी शर्तें हैं। जब तक दोनों पक्ष थोड़ी नरमी नहीं दिखाते, तब तक समाधान निकलना मुश्किल ही रहेगा।

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