
'आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया' बना वैश्विक मुसीबत! कर्ज के दलदल में विश्व
IMF की रिपोर्ट ने दी 80 साल बाद सबसे बड़े आर्थिक संकट की चेतावनी। वैश्विक सरकारी कर्ज दुनिया की कुल GDP के 100% तक पहुंचने की कगार पर है...
वाशिंगटन: ग्लोबल टेंशन के बीच एक और टेंशन बढ़ाने वाली खबर आई है। यह खबर दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर एक बहुत बड़ी चेतावनी भी है। दरअसल, इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (IMF) ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है, जिसने पूरी दुनिया के नीति-निर्माताओं को चिंता में डाल दिया है।
आईएमएफ की 'फिस्कल मॉनिटर' (Fiscal Monitor) रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया पर कर्ज का बोझ इतनी तेजी से बढ़ता जा रहा है कि साल 2029 तक यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (Global GDP) के 100 फीसदी तक पहुंच सकता है। चिंता की बात यह है कि यह एक ऐसी स्थिति है जो सामान्य समय में बिल्कुल भी नहीं देखी जाती है।
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अगर दुनियाभर में वर्तमान जैसा संकट का माहौल जारी रहा, तो साल 2029 तक वैश्विक सरकारी कर्ज (Global Debt) दुनिया की कुल जीडीपी के 100% के बराबर हो सकता है। यह डेटा डराने वाला इसलिए है क्योंकि इस तरह के आंकड़े आखिरी बार दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ही देखने को मिले थे।
द्वितीय विश्वयुद्ध जैसी स्थिति की आहट
IMF की इस रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल 2025 में ही वैश्विक कर्ज करीब 94% जीडीपी तक पहुंच चुका है और आने वाले वर्षों में इसमें लगातार बढ़ोतरी होने की पूरी आशंका है। इसका सीधा और सरल मतलब यह है कि दुनिया भर के देश मिलकर एक साल में जितना कमाते हैं, उतना ही पैसा उन पर कर्ज के रूप में बकाया हो सकता है।
रिपोर्ट की मानें तो दुनिया आखिरी बार कर्ज के इस खतरनाक स्तर पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहुंची थी। उस समय युद्ध की भयंकर विभीषिका और युद्ध के बाद इंफ्रास्ट्रक्चर पर किए गए बेतहाशा खर्चों ने देशों को कर्ज के दलदल में धकेल दिया था। अब करीब 80 साल के लंबे अंतराल के बाद दुनिया फिर से उसी खतरनाक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। सच तो यह है कि उस समय के मुकाबले अभी की स्थिति ज्यादा गंभीर नजर आती है। इसका कारण यह है कि उस समय केवल युद्ध की वजह से ऐसी स्थिति आई थी, जबकि मौजूदा समय में केवल युद्ध ही नहीं, बल्कि लगातार बढ़ते राजकोषीय घाटे, ऊंची ब्याज दरें और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कई कारण एक साथ सक्रिय हैं।
IMF की इस रिपोर्ट में कर्ज बढ़ने के कई बड़े और ठोस कारण बताए गए हैं...
1. ग्लोबल तनाव सबसे बड़ी वजह
कर्ज बढ़ने की सबसे प्रमुख वजह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ते युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव हैं। खासकर पश्चिम एशिया (Middle East) में जारी संघर्ष की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों में जबरदस्त तेजी आई है। इससे सरकारों का खर्च बेतहाशा बढ़ गया है। कई देशों में आम जनता पर इस महंगाई का बोझ न पड़े, इसके लिए सरकारें अतिरिक्त सब्सिडी दे रही हैं और इस सब्सिडी के लिए उन्हें बाजार से भारी कर्ज लेना पड़ रहा है।
2. महंगाई बढ़ने का बड़ा खतरा
इसके अलावा महंगाई और ब्याज दरों में हो रही बढ़ोतरी भी एक बड़ी वजह है। जब ब्याज दरें ऊंची होती हैं, तो सरकारों के लिए अपने पुराने कर्ज की किश्तें चुकाना और नया कर्ज लेना, दोनों ही बहुत महंगा हो जाता है। इससे कुल कर्ज का बोझ और भी तेजी से बढ़ता है। पिछले कुछ वर्षों में महंगाई पर लगाम लगाने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ाई हैं। इस कारण सरकारों के लिए पुराना कर्ज चुकाना और नया कर्ज लेना, दोनों ही खर्चीला हो गया है। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में ब्याज भुगतान का हिस्सा 2% से बढ़कर अब 3% तक पहुंच गया है।
3. आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया
IMF ने यह भी रेखांकित किया है कि दुनिया के कई देश लगातार बजट घाटे (Fiscal Deficit) की स्थिति में चल रहे हैं। यानी उनकी आमदनी कम है और खर्च बहुत ज्यादा है। इस बड़े अंतर को पूरा करने के लिए सरकारें लगातार उधार ले रही हैं, जिससे कर्ज का स्तर लगातार ऊपर की ओर भाग रहा है।
यही नहीं, इस स्थिति की सबसे ज्यादा चोट विकासशील और गरीब देशों पर पड़ने वाली है। खासकर जिन देशों की अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर है या जो पूरी तरह से तेल आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है। ऐसे देशों में कर्ज चुकाने की क्षमता बहुत सीमित होती है, जिससे वहां बड़े आर्थिक संकट का खतरा हर वक्त मंडराता रहता है।
इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए IMF ने सभी देशों को सलाह दी है कि वे अपने खर्च पर सख्त काबू रखें, सिर्फ वास्तव में जरूरतमंद लोगों को ही वित्तीय सहायता प्रदान करें और लंबी अवधि में अपना कर्ज कम करने के लिए एक ठोस और व्यावहारिक योजना तैयार करें।
भारत के लिए क्या है संकेत?
पूरी दुनिया भर की इस खराब स्थिति के बीच आईएमएफ ने भारत को एक 'ब्राइट स्पॉट' (Bright Spot) यानी उम्मीद की किरण बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अपने प्राथमिक खर्चों पर बहुत अच्छा नियंत्रण रखा है और अपनी राजकोषीय स्थिति में लगातार सुधार किया है। भारत की मजबूत और तेज जीडीपी ग्रोथ के कारण आने वाले समय में इसके कर्ज के अनुपात में स्थिरता आने या कमी होने की पूरी उम्मीद है।
फिलहाल भारत का कर्ज-जीडीपी अनुपात 84% के करीब है, जो वैश्विक औसत के मुकाबले बेहतर स्थिति में है। इसके विपरीत, दुनिया की अन्य बड़ी महाशक्तियों की स्थिति चिंताजनक है। अनुमान है कि अमेरिका का सरकारी कर्ज 2031 तक उसकी जीडीपी का 142% हो सकता है। जबकि चीन का कर्ज 127% तक पहुंचने का अनुमान जताया गया है।

