
गंगा जल समझौते पर रार, बांग्लादेश ने भारतीय प्रस्ताव को बताया तर्कहीन
भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुआ 30 वर्षीय गंगा जल बंटवारा समझौता इस साल दिसंबर में समाप्त हो रहा है। शर्तों और नए फॉर्मूले को लेकर दोनों देशों में मतभेद गहरे।
India Bangladesh Ganga Water Treaty: फरक्का बांध के चालू होने के दो दशक बाद साल 1996 में दोनों देशों के बीच हुआ यह 30 वर्षीय ऐतिहासिक समझौता अब अपने आखिरी दौर में है। बांग्लादेश में फरवरी 2026 में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई बीएनपी (BNP) सरकार के गठन के बाद इस संधि के नवीनीकरण (Renewal) को लेकर कूटनीतिक हलचल तो तेज हुई है, लेकिन नए नियमों और फॉर्मूले को लेकर दोनों पक्षों के बीच गंभीर मतभेद भी खुलकर सामने आने लगे हैं। बांग्लादेश के जल संसाधन विशेषज्ञ भारत की ओर से आ रहे नए अनौपचारिक प्रस्तावों को 'तर्कहीन' बता रहे हैं, जिससे इस समझौते के भविष्य पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
क्या था 1996 का ऐतिहासिक फॉर्मूला और क्यों फंसा है शर्तों पर पेंच?
साल 1996 में हुए समझौते के तहत शुष्क मौसम के दौरान नदी के जल प्रवाह (Water Flow) के आधार पर पानी का बंटवारा तय किया गया था। नियम था कि यदि नदी में 70,000 क्यूसेक या उससे कम पानी होगा, तो दोनों देश आधा-आधा साझा करेंगे। यदि प्रवाह 70,000 से 75,000 क्यूसेक के बीच होगा, तो बांग्लादेश को 40,000 क्यूसेक मिलेगा और शेष भारत को जाएगा। वहीं 75,000 क्यूसेक से अधिक होने पर भारत का हिस्सा 40,000 क्यूसेक तय था और शेष पानी बांग्लादेश को मिलना था। अब पेंच यह फंसा है कि भारत इस बार 'फरक्का पॉइंट' पर वर्तमान जल प्रवाह के आधार पर नया ढांचा तैयार करना चाहता है, जबकि बांग्लादेश का कहना है कि भारत द्वारा ऊपरी इलाकों से एकतरफा पानी निकालने के कारण फरक्का में औसत प्रवाह पहले ही कम हो चुका है, इसलिए पूरी नदी के कुल जल प्रवाह को आधार बनाया जाना चाहिए।
मंत्रिस्तरीय संयुक्त नदी आयोग (JRC) की बैठक से समाधान की उम्मीद
इस कूटनीतिक गतिरोध के बीच बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिद उद्दीन चौधरी एनी ने बताया कि सरकार ने इस संवेदनशील मामले पर एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। दोनों देशों की तकनीकी और विशेषज्ञ टीमें शुरुआती तैयारियों में जुट चुकी हैं। संयुक्त नदी आयोग (JRC) की आगामी बैठक में इन बारीकियों पर अंतिम चर्चा होगी, जिसके बाद ही कोई आधिकारिक साझा बयान जारी होने की उम्मीद है। हालांकि, बांग्लादेश में भारत के पूर्व उच्चायुक्त पंकज शरण ने संकेत दिए हैं कि पुराना फॉर्मूला (जो 1949 से 1988 तक के जल प्रवाह पर आधारित था) अब 30 साल बाद व्यावहारिक रूप से कारगर नहीं रह सकता, जिसके लिए पिछले 40 वर्षों के आंकड़ों को देखना होगा।
कोलकाता बंदरगाह को बचाने के लिए बना था फरक्का बांध, पद्मा नदी को लेकर ढाका की शिकायत
भारत ने पश्चिम बंगाल के मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों में बांग्लादेश सीमा से महज 18 किलोमीटर ऊपर मनोहरपुर में फरक्का बांध का निर्माण किया था। अप्रैल 1975 में चालू हुए इस बांध का मुख्य उद्देश्य गंगा के अतिरिक्त पानी को भागीरथी नदी में मोड़कर कोलकाता बंदरगाह को गाद (Silt) से बचाना और उसे चालू रखना था। इसके विपरीत, बांग्लादेश की मुख्य शिकायत यह रही है कि इस बांध के कारण उसके हिस्से वाली शक्तिशाली पद्मा नदी सूख गई है, जिससे वहां के एक बड़े इलाके की कृषि, पर्यावरण और आजीविका पर बेहद बुरा असर पड़ा है। साल 1976 में मौलाना अब्दुल हामिद खान भासानी द्वारा इसके खिलाफ की गई लंबी पदयात्रा आज भी दोनों देशों की राजनीति में एक बड़ा ऐतिहासिक संदर्भ है।
राजनीतिक बदलावों के बीच फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं दिल्ली और ढाका
हाल के महीनों में दोनों देशों के राजनीतिक परिदृश्य में बड़े बदलाव आए हैं। मार्च 2025 में दोनों देशों के तकनीकी विशेषज्ञों ने संयुक्त समिति की 86वीं बैठक में कोलकाता में मुलाकात की थी, लेकिन बांग्लादेश की तत्कालीन अंतरिम सरकार के दौरान उपजे कूटनीतिक तनाव के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी थी। अब बीएनपी सरकार के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने नई दिल्ली के अपने दौरे पर स्पष्ट किया है कि गंगा जल संधि दोनों देशों के बीच निष्पक्षता और जलवायु परिवर्तन के मानदंडों पर संबंधों के पुनर्निर्माण की पहली अग्निपरीक्षा होगी। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिश्री ने भी साफ किया है कि भारत बांग्लादेश की नई निर्वाचित सरकार के साथ पानी सहित सभी द्विपक्षीय मुद्दों पर समयबद्ध और सकारात्मक चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है।
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