
नॉर्डिक देशों संग बढ़ती दोस्ती से क्या साधना चाहता है भारत?
युद्ध, ऊर्जा संकट और चीन के बढ़ते असर के बीच भारत नॉर्डिक देशों से रिश्ते मजबूत कर नई वैश्विक रणनीति और आर्थिक सुरक्षा साधने में जुटा है।
दुनिया इस समय युद्धों, बदलते वैश्विक समीकरणों और अस्थिर गठबंधनों के दौर से गुजर रही है। ऐसे माहौल में भारत को भी अपनी विदेश नीति के कई पहलुओं पर नए सिरे से विचार करना पड़ रहा है। भू-राजनीतिक विश्लेषक और द फेडरल के कंसल्टिंग एडिटर के. एस. दक्षिणा मूर्ति का मानना है कि प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया नॉर्डिक देशों की यात्रा कोई बड़ा रणनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता और आर्थिक जोखिमों के प्रति भारत की प्रतिक्रिया है।
भारत जब Sweden, Norway, Finland और Denmark जैसे देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है, तब यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या नई दिल्ली धीरे-धीरे अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं को बदल रही है। द फेडरल से बातचीत में मूर्ति ने मोदी की हालिया यूरोप यात्रा, चीन के बढ़ते प्रभाव, अक्षय ऊर्जा और भारत की बदलती विदेश नीति पर विस्तार से चर्चा की।
नॉर्डिक देशों की यात्रा अभी क्यों और भारत को इससे क्या फायदा?
मूर्ति के अनुसार, नॉर्डिक देशों की यात्रा काफी हद तक पहले से तय और नियमित कूटनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा थी, क्योंकि यह तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन से जुड़ी हुई थी। इससे पहले ऐसे सम्मेलन 2018 और 2022 में क्रमशः कोपेनहेगन और स्टॉकहोम में आयोजित किए गए थे।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस यात्रा को इटली और संयुक्त अरब अमीरात की यात्राओं के साथ जोड़कर एक व्यापक कूटनीतिक दौरे का रूप दिया। हालांकि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों ने इस यात्रा को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।दुनिया इस समय रूस- यूक्रेन युद्ध, ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी तनावों के कारण अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। पूरी दुनिया में इस बात को लेकर चिंता है कि ये संघर्ष आगे किस दिशा में जाएंगे और इनका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा।
ऐसे माहौल में भारत का नॉर्डिक देशों की ओर झुकाव इस बात का संकेत है कि वह अपने अंतरराष्ट्रीय रिश्तों और व्यापारिक साझेदारियों में विविधता लाना चाहता है। ऐतिहासिक रूप से भारत के नॉर्डिक देशों के साथ आर्थिक संबंध सीमित रहे हैं और व्यापार का स्तर लगभग एक प्रतिशत या उससे भी कम रहा है। लेकिन ये देश हरित और टिकाऊ तकनीकों में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हैं। भारत इनके साथ गहरे संबंधों से काफी लाभ उठा सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि भारत के यूरोपीय संबंध पारंपरिक रूप से United Kingdom, France और Germany जैसे देशों तक ही अधिक केंद्रित रहे हैं।
क्या ट्रंप और पुतिन की बीजिंग यात्राओं के साथ मोदी की नॉर्डिक यात्रा वैश्विक समीकरणों में बदलाव का संकेत है?मूर्ति का कहना है कि इन यात्राओं का समय महज संयोग हो सकता है, क्योंकि इस तरह के दौरे काफी पहले से तय किए जाते हैं। लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता के दौर में दुनिया के बड़े नेता तेजी से बीजिंग की ओर रुख कर रहे हैं।
China अब एक बड़े कूटनीतिक खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है, खासकर Iran और United States के बीच तनाव कम करने तथा रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता की कोशिशों के कारण।भारत इन घटनाक्रमों पर करीबी नजर बनाए हुए है। हालांकि भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत हैं, लेकिन पाकिस्तान के साथ चीन की करीबी नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
इसी पृष्ठभूमि में मोदी की यूरोप यात्रा यह दिखाती है कि भारत अपनी विदेश नीति के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार करने के दबाव में है। अगर बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत अपनी रणनीतियों में सक्रिय बदलाव नहीं करता, तो वैश्विक मंच पर उसके हाशिए पर जाने का खतरा भी पैदा हो सकता है।
भारत के दीर्घकालिक आर्थिक और तकनीकी लक्ष्यों के लिए नॉर्डिक देशों का महत्व कितना है?मूर्ति के मुताबिक इस समय सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र अक्षय ऊर्जा है। भारत को कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी, खासकर पश्चिम एशिया की अस्थिर परिस्थितियों को देखते हुए।Sweden, Norway और Finland जैसे देशों के पास सौर, पवन और टिकाऊ ऊर्जा प्रणालियों की उन्नत तकनीकें हैं। भविष्य में आने वाले वैश्विक संकटों से बेहतर तरीके से निपटने के लिए भारत को ऐसी साझेदारियों की जरूरत है।
फिलहाल होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनावों के कारण एलपीजी और कच्चे तेल की संभावित कमी को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। भारत ने अभी तक स्थिति को संभाला है, लेकिन इसकी भी सीमाएं हैं।
मूर्ति ने उदाहरण देते हुए कहा कि चीन इस मामले में बेहतर स्थिति में है, क्योंकि उसके पास बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का भंडार है और उसकी लगभग 50 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतें अक्षय स्रोतों से पूरी होती हैं। इसके मुकाबले भारत अभी भी मध्य-पूर्व से तेल आयात पर काफी निर्भर है। ऐसे में नॉर्डिक देशों के साथ गहरे संबंध भारत को तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा सहयोग के जरिए दीर्घकालिक मजबूती दे सकते हैं।
क्या मोदी की नॉर्डिक नीति भारत की विदेश नीति में स्थायी बदलाव का संकेत है? मूर्ति के अनुसार जब मोदी पहली बार 2014 में सत्ता में आए थे, तब उनकी लगातार विदेशी यात्राओं को लेकर काफी प्रशंसा और आलोचना दोनों हुई थीं। लेकिन समय के साथ घरेलू राजनीति में इन यात्राओं का प्रतीकात्मक महत्व कम हो गया।अब बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत सचेत रूप से अपनी विदेश नीति को बदल रहा है या सिर्फ बाहरी परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया दे रहा है।भारत परंपरागत रूप से ऐसी कठोर स्थिति लेने से बचता रहा है जिससे किसी एक देश के साथ रिश्ते खराब हों। लेकिन धीरे-धीरे कुछ बदलाव दिखाई दे रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के समर्थन में रहा है, लेकिन मोदी सरकार के दौरान भारत इजरायल के और करीब आया है। संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के साथ व्यापक रणनीतिक समूहों में भी शामिल हुआ है।हालांकि ये बदलाव अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे हो रहे हैं।इसके बावजूद भारत, ईरान और रूस जैसे देशों के साथ अपने संबंध बनाए हुए है, जिन्होंने मौजूदा ऊर्जा संकट के दौरान उसकी मदद की है। ईरान समय-समय पर एलपीजी और तेल की आपूर्ति में सहयोग करता रहा है, जबकि रूस रियायती दरों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराने वाला प्रमुख साझेदार बनकर उभरा है।लेकिन कई पक्षों के साथ करीबी संबंध बनाए रखने की नीति संकट के समय मुश्किलें भी पैदा कर सकती है। उदाहरण के तौर पर भारत फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पर कोई निर्णायक रुख नहीं अपना पा रहा, क्योंकि दोनों देशों के साथ उसके मजबूत संबंध हैं।
मूर्ति का मानना है कि भारत की मौजूदा विदेश नीति फिलहाल सक्रिय रणनीति से ज्यादा प्रतिक्रियात्मक नजर आती है। यूरोप और नॉर्डिक देशों की ओर बढ़ता झुकाव भी मुख्य रूप से वैश्विक अस्थिरता की प्रतिक्रिया है, न कि पूरी तरह से सोचा-समझा रणनीतिक परिवर्तन। अब देखना यह होगा कि आने वाले वर्षों में यह रुख भारत की विदेश नीति में स्थायी बदलाव का रूप लेता है या नहीं।

