
40 साल पुराने मुद्दों पर मिली राहत, क्या ईरान ने बाजी मार ली?
ईरान-अमेरिका शांति समझौते के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि भारी नुकसान के बावजूद ईरान ने प्रतिबंधों और परमाणु मुद्दे पर अहम रियायतें हासिल कीं।
ईरान और अमेरिका के बीच आखिरकार शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो गए हैं, जिससे कई सप्ताह तक चले भीषण सैन्य संघर्ष का अंत हो गया। इस युद्ध ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था और क्षेत्रीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। हालांकि युद्ध समाप्त हो चुका है, लेकिन दुनिया भर की राजधानियों में अब सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जा रहा है—इस युद्ध में आखिर जीत किसकी हुई?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए द फेडरल ने सऊदी अरब, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात में भारत के पूर्व राजदूत तथा West Asia At War: Repression, Resistance and Great Power Games पुस्तक के लेखक तलमीज़ अहमद से बातचीत की।
अमेरिका को क्या हासिल हुआ?
तलमीज़ अहमद के अनुसार, इस युद्ध से अमेरिका को बहुत कम हासिल हुआ। उनका कहना है कि अमेरिका इस संघर्ष में मुख्य रूप से इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दबाव में शामिल हुआ।उनके मुताबिक, नेतन्याहू ने यह धारणा बनाई थी कि ईरान पर हमला बेहद तेज और निर्णायक होगा, जिसमें पहले ही दिन ईरान के शीर्ष नेताओं को खत्म कर दिया जाएगा, तेहरान में सत्ता परिवर्तन हो जाएगा और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ऐतिहासिक नेता के रूप में उभरेंगे।लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
अहमद कहते हैं कि अमेरिका पहले से ही ईरान के साथ बातचीत कर रहा था और दोनों पक्षों के बीच वार्ता के दो दौर भी हो चुके थे। ऐसे में युद्ध में उतरना रणनीतिक रूप से गलत फैसला था।
उन्होंने कहा कि शुरुआती 15 दिनों में ही साफ हो गया था कि ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव नहीं है। हालांकि ईरान को भारी नुकसान पहुंचा, लेकिन वह पूरी तरह झुकने को तैयार नहीं हुआ। इसके उलट, ईरान ने सैन्य स्तर पर इज़राइल और अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले कर अपनी क्षमता भी दिखाई।
40 साल पुराने मुद्दों पर प्रगति
तलमीज़ अहमद का मानना है कि शांति समझौते से ईरान को वे लाभ मिले हैं जिनकी वह दशकों से मांग कर रहा था।समझौते में शत्रुता की स्थायी समाप्ति, सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने, परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों का समाधान और ईरानी संपत्तियों को मुक्त करने जैसे प्रावधान शामिल हैं।ये सभी मुद्दे पिछले लगभग 40 वर्षों से अंतरराष्ट्रीय एजेंडे पर लंबित थे। अब दोनों पक्ष अगले 60 दिनों में बातचीत के जरिए इनका समाधान तलाशने की कोशिश करेंगे।
युद्ध में कोई स्पष्ट विजेता नहीं
हालांकि अहमद यह भी मानते हैं कि यह युद्ध ईरान के लिए भी आसान नहीं रहा।युद्ध के दौरान उसकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा, नेतृत्व संकट पैदा हुआ और बुनियादी ढांचे को भी क्षति पहुंची। लेकिन उनका मानना है कि युद्धों में अक्सर स्पष्ट विजेता और पराजित नहीं होते।उन्होंने अमेरिका के अफगानिस्तान और इराक अभियानों का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका ने वहां सत्ता परिवर्तन तो किया, लेकिन लंबे समय तक अपनी सफलता कायम नहीं रख सका।
उनके अनुसार, वियतनाम से लेकर आज तक अमेरिका के सैन्य अभियानों का रिकॉर्ड बताता है कि उसके पास अत्यधिक विनाशकारी शक्ति तो है, लेकिन दूरदर्शी रणनीति की कमी अक्सर उसके लक्ष्यों को कमजोर कर देती है।
युद्ध में नेतन्याहू की भूमिका कितनी अहम रही?
तलमीज़ अहमद का मानना है कि इस पूरे संघर्ष में इज़राइल और विशेष रूप से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।उनके मुताबिक, इज़राइल लंबे समय से अमेरिकी विदेश नीति को प्रभावित करता रहा है और कई बार उसने अमेरिका को ऐसे कदम उठाने के लिए प्रेरित किया जो ईरान के खिलाफ तो थे, लेकिन अमेरिकी हितों से मेल नहीं खाते थे।
अहमद का कहना है कि नेतन्याहू के लिए संघर्ष और हिंसा अक्सर अपने आप में उद्देश्य बन जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने निजी तौर पर नेतन्याहू से कहा कि उनके पास स्पष्ट रणनीति या दीर्घकालिक दृष्टि नहीं है, लेकिन इसका उन पर कोई असर नहीं पड़ा।
अमेरिकी राजनीति में इज़राइल का प्रभाव
तलमीज़ अहमद के अनुसार, अमेरिकी राजनीति में इज़राइल का प्रभाव बेहद गहरा है।उनका दावा है कि राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी के बाद कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसा कदम नहीं उठा सका जो उस समय के इज़राइली प्रधानमंत्री की इच्छा के खिलाफ हो।विशेष रूप से नेतन्याहू ने बिल क्लिंटन, जॉर्ज बुश, डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन जैसे नेताओं के कार्यकाल में अमेरिकी नीतियों को प्रभावित किया।
अहमद का आरोप है कि 2003 में इराक पर हमले, ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से ट्रंप के बाहर निकलने और ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या जैसे फैसलों में भी नेतन्याहू की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
क्या शांति समझौता फिर खतरे में पड़ सकता है?
तलमीज़ अहमद को आशंका है कि जैसे पहले ईरान परमाणु समझौता (JCPOA) कमजोर पड़ गया था, वैसे ही इस नए समझौते को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो सकती है।उनका कहना है कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के भीतर अभी भी ऐसे कई समूह मौजूद हैं जो ईरान विरोधी रुख रखते हैं और इज़राइल के साथ मिलकर समझौते को कमजोर करने का प्रयास कर सकते हैं।
उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा कि वे अक्सर किसी समझौते की शुरुआत तो करते हैं, लेकिन उसे अंत तक ले जाने के लिए जरूरी राजनीतिक धैर्य और कूटनीतिक प्रतिबद्धता नहीं दिखाते।
क्या ईरान अब पहले से मजबूत होकर उभरा है?
इस सवाल पर तलमीज़ अहमद का जवाब संतुलित है।उनका कहना है कि यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईरान क्षेत्र का नया शक्तिशाली नेता बनकर उभरा है। देश अब भी आर्थिक प्रतिबंधों, युद्ध से हुई क्षति और आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहा है।
युद्ध के दौरान सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु के बाद नेतृत्व परिवर्तन भी हुआ और अब उनके पुत्र मोजतबा खामेनेई नेतृत्व संभाल रहे हैं। इसके अलावा ईरान को अपनी अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे को फिर से मजबूत करना होगा।अहमद का मानना है कि फिलहाल ईरान को क्षेत्रीय शक्ति प्रदर्शन के बजाय अपने पुनर्निर्माण और पड़ोसी देशों के साथ संबंध मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए।
सुधारवादी राष्ट्रपति पेज़ेश्कियन के सामने चुनौती
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन को लेकर तलमीज़ अहमद आशावादी नजर आते हैं।उनका मानना है कि पेज़ेश्कियन पूर्व राष्ट्रपति हसन रूहानी की तरह आर्थिक और सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने की क्षमता रखते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें पर्याप्त राजनीतिक समर्थन और काम करने की स्वतंत्रता की जरूरत होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के सामाजिक जीवन को केवल हिजाब के आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, ईरानी महिलाएं पश्चिम एशिया की सबसे शिक्षित और प्रतिभाशाली महिलाओं में शामिल हैं और कला, साहित्य तथा सिनेमा के क्षेत्र में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
आखिर इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ किसे मिला?
जब तलमीज़ अहमद से पूछा गया कि इस शांति समझौते में बेहतर शर्तें किसने हासिल कीं—ईरान या अमेरिका—तो उनका जवाब स्पष्ट था: ईरान।उनका कहना है कि युद्ध शुरू होने से पहले ईरान से बहुत कम उम्मीद की जा रही थी, लेकिन सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उसने सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर अपनी क्षमता दिखाई।
अहमद के मुताबिक, ईरानी मिसाइलों और ड्रोन ने यह साबित कर दिया कि ईरान को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि इज़राइल को हुए नुकसान की पूरी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।उनके अनुसार, इस युद्ध ने अमेरिका और इज़राइल दोनों को यह संदेश दिया कि ईरान ऐसा देश नहीं है जिसे आसानी से झुकाया जा सके, बल्कि वह सम्मान और गंभीरता से लिए जाने योग्य क्षेत्रीय शक्ति है।
ईरान-अमेरिका युद्ध भले समाप्त हो गया हो, लेकिन इसके राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव आने वाले वर्षों तक महसूस किए जाएंगे। जहां अमेरिका अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल करने में विफल नजर आया, वहीं ईरान ने भारी नुकसान झेलने के बावजूद कई पुराने मुद्दों पर महत्वपूर्ण रियायतें हासिल कर लीं।यही वजह है कि कई विशेषज्ञों की नजर में इस शांति समझौते का सबसे बड़ा कूटनीतिक लाभ फिलहाल ईरान के खाते में जाता दिखाई देता है।

