तख्तापलट से राष्ट्रपति पद तक, म्यांमार में ह्लाइंग की मजबूत पकड़
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सीनियर जनरल मिन आंग ह्लाइंग ने राष्ट्रपति पद की कमान संभाल ली है, और सेना की बागडोर एक ऐसे वफ़ादार कट्टरपंथी के हाथों में सौंप दी है जो अब भी अपने ही लोगों के साथ युद्धरत है। फ़ाइल फ़ोटो

तख्तापलट से राष्ट्रपति पद तक, म्यांमार में ह्लाइंग की मजबूत पकड़

म्यांमार में ह्लाइंग के राष्ट्रपति बनने और सेना में बदलाव के बीच सत्ता और सख्त हुई है, जबकि गृहयुद्ध और राजनीतिक संकट के बीच शांति की उम्मीद कमजोर पड़ती दिख रही है।


म्यांमार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। देश के सैन्य प्रमुख सीनियर जनरल मिन आंग ह्लाइंग अब राष्ट्रपति बनने की तैयारी में हैं और इसके साथ ही उन्होंने सैन्य नेतृत्व में भी बड़े बदलाव किए हैं। 30 मार्च को ह्लाइंग ने सेना प्रमुख के पद से इस्तीफा देकर उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी पेश की, जो राष्ट्रपति बनने की प्रक्रिया का जरूरी कदम माना जाता है।

यह घटनाक्रम उस भविष्यवाणी को सही साबित करता है, जिसमें कहा गया था कि म्यांमार के संसदीय चुनाव के बाद ह्लाइंग सत्ता संभालेंगे। इन चुनावों को कई लोगों ने ‘दिखावटी’ बताया था, जिनमें सेना समर्थित यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) को सत्ता में लाया गया।

दरअसल, 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट की जड़ें भी इसी सत्ता संघर्ष में थीं। आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने चुनाव में भारी जीत हासिल की थी और दूसरी बार सरकार बनाने की तैयारी में थी। लेकिन सेना को यह डर था कि सू ची 2008 के संविधान में बदलाव कर सकती हैं, जिससे सेना को मिलने वाले विशेष अधिकार—जैसे तीन अहम मंत्रालय और संसद में 25% सीटें—खत्म हो सकते हैं।

बताया जाता है कि जनरल ह्लाइंग ने सत्ता साझा करने का प्रस्ताव रखा था, जिसके तहत वे राष्ट्रपति बनना चाहते थे और सेना का प्रभाव भी बरकरार रखना चाहते थे। जब यह प्रस्ताव सफल नहीं हुआ, तो सेना ने उसी दिन तख्तापलट कर दिया, जिस दिन नई सरकार शपथ लेने वाली थी। इसके बाद पूरे देश में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन शुरू हुआ, जिसे सेना ने कड़ी ताकत से दबाने की कोशिश की। यही संघर्ष धीरे-धीरे गृहयुद्ध में बदल गया, जो पिछले पांच वर्षों से देश को प्रभावित कर रहा है।

अब जबकि म्यांमार की सेना कई मोर्चों पर कमजोर होती दिख रही है और कई क्षेत्रों पर उसका नियंत्रण कम हो गया है, उम्मीद की जा रही थी कि नई सरकार शांति की दिशा में कदम बढ़ाएगी। लेकिन हालिया घटनाक्रम इसके उलट संकेत दे रहे हैं।सेना में हुए नए बदलावों से यह साफ हो गया है कि नेतृत्व अब कठोर रुख अपनाने वाले अधिकारियों के हाथ में जा रहा है। जनरल ह्लाइंग ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में वाइस सीनियर जनरल सोए विन को नजरअंदाज करते हुए अपने करीबी और भरोसेमंद अधिकारी जनरल ये विन ऊ को सेना प्रमुख बनाया है। जनरल ये विन ऊ को सैन्य खुफिया का प्रमुख और ह्लाइंग का बेहद करीबी माना जाता है। उन्हें सेना में कठोर और निर्दयी अधिकारी के रूप में भी जाना जाता है।

सोए विन को न केवल सेना प्रमुख नहीं बनाया गया, बल्कि उन्हें उप-सेनाप्रमुख पद से भी हटा दिया गया। उनकी जगह लेफ्टिनेंट जनरल क्याव स्वार लिन को नियुक्त किया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोए विन को एक नए बनाए गए यूनियन कंसल्टेटिव काउंसिल में जगह दी जा सकती है, जिसकी भूमिका सीमित मानी जा रही है।

विश्लेषकों का मानना है कि ह्लाइंग सोए विन की बढ़ती लोकप्रियता से असहज थे। सेना के भीतर और समर्थकों के बीच सोए विन को ज्यादा समर्थन मिल रहा था, जिससे ह्लाइंग को अपनी स्थिति पर खतरा महसूस हुआ। यही कारण है कि उन्होंने अपने भरोसेमंद अधिकारी को शीर्ष पद पर बैठाना उचित समझा।

फिलहाल म्यांमार में शांति की कोई स्पष्ट उम्मीद नजर नहीं आती। नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को प्रभावी रूप से खत्म कर दिया गया है और इसकी नेता आंग सान सू ची को उम्रकैद की सजा दी गई है। सेना समर्थित सरकार सत्ता में है, लेकिन न तो सरकार और न ही सेना विद्रोही समूहों से बातचीत के लिए तैयार दिख रही है।

देश के कई हिस्सों पर विद्रोही समूहों का कब्जा है और कुछ को बाहरी समर्थन भी मिल रहा है। चीन ने उत्तर-पूर्व में कुछ समूहों को शांत करने की कोशिश की है, लेकिन व्यापक स्तर पर शांति प्रयास सफल नहीं हो पाए हैं। संयुक्त राष्ट्र और आसियान भी संघर्षरत पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने में नाकाम रहे हैं।

ऐसे में म्यांमार का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। देश एक स्थिर राष्ट्र के रूप में खुद को बनाए रख पाएगा या नहीं, यह बड़ा सवाल है। साथ ही, चीन और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी इस संकट को और जटिल बना रही है। भारत के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय है, क्योंकि उसके कई महत्वपूर्ण संपर्क परियोजनाएं म्यांमार से होकर गुजरती हैं।

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