
नेपाल में बवाल, कुर्सी संभालते ही बालेन शाह के खिलाफ सड़कों पर लोग
भारतीय वस्तुओं पर सीमा शुल्क और छात्र संघों को भंग करने की योजना को लेकर पूरे नेपाल में विरोध प्रदर्शन फैल गए हैं, जिससे प्रधानमंत्री बालेन शाह दबाव में आ गए...
नेपाल में बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ जनता का गुस्सा बढ़ रहा है, जबकि इस सरकार ने भारी बहुमत के साथ पदभार संभाले अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं। विरोध प्रदर्शन शहरों की सड़कों से लेकर देश के प्रशासनिक केंद्र 'सिंह दरबार' तक फैल गए हैं, जिसमें छात्रों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम निवासियों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
सीमा शुल्क ने पैदा किया आक्रोश
असंतोष का एक मुख्य कारण भारत से लाए जाने वाले 100 रुपये से अधिक मूल्य के सामान पर अनिवार्य सीमा शुल्क लगाने का निर्णय रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में, जहां सीमा पार से खरीदारी करना एक दिनचर्या है, वहां के निवासियों का कहना है कि यह उपाय रोजमर्रा के जीवन को बाधित करता है और वित्तीय तनाव बढ़ाता है। जो नियम कागज पर प्रशासनिक लग सकता है, उसने व्यवहार में एक संवेदनशील नस को छू लिया है।
पार्टी से जुड़े छात्र संघों को खत्म करने की सरकार की योजना ने अशांति में और घी डाल दिया है। स्कूल और कॉलेज के छात्रों के नेतृत्व में प्रदर्शन अधिक बार होने लगे हैं, और वर्दी पहने प्रदर्शनकारियों की तस्वीरों से संकेत मिलता है कि यह मुद्दा कितनी गहराई तक गूंज रहा है। छात्र नेताओं का कहना है कि प्रशासन ने परामर्श के बजाय टकराव का रास्ता चुना है, जिससे अविश्वास गहरा गया है।
100-सूत्रीय योजना और प्रस्तावित बदलाव
यह प्रस्ताव, शाह के पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद अनुमोदित 100-सूत्रीय योजना का हिस्सा है, जो 60 दिनों के भीतर राजनीतिक छात्र संरचनाओं को हटाने का आदेश देता है, जिसके बाद "छात्र परिषद" (Student Council) जैसे विकल्प लाए जाने हैं।
आलोचकों का तर्क है कि इससे कैंपस लोकतंत्र के खोखला होने का खतरा है, जहां 'स्वतंत्र छात्र संघ' (Free Students’ Union) प्रणाली ने लंबे समय से प्रतिनिधित्व के लिए स्थान प्रदान किया है।
विरोध और समर्थन की आवाजें
इंडिया टुडे द्वारा उद्धृत किए गए बयान के अनुसार, 'अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ' के अध्यक्ष दीपक धामी ने कहा, "सरकार संविधान द्वारा गारंटीकृत अधिकारों को छीनने की कोशिश कर रही है। यदि आवश्यक हुआ, तो हम सड़कों पर उतरेंगे।" उन्होंने आगे कहा, "नेपाली राजनीति में छात्र आंदोलन की एक लंबी विरासत रही है और लोकतंत्र की रक्षा में इसने बड़ी भूमिका निभाई है। इसलिए सरकार का निर्णय अपरिपक्व और विचारहीन प्रतीत होता है।"

