
शांति की उम्मीदें हुईं 'फुस्स'! US से बिना बात किए ही वापस लौटे ईरानी विदेश मंत्री अराघची
अगले 24 घंटे दुनिया के इतिहास के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। इस्लामाबाद और ओमान में चल रही कूटनीतिक वार्ताओं का नतीजा या तो पश्चिम एशिया में स्थायी शांति लाएगा, या फिर एक ऐसा भीषण युद्ध शुरू होगा जिसकी आग पूरी दुनिया को झुलसा सकती है।
ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गया है जहाँ से वापसी का रास्ता कूटनीतिक वार्ताओं और भीषण युद्ध दोनों ओर जाता है। पश्चिम एशिया (West Asia) में इस वक्त एक अजीबोगरीब 'सस्पेंस' बना हुआ है। इस्लामाबाद, पाकिस्तान में दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे से कूटनीतिक कोशिशें जारी हैं, लेकिन हकीकत क्या है, यह अब तक साफ नहीं हो पाया है। पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त इस्लामाबाद और ओमान (Oman) पर टिकी हैं, जहाँ वैश्विक शांति का भविष्य तय हो रहा है।
इस्लामाबाद में कूटनीतिक हलचल और ईरान का रुख
शनिवार को एक बड़ी राजनीतिक हलचल में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) अपने उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ इस्लामाबाद से ओमान के लिए रवाना हो गए। सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि क्या इस्लामाबाद में उनकी अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से कोई बातचीत हुई?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरानी प्रतिनिधिमंडल और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के बीच कोई सीधी बातचीत नहीं हुई है। ईरान का अभी तक का आधिकारिक स्टैंड यही है कि वह धमकी और दबाव के बीच अमेरिका से कोई सीधी बातचीत नहीं करेगा। हालांकि, कूटनीतिक चैनलों के जरिए यह खबर जरूर आई है कि ईरान ने बातचीत की मेज पर आने के लिए अमेरिका के सामने 10 सख्त शर्तें रखी हैं।
आखिर अराघची इस्लामाबाद क्यों गए थे?
सवाल यह उठता है कि अगर ईरान को अमेरिका से बात ही नहीं करनी थी, तो अराघची इस्लामाबाद क्यों गए थे? इसको लेकर ईरान और अमेरिका दोनों ओर से विरोधाभासी बयान सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान आने से पहले अराघची ने कहा था कि वह इस्लामाबाद, मस्कट (ओमान) और मॉस्को (रूस) की यात्रा शुरू कर रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य "द्विपक्षीय मामलों पर तालमेल बनाना" है। इस बयान के जरिए ईरान ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उसकी यात्रा का एजेंडा अमेरिका से बातचीत करना नहीं है। तेहरान ने साफ किया कि अमेरिका के "अधिकतमवादी मांगों" और प्रतिबंधों के बीच सीधी वार्ता संभव नहीं है।
दूसरी ओर, व्हाइट हाउस ने आधिकारिक तौर पर जानकारी दी कि अमेरिकी प्रतिनिधि इस्लामाबाद जा रहे हैं, जहाँ ईरान के साथ बातचीत की संभावना है। व्हाइट हाउस ने यहाँ तक कहा कि अगर इस्लामाबाद में बातचीत आगे बढ़ती है, तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) भी पाकिस्तान जा सकते हैं। इन अलग-अलग बयानों और सस्पेंस के बीच, बातचीत कितनी कारगर होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
सहमति बनाने की चार चरणों वाली 'पीस प्रॉसेस'
तमाम विरोधाभासों के बावजूद, मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान और ओमान किसी तरह दोनों पक्षों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। इस कूटनीतिक प्रयास के चार प्रमुख चरण माने जा रहे हैं:
पाकिस्तानी मध्यस्थता: आज ईरानी विदेश मंत्री अराघची ने पाकिस्तान के शक्तिशाली फील्ड मार्शल आसिम मुनीर (Asim Munir) से मुलाकात की। इस बैठक में अराघची ने अपना पक्ष रखा और कथित तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकाबंदी और यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) से जुड़ी शर्तों पर अमेरिकी आपत्तियों पर अपनी चिंताएं जाहिर कीं।
अमेरिकी पक्ष का आगमन: अब चर्चा है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल में शामिल स्टीव विटकॉफ (Steve Witkoff) और जेरेड कुशनर (Jared Kushner) भी जल्द इस्लामाबाद पहुँचकर आसिम मुनीर से मुलाकात कर सकते हैं। इस मुलाकात में पाकिस्तान ईरान की शर्तों और प्रस्तावों को अमेरिकी पक्ष के सामने रखेगा।
पीस ड्राफ्ट और सीधी बात की कोशिश: अगर पाकिस्तानी मध्यस्थता से दोनों पक्ष कुछ नरम पड़ते हैं, तो एक 'पीस ड्राफ्ट' (Peace Draft) तैयार करने की कोशिश होगी। इस ड्राफ्ट में उन मुद्दों को प्राथमिकता दी जाएगी जिन पर दोनों पक्ष पहले ही सहमत हो सकते हैं। अगर यह प्रयास सफल होता है, तभी सीधी बातचीत का रास्ता खुल सकता है।
जेडी वेंस का दौरा: अगर बातचीत में समझौते की ठोस संभावना नजर आती है, तभी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पाकिस्तान का दौरा करेंगे ताकि समझौते को अंतिम रूप दिया जा सके।
ईरानी डेलिगेशन की पीएम शहबाज से मुलाकात और 'आंतरिक फूट'
इस्लामाबाद में ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Shehbaz Sharif) से भी मुलाकात की। इस बैठक में भी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर मौजूद रहे। लेकिन इस उच्च स्तरीय बैठक के बावजूद, बातचीत को लेकर ईरान के सख्त रुख में कोई बदलाव नहीं दिखा। ईरान के इस अड़ियल रुख के पीछे वहाँ के शासन तंत्र के अंदर की गहरी फूट भी एक बड़ी वजह बताई जा रही है। वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की खबर के मुताबिक, ईरान में इस वक्त सत्ता के दो केंद्र बन गए हैं:
उदारवादी गुट: इस गुट का नेतृत्व राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान (Masoud Pezeshkian) और विदेश मंत्री अराघची जैसे नेता कर रहे हैं। यह गुट बातचीत के जरिए युद्ध को टालने और ईरान की आर्थिक हालत को सुधारने का समर्थक है।
कट्टरपंथी/सैन्य गुट (IRGC): दूसरे गुट में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर अहमद वाहिदी जैसे लोगों का प्रभाव है। यह गुट चाहता है कि ईरान अपनी सैन्य ताकत दिखाकर अपनी शर्तें मनवाए। वे सैन्य शक्ति से कोई समझौता नहीं चाहते।
बंधे हैं ईरानी वार्ताकारों के हाथ: मैसेंजर बनकर रह गए राजनयिक
रिपोर्ट के मुताबिक, अब ईरानी प्रतिनिधिमंडल के पास बड़े फैसले लेने की इजाजत नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि ईरान के पास अब अयातुल्ला खामेनेई (Ayatollah Khamenei) जैसा सुप्रीम लीडर नहीं है जो पहले की तरह फैसलों के लिए हरी झंडी दे सके।
अब IRGC का गुट बातचीत के प्रस्तावों को "अपनी गरिमा के साथ समझौता" बताकर खारिज कर रहा है। बताया जा रहा है कि ओमान में हुई गुप्त बैठकों में जब ईरानी राजनयिकों ने नरम तेवर दिखाए थे, तो IRGC ने इसे "धोखा देने जैसा" बताया और उन राजनयिकों पर ‘देशद्रोही’ का ठप्पा लगा दिया। इसलिए अब ईरानी वार्ताकारों में किसी भी प्रस्ताव पर सहमति देने की ताकत नहीं है; वे सिर्फ एक मैसेंजर बनकर रह गए हैं।
ट्रंप का बढ़ता टेंशन: युद्ध जारी रखने के लिए कानूनी समय-सीमा
बातचीत को लेकर IRGC के इन तेवरों ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का टेंशन बढ़ा दिया है, क्योंकि वह जल्द से जल्द युद्ध का फाइनल समाधान चाहते हैं। अमेरिका के नियमों के हिसाब से ट्रंप के लिए युद्ध का वक्त खत्म होता जा रहा है। दरअसल, अमेरिकी कानून के मुताबिक, राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना लंबा युद्ध नहीं छेड़ सकते।
ट्रंप ने ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को युद्ध छेड़ा और 2 मार्च को अमेरिकी संसद (Congress) को सूचित किया। कानून के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के 60 दिन के अंदर कांग्रेस से इजाजत जरूरी है। इसका मतलब है कि 1 मई को सैन्य तैनाती की समय-सीमा खत्म हो जाएगी। इसके बाद सैन्य तैनाती को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस की मंजूरी चाहिए, जिसे हासिल करना ट्रंप के लिए आसान नहीं होगा। खबरें हैं कि ट्रंप युद्ध को लेकर संसद का सामना नहीं करना चाहते हैं। इसलिए वह 1 मई से पहले युद्ध का फाइनल समाधान चाहते हैं—चाहे वह वार्ता से हो या युद्ध वाले विध्वंस से।
अगले 24 घंटे महत्वपूर्ण: युद्ध फिर शुरू होने का खतरा
इसका सीधा मतलब यह है कि अगर अगले 24 घंटे में बातचीत से बात नहीं बनी, तो युद्ध फिर शुरू हो सकता है। इजराइली मीडिया भी इस सीजफायर को एक 'शॉर्ट ब्रेक' (Short Break) बता रही है। इजराइली पीएम नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) का बयान भी युद्ध वाले संकेत दे रहा है। उन्होंने कहा, "हमने वादा किया कि पश्चिमी एशिया का चेहरा बदल देंगे। अब हम वहीं करने की कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप से मेरी बात हो रही है। वह ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव बना रहे हैं।"
बातचीत के साथ जंग की तैयारी तेज़: अमेरिका ने बढ़ाई तैनाती
बातचीत की कूटनीतिक कोशिशों के बीच युद्ध वाली तैयारी भी जोर-शोर से चल रही है। अमेरिका ईरान की घेराबंदी के लिए अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा रहा है। पिछले 24 घंटे में अमेरिकी सैन्य तैनाती में भारी इजाफा देखा गया है:
एयररिफ्यूलिंग टैंकरों की तैनाती: बेन गुरियन बेस (Ben Gurion Base) पर KC-46 और KC-135 एयररिफ्यूलिंग टैंकर पहुँचे हैं। फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में भी अमेरिकी KC-46A विमान देखा गया।
फाइटर जेट्स की वापसी: UAE में 12 F/A-18 अमेरिकी फाइटर जेट्स भेजे गए हैं। यहाँ अमेरिकी बेस पर 7 एयररिफ्यूलिंग टैंकरों की तैनाती हुई है। C-17 कार्गो विमान भी UAE के अमेरिकी बेस में तैनात किए गए हैं।
एक तरह से जंग के अगले राउंड के लिए अमेरिकी फौज ईरान के चारों तरफ डटी हुई है। ईरान के मिसाइल साइटों, बंदरगाहों की निगरानी की जा रही है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने खुद 3 एयरक्राफ्ट कैरियर, 12 वॉरशिप, 200 एयरक्राफ्ट और 15000 मरीन और नाविकों की तैनाती की जानकारी दी है।
ईरान का पलटवार: 2000 किमी रेंज वाली मिसाइल का परीक्षण
उधर, ईरान भी झुकने को तैयार नहीं है। उसने कूटनीतिक दबाव के बीच मिडिल रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया, जिसकी रेंज 2000 किमी बताई जा रही है। ईरान नए सिरे से युद्ध की तैयारी कर रहा है। दावा है कि ईरान में हर दिन 1000 से ज्यादा हथियार बनाए जा रहे हैं। मिसाइल और ड्रोन का प्रोडक्शन बढ़ाया गया है। इसके अलावा आधुनिक डिफेंस सिस्टम बनाने की कोशिश है। इन हथियारों का निर्माण अलग-अलग जगहों पर हो रहा है, और करीब 9 हजार कंपनियां इस काम में लगी हैं।
अगले 24 घंटे दुनिया के इतिहास के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। इस्लामाबाद और ओमान में चल रही कूटनीतिक वार्ताओं का नतीजा या तो पश्चिम एशिया में स्थायी शांति लाएगा, या फिर एक ऐसा भीषण युद्ध शुरू होगा जिसकी आग पूरी दुनिया को झुलसा सकती है। ट्रंप की 1 मई की डेडलाइन और ईरान की IRGC के अड़ियल रुख ने दुनिया को एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है।

