बहुध्रुवीय दुनिया की ओर बढ़ रहा विश्व, ईरान संकट बना टर्निंग पॉइंट
x

बहुध्रुवीय दुनिया की ओर बढ़ रहा विश्व, ईरान संकट बना टर्निंग पॉइंट

पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा ने कहा कि ईरान ने रणनीतिक परिपक्वता दिखाई, जबकि यह संघर्ष अमेरिका के घटते वैश्विक प्रभाव और बहुध्रुवीय विश्व की ओर संकेत करता है।


अमेरिका-ईरान संघर्ष और उसके बाद हुए शांति प्रयासों पर चर्चा करते हुए पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा ने कहा कि पूरे संकट के दौरान ईरान ने अपेक्षाकृत अधिक रणनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया। उनका मानना है कि ईरान ने अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित रखा, अनावश्यक तनाव बढ़ाने से बचा और केवल जरूरत पड़ने पर ही निर्णायक कदम उठाए।

क्या यह शांति स्थायी है?

राजीव डोगरा के अनुसार, मौजूदा शांति व्यवस्था को स्थायी या पूरी तरह सुरक्षित मानना जल्दबाजी होगी। उन्होंने इसे "बेहद नाजुक और अनिश्चित" बताया। उनके शब्दों में, यह स्थिति "अंडों पर चलने" जैसी है, जहां यह कहना मुश्किल है कि कब कोई नया संकट पैदा हो जाए।उन्होंने कहा कि इस संघर्ष की जड़ें केवल भू-राजनीतिक नहीं हैं, बल्कि इजरायल और अमेरिका के नेतृत्व की राजनीतिक तथा व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से भी जुड़ी हुई हैं। ऐसे में स्थायी शांति का रास्ता बेहद जटिल दिखाई देता है।


शांति प्रक्रिया को बिगाड़ सकता है इजरायल

डोगरा का मानना है कि इस पूरे समीकरण में इजरायल सबसे अप्रत्याशित कारक बना हुआ है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में संघर्ष विराम और समझौतों को बाधित करने का इजरायल का इतिहास रहा है, इसलिए भविष्य में भी वह शांति प्रक्रिया के लिए चुनौती बन सकता है।उन्होंने इजरायल के भीतर मौजूद मतभेदों की ओर भी इशारा किया। उनके अनुसार, एक वर्ग लगातार युद्ध से थक चुका है, जबकि दूसरा वर्ग क्षेत्रीय प्रभुत्व की दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रहा है।

अमेरिकी राजनीति ने भी निभाई भूमिका

पूर्व राजनयिक ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घरेलू राजनीतिक चुनौतियां भी इस संघर्ष के दौरान फैसलों को प्रभावित करती रहीं। उन्होंने कहा कि ट्रंप की गिरती लोकप्रियता, सार्वजनिक विवाद और कानूनी चुनौतियों ने भी अमेरिका को तनाव कम करने की दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित किया।डोगरा के अनुसार, युद्धक्षेत्र के दबाव और घरेलू राजनीतिक नुकसान दोनों ने अंततः वॉशिंगटन को समझौते की राह अपनाने पर मजबूर किया।

बदली हुई दिख रही है इजरायल की सैन्य स्थिति

राजीव डोगरा ने कहा कि वर्तमान संघर्ष में इजरायल की स्थिति उसके पुराने युद्धों से अलग दिखाई देती है। उनके मुताबिक, इस बार इजरायल ईरान पर वैसा निर्णायक दबदबा नहीं बना पाया, जैसा उसने अतीत के कई क्षेत्रीय संघर्षों में स्थापित किया था।उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका की लगातार सैन्य दखलअंदाजी और विदेश नीति संबंधी फैसलों ने उसकी वैश्विक साख को नुकसान पहुंचाया है। वियतनाम, इराक, लीबिया, सीरिया और अफगानिस्तान जैसे उदाहरणों ने दुनिया में अमेरिका के प्रति भरोसा कम किया है।

क्या अमेरिका की वैश्विक ताकत कमजोर पड़ रही है?

इतिहास और वैश्विक राजनीति का अध्ययन करने वाले डोगरा का मानना है कि किसी भी देश की दिशा तय करने में नेतृत्व की अहम भूमिका होती है। हालांकि, उन्होंने अमेरिका की चुनौतियों को केवल एक राष्ट्रपति तक सीमित नहीं माना।उनके अनुसार, अमेरिका की समस्याएं लंबे समय से विकसित हो रही हैं और कई प्रशासनिक कार्यकालों का परिणाम हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने वर्षों में जो नकारात्मक छवि अर्जित की है, उसे बदलना आसान नहीं होगा।

क्या यह अमेरिकी विश्व व्यवस्था के कमजोर होने का संकेत है?

डोगरा का मानना है कि मौजूदा वैश्विक बदलावों का श्रेय केवल डोनाल्ड ट्रंप को नहीं दिया जा सकता, हालांकि उन्होंने कुछ रुझानों को तेज जरूर किया है।उन्होंने अमेरिका की तुलना इतिहास के उन साम्राज्यों से की जो धीरे-धीरे कमजोर हुए, जिनमें रोमन साम्राज्य भी शामिल है। उनके अनुसार, अत्यधिक विस्तार, आंतरिक समस्याएं और राजनीतिक दिखावा अमेरिका की वैश्विक शक्ति को कमजोर कर रहे हैं।

चीन बन सकता है सबसे बड़ा चुनौतीकर्ता

पूर्व राजनयिक का मानना है कि आने वाले दशकों में चीन अमेरिका के प्रभुत्व को सबसे बड़ी चुनौती देगा। उनका कहना है कि वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।

क्या इस युद्ध ने अमेरिका के पतन की प्रक्रिया तेज कर दी?

डोगरा के अनुसार, इस संघर्ष ने अमेरिकी शक्ति को लेकर दुनिया की धारणा में बदलाव लाने का काम किया है। उन्होंने कहा कि अब छोटे और मध्यम आकार के देश भी बड़ी शक्तियों का मुकाबला करने का साहस दिखा रहे हैं।उन्होंने यूक्रेन-रूस युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल सैन्य ताकत होने से त्वरित जीत की गारंटी नहीं मिलती। ईरान संघर्ष ने भी यह दिखाया कि अमेरिका और इजरायल का संयुक्त दबाव हमेशा निर्णायक सफलता नहीं दिला सकता।

बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ रही दुनिया

राजीव डोगरा का निष्कर्ष है कि वैश्विक व्यवस्था एक बड़े संरचनात्मक बदलाव के दौर से गुजर रही है। उनका मानना है कि भविष्य में अमेरिकी प्रभुत्व न तो पूर्ण होगा और न ही निर्विवाद।उन्होंने कहा कि यूरोपीय देश भी अब वॉशिंगटन पर अपनी निर्भरता की समीक्षा कर रहे हैं। उनके अनुसार, ईरान संकट वैश्विक रणनीतिक सोच में एक "विभाजक रेखा" साबित हो सकता है, जो दुनिया को बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर ले जाएगा।

डोगरा का मानना है कि आने वाले समय में दुनिया किसी एक देश की इच्छाओं के अनुसार नहीं चलेगी, बल्कि कई शक्तियां मिलकर वैश्विक संतुलन तय करेंगी।

Read More
Next Story